Bhula rahe ho na kavita

भुला रहे हो न | Bhula rahe ho na kavita

भुला रहे हो न

( Bhula rahe ho na )

 

 

कुछ बोलो कुछ तो सच बोलो,
आज लिखकर मिटा रहे हो न।
चुड़ा दही कुर्ता पायजामा आदि,
बोलो ना तुम क्यों शर्मा रहे हो न।

 

जहां आज खड़े हो ऐ उनकी है,
पेड़ पौधे कुआं कल सब के सब।
क्यों छुप कर भी जाते हो गली से,
उनके ख्वाबों को जला रहे हो न।

 

अब स्नेह किस्से व लोरी सारें नहीं है,
लैम्प वैम्प दिया भी दिखता न कहीं है।
तुम भी अब अंग्रेजी गाने गा रहे हो न,
अपने विरासत को खुद भुला रहे हो न।

🍀

कवि : आलोक रंजन
कैमूर (बिहार)

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