प्रेमसिंह सोलंकी जी

प्रेमसिंह सोलंकी जी

प्रेमसिंह सोलंकी जी ( स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व पूर्व विधायक ) हमारे आदर्श आदरणीय श्री प्रेमसिंह सोलंकी जी,जनता के बीच में जन _जन के नायक थे।समाज सेवी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,राजनीति के धुरंधर विधायक थे।। तारीख 15 जुलाई सन 1913 को स्थानपटेल फलिया, समोई, मध्यप्रदेश मेंपिता श्री बापुजी सोलंकी.जीबालक बन कर जन्म लिए घर परिवार…

खोज

खोज

खोज सुख की खोज में आदमी देखो, कैसे दुख के पीछे दौड़ रहा है!घर है मगर वातानुकूलित नहीं है वह उसकी तृष्णा में चकरा रहाहै, मोटर है लेकिन सामान्य वह,‘लिमोजिन’ चढ़ने के लिए छटपटा रहा है सुख की खोज में लगने के बाद आदमी, आदमी कहाँ रह जाता है? देखते-देखते ही नदी की कलकल और,…

रवीन्द्र कुमार रौशन “रवीन्द्रोम “ की कविताएं | Ravindra Kumar Poetry

रवीन्द्र कुमार रौशन “रवीन्द्रोम “ की कविताएं | Ravindra Kumar Poetry

साहित्य साक्षी है साहित्य को स्मरण हैआदिकाल से अब तककृति लिखी जाएंगीचन्द्र ,सूर्य ,भू के अंत तक । साहित्य साक्षी है इतिहास बनकरसर्व मूल्यांकन कर रहा हैस्वस्थ , स्वच्छ द्रष्टा बनकरअपने आप में लिख रहा है । कितने अधर्मी ,आक्रमणकारीपहले-पहल बाजी मारीजैसे सत्य की किरणें बिखरीवैसे ही दुष्ट , परलोभी हारी । नेपोलियन , सिकंदर…

नयी रोशनी

नयी रोशनी

नयी रोशनी अंधेरों की बाहों से छूटकर आई है,एक उम्मीद की किरन जो जगमगाई है।थमी थी जो राहें, अब चल पड़ी हैं,दिलों में नयी रोशनी जो घर बसाई है। खामोशियों की परतें अब पिघलने लगीं,अधूरी सी कहानियां अब संवरने लगीं।हर कोना जो सूना था, वो चमक गया,नयी सुबह की आहट दिल को छूने लगी। दिकु,…

उड़ान

उड़ान | Udaan

उड़ान पक्षी अपने गीत के बदले तोड़ लेता है धान की दो बालियाँ लौट जाता है आसमान के घने घोंसले में अनपहुँच अन्वेषा की आँखें क्षितिज के विराग को छूकर लौट आती हैं फिर से अपने अभीष्ट के अन्तिम आश्रय में डैने सन्तुलित करते हैं दूर से दूर खिसकती नीलिमा की उदार सान्द्रता और फिर…

तुम उस शर्वरी पढ़ते

तुम उस शर्वरी पढ़ते

तुम उस शर्वरी पढ़ते खत मेरा अंततः तक,काश ! तुम उस शर्वरी पढ़ते,प्रेम का एक नव रूप,काश ! तुम विभावरी गढ़ते।तुम अगर पढ़ते तो शायद,फैसले आज कुछ और होते,देह से भले विलग रहते,किन्तु ह्रदय से एक रहते।प्रिय ! निर्णय तुम्हारा सहजरूपी,निर्मित ताज होता,शीश मैं झुकाती,पूर्ण सब अभिषेक होते।सोपान उस दिन प्रणय का,काश ! तुम दो…

आओ रोएँ

आओ रोएँ

आओ रोएँ ०जिसको खोया उसे याद कर बिलखें कलपें नयन भिगोएँआओ रोएँ०जो न खो गए उनको भूलेंखुशी दफ़्न कर, मातम वर लेंनंदन वन की जमीं बेचकरझट मसान में बसने घर लेंसुख-सपनों में आग लगाकरदुख-दर्दों के बीजे बोएँआओ रोएँ०पक्ष-विपक्ष नयन बन जाएँभूले से मत हाथ बँटाएँसाथ न चलकर टाँग अड़ाएँफूटी आँख न साथी भाएँनहीं चैन से…

वो मजदूर है

भारत की वर्तमान दुर्दशा

भारत की वर्तमान दुर्दशा बेरोज़गारी के अंधकार में,भटक रहे हैं युवा इस द्वार में।सपने सब कागज़ हो गए,संघर्ष के पल और गहरे हो गए। महंगाई की आग बढ़ी,हर घर की थाली सूनी पड़ी।रोटी के लिए मेहनत हार गई,सुकून की नींद अब दूर हो गई। नेताओं का गिरता स्तर,वादे बनते जुमलों का सफर।चुनावी भाषण झूठे निकले,जनता…

Dr. pritam

डॉ. प्रीतम कुमार झा की कविताएं | Dr. Pritam Kumar Jha Poetry

नज़र नज़र ढूंढती है मेरी उस नज़र को, बनाया है जिसने सभी को दीवाना, सभी काम गड़बड़ हुए कुछ हैं ऐसे,  कि दिल सबके गाते उन्हीं का तराना. ये उल्फत, ये चाहत, शरारत, नज़ाकत,  सभी हैं भरे कूट कर उनमें ऐसे, ये शोखी, ये आदत, शिकायत, मोहब्बत, समझ में न आये कहूँ किसको कैसे. के…

ghar ghar tiranga lahraye

आकाश में जब तिरंगा लहराता

आकाश में जब तिरंगा लहराता जब कोयल गीत सुनाती है।जब भंवरा नगमे गाता है।।पुरवाई शौर मचाती है।जब बादल झूम के आता है।। जब बात निकलती है हर सू ।दिलदारों की मतवालों की।।जब याद सताती है हमको।इस देश पे भरनें वालों की।। तोपों के दहन खुल जाते हैं ।बंदूके गरजनें लगती है ।।आकाश का दिल थर्राता…