खोज

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सुख की खोज में आदमी देखो, कैसे दुख के पीछे दौड़ रहा है!
घर है मगर वातानुकूलित नहीं है

वह उसकी तृष्णा में चकरा रहा
है, मोटर है लेकिन सामान्य वह,
‘लिमोजिन’ चढ़ने के लिए

छटपटा रहा है सुख की खोज में लगने के बाद आदमी, आदमी कहाँ रह जाता है?

देखते-देखते ही नदी की कलकल और, पंछियों की चहचहाहट तक
का उसे पता नहीं चलता फूल
की खुशबू और, सतरंगी फूलमाला भी उसे आकर्षित नहीं कर पाती

धीरे चलकर जिन्दगी नहीं जी जा सकती विश्वास को इस दौड़ में
लग जाने पर वह अपनी थकान

आराम से नहीं दवा से मिटाने
लगा है घर-परिवार के साथ प्रेम के सारे सम्बन्धों को बेकार की

झंझट समझने लगा है
सृष्टि की सुन्दर रचनाओं को भोगने की बजाय
पल-पल में

अपनी ही असन्तुष्टि से खुद को क्षत करने लगा है
सुख के नाम में
आदमी
कभी न अन्त होनेवाले दुखों की खेती करने लगा है।

बीएल भूरा भाबरा

जिला अलीराजपुर मध्यप्रदेश

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