Dahaleej

दहलीज | Dahaleej

दहलीज

( Dahaleej ) 

 

फर्क है तुमने और तुम्हारी बातों मे
समझ ही न पाए कई मुलाकातों में
मिले हो हर बार नए ही अंदाज मे
उजाला हो जैसे दिन और रातों मे

कभी गुरुर तो कभी शोखी नजर आया
कभी शाम तो कभी सहर नजर आया
तुम बिन यूं तो हम जागे हैं कई रातों मे
उभरा दर्द हो जैसे कोई जज्बातों मे

खुदा करे खैर की अब न हो कभी
फिर तुमसे कोई मुलाकात हमारी
कर लेंगे बसर हम जिंदगी अपनी
रह जाने दो ये चाहत फकत यादों मे

करनी है नही पार मुझे दहलीज ऐसे
बादल हों रंगीन भले ढलती शाम जैसे
माना की चांदनी रात मे साथ तारों का है
धूप की तपिश मे मगर उजाला बहुत है

आज के भीतर ही दिखता है कल भी
कल भीतर ही संवरता है आज भी
इसी आज और कल का भीतर ही जीवन है
जीवन के भीतर ही हैं हम भी समाज भी

 

मोहन तिवारी

 ( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

शिक्षक देव | Shikshak dev

Similar Posts

  • मेरी कविता के शब्द | Meri Kavita ke Shabd

    मेरी कविता के शब्द ( Meri Kavita ke Shabd ) तुम्हारे शब्द निहार रहे हैं मुझे और लज्जा से गढ़ी जाती हूं मैं बंद करके भी देखा है मैंने किताब में खुद को तुम्हारे शब्दों में फिर पढ़ी जाती हूं मैं मेरे कंधों को छूते हुए गुजर रही थी तुम्हारे शब्दों की क्यारी पलकें झुका…

  • जन्मदिवस मुबारक मां | Happy Birthday Maa

    जन्मदिवस मुबारक मां ( Happy Birthday Maa)    साधारण सा बालक था मै, आशीर्वाद बताया। हर ग़म मुझसे पहले माता, तुझसे ही टकराया। खुद तू आंसू पीती आयी, अमृत मुझे पिलाया। शूल पड़े राहों में मेरे , तूने फूल बिछाया। साधारण सा बालक था मै ,आशीर्वाद बताया। कालसर्प बनकर जब- जब भी ,मुझको डसने आया,…

  • टूटे हुए सपने | Toote hue Sapne

    टूटे हुए सपने ( Toote hue sapne )   तोड़ता भी रहा जोड़ता भी रहा टूटे सपनों को मैं रात भर खुली आंख जब सहर हुई टुकड़े ही टुकड़े थे बचे सामने उम्र भीं काबिल न थी जोड़ पाने में बहत्तर छेदों की गुदड़ी थी मिली सिल सिल कर भी सिलते रहे जर्जर दीवारें भी…

  • जायज | Jayaz

    जायज ( Jayaz )    विरोध के लिए ही विरोध होना जायज नहीं विरोध योग्य हो तो विरोध भी जरूरी है सत्य है हर आदमी हर कहीं सही नही होता किंतु ,वही हर जगह गलत भी नहीं होता स्वयं को देखकर ही और का भी विरोध, हो लबादे मे रहकर,कीचड़ फेंकना ठीक नही होगा रास्ता…

  • किसानों की सुन ले सरकार!

    किसानों की सुन ले सरकार! ******* आए हैं चलकर दिल्ली तेरे द्वार, यूं न कर उनका तिरस्कार; उन्हीं की बदौलत पाते हम आहार। सर्द भरी रातों में सड़कों पर पड़े हैं, तेरी अत्याचारी जल तोप से लड़ रहे हैं। सड़कों के अवरोध हटा आगे बढ़ रहे हैं, शायद कोई इतिहास नया गढ़ रहे हैं। आखिर…

  • Hindi Poetry | Hindi Kavita | Hindi Poem -विष प्याला

    विष प्याला ( Vish Pyala )   क्रूर हृदय से अपनों ने, जीवन भर  दी  विष प्यालों में। जबतक आग को हवा दी तबतक,शेर जला अंगारों में। कोमल मन के भाव  सभी, धूँ  धूँकर तबतक  जले मेरे, जबतब प्रेम हृदय से जलकर,मिट ना गया मन भावों से।   ** नगमस्तक भी रहा तभी तक, जबतक…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *