दिल-ए-नादान
दिल-ए-नादान

दिल-ए-नादान

 

 

दिले नादान तुझे कहीं का रहने न दिया।

ये कौन जाग जाग कर हमें सोने न दिया।।

 

मुद्दतों बाद नज़र आयी थी बहार मुझे,

बज्म में राज खुल जाने का डर रोने न दिया।।

 

लोग नहला धुला के कब्र तक पहुंचा आये,

मेरे घर में मुझे कुछ देर भी रहने न दिया।।

 

वो जो कहते थे जिन्दगी की खुशबू मुझको,

जाने क्या बात थी माले में पिरोने न दिया।।

 

उसकी फितरत है या वफा है या और कुछ है,

साथ चलता है मगर हमसफर होने न दिया।।

 

उड़ भी जाओगे तुम भी एक दिन हवा बनकर,

बात दिल की जुबां पे आयी थी कहने न दिया।।

 

तुम्हारे मकां में जला करते हैं अनेकों सूरज,

शेष घर में मेरे एक दीप भी जलने न दिया।

 

 

❤️

कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,
जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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