Ghazal Bina Unke

बिना उनके | Ghazal Bina Unke

बिना उनके

( Bina Unke )

बिना उनके हमारी आँख में सपना नहीं रहता
हमारी ज़िन्दगी वह है हमें कहना नहीं रहता

बहन अब बाँध दो राखी हमारे हाँथ में आकर
बता दो पाक इससे अब कहीं रिश्ता नहीं रहता

हवाएं चल पड़ी हैं आज कुछ ऐसी ज़माने में
सुना इंसान का इंसान से नाता नहीं रहता

पढ़ाओ तुम उन्हें फिर से यहाँ पर प्रेम की भाषा
बने जो स्वार्थ से रिश्ता सदा चलता नहीं रहता

मुकरना बात से अपनी अदा में जिसकी हो शामिल
यकीं उस पर कभी करना सुनों अच्छा नहीं रहता

इन्हें तुम पाठ नेकी का नहीं इतना पढ़ाओ अब
यहाँ सच बोलकर कोई सुना जिंदा नहीं रहता

महल में बैठकर जो तुम बनाते हो नियम सारे
तुम्हारे ही घरों तक यह सदा मसला नहीं रहता

किसी को आज समझाना प्रखर है भूल मानव की
यहाँ पर दूध पीता कोई भी बच्चा नहीं रहता

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

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यहाँ संहार राखी का | Ghazal Sanhar Rakhi ka

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