जानते हैं | Ghazal Jante Hain

जानते हैं

( Jante Hain )

वो रहते कहाँ हैं पता जानते हैं ।
कि उनकी सभी हम अदा जानते हैं ।।१

लगा जो अभी रोग दिल को हमारे ।।
न मिलती है इसकी दवा जानते हैं ।।२

मनाएं उन्हें हम भला आज कैसे ।
जिन्हें आज अपना खुदा जानते हैं ।।३

मिटेगा नहीं ये कभी रोग दिल का ।
यहाँ लोग करना दगा जानते हैं ।।४

मुझे बस है उम्मीद अपने सनम से ।
कि देना वही इक दुआ जानते हैं ।। ५

न रहता मेरा दिल कभी दूर उनसे ।
मगर लोग सारे जुदा जानते हैं ।।६

ठहरती नहीं है नज़र उन पे कोई।
तभी से उन्हें हम बला जानते हैं ।।७

नही प्यार तू उस तरह कर सकेगा ।
वो करना हमेशा जफ़ा जानते हैं ।।८

न पूछो प्रखर तुम हँसी वो है कितना ।
कहूँ सच तो सब अप्सरा जानते हैं ।।९

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

यह भी पढ़ें:-

https://thesahitya.com/ghazal-hai-ibadat-muhabbat/

Similar Posts

  • आज़मा के देख लिया | Aazma ke Dekh liya

    आज़मा के देख लिया ( Aazma ke dekh liya )    ख़ुदा बना के तुझे, सर झुका के देख लिया अना को ताक पे रख, सब भुला के देख लिया हुस्न ए मतला बड़े ख़ुलूस से उनको बुला के देख लिया हरेक नाज़ भी उनका उठा के देख लिया जुनून तोड़ चुका दम, वफा निभाने…

  • मिलने जब यार से चला होगा

    मिलने जब यार से चला होगा मिलने जब यार से चला होगाप्यार का तब नशा चढ़ा होगा खिल गए फूल दिल में खुशियों केबनके महताब जब मिला होगा इतनी चाहत भरे हो तुम दिल मेंगुल भी तो प्यार का खिला होगा जब भी आया तुझे सनम मिलनेहाल दिल का बयां हुआ होगा कुछ सुना हाल…

  • नही करते | Nahi Karte

    नही करते ( Nahi karte )   वैसे किसी को बेवज़ह आहत नहीं करते गैरत कोई छेड़े तो मुरव्वत नहीं करते ॥ कोशिश यही रहती न कभी भूल कोई हो गर हो तो सीखते हैं नदामत नहीं करते ॥ इन्साफ हुआ अंध है गूंगा है ज़माना बरसर-ए-विधा भी तो हिफाज़त नहीं करते ॥ अहबाब को…

  • तो और क्या करते | To Aur Kya Karte

    तो और क्या करते ( To Aur Kya Karte ) वो अपना ग़म न छिपाते तो और क्या करतेनज़र न अपनी झुकाते तो और क्या करते अज़ल से दुश्मनी पाले थे यार हमसे वोहमारा दिल न जलाते तो और क्या करते रवानी चाहती है ज़िंदगी हमारी भीक़दम अगर न बढ़ाते तो और क्या करते क़ज़ा…

  • जैसा मैं चाहती थी वैसा वो कर रहा है

    जैसा मैं चाहती थी वैसा वो कर रहा है जैसा मैं चाहती थी वैसा वो कर रहा हैदिल को मगर न जाने क्या फिर अखर रहा है। उसकी वो सर्द महरी पत्थर के जैसा लहज़ाअब ये बता रहा है सब कुछ बिखर रहा है। जो है खुशी मयस्सर उसमें नहीं बशर खुशजो ख़्वाहिशात बाकी बस…

  • हो रही है | Ho Rahi Hai

    हो रही है ( Ho Rahi Hai ) कहीं उल्फ़त ही उल्फ़त हो रही है।कहीं नफ़रत ही नफ़रत हो रही है। कहीं आराम से सोते हैं लीडर।कहीं मेह़नत ही मेह़नत हो रही है। उन्होंने ह़ाल क्या पूछा हमारा।मुसर्रत ही मुसर्रत हो रही है। न रोटी है न पानी है न बिजली।मशक़्क़त ही मशक़्क़त हो रही…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *