मुंतज़िर रहता खुशी को | Ghazal Muntazir Rahta

मुंतज़िर रहता खुशी को

( Muntazir Rahta )

मुंतज़िर रहता खुशी को मन बहुत
कट रहा है गम भरा जीवन बहुत

प्यार की खुशबू से मैं वीरान हूँ
है कहीं उल्फ़त भरा गुलशन बहुत

एक मैं हूँ प्यार से भीगा नहीं
प्यार का बरसा कहीं सावन बहुत

जिंदगी में भेज दे कोई हसीं
जिंदगी में रब अकेलापन बहुत

फ़ूल जब से प्यार का उसको दिया
बन गये है जान के दुश्मन बहुत

जुल्म अपनों के सहे इतने मगर
दुख भरा मेरा कटा बचपन बहुत

छोड़ जब आज़म दिया इस्कूल है
रोज़ घर में ही हुई अनबन बहुत

शायर: आज़म नैय्यर
(सहारनपुर )

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