ज्ञान का दीप
ज्ञान का दीप
जिनका किरदार सदाकत है l
जिनकी तदरीस से पत्थर पिघलत है ll
अकेले चलने का आभास न कराया l
हमेशा साथ देकर सफल कराया ll
” मित्र ” कहूँ तो ” मन ” शांत है l
” भाई ” कहूँ तो ” आत्मा ” तृप्त है ll
” गुरु ” कहूँ तो ” पद ” शेष है l
कहो , ” उद्धारक ” छात्र जीवन के है ll
संस्कृति विभाग से लेकर ,
परीक्षा विभाग तक l
राष्ट्रीय त्योहार से लेकर ,
किताब के पन्नों तक l
नि:स्वार्थ योगदान ,
” गुरुपाद ” गुरूवर का था ll
गिरे हुवे को तो दुनिया उठाती है l
मगर वह गिरने से पहले उठाते है ll
जब – जब परीक्षा प्रश् न बनती l
तब – तब वह किताब के उत्तर बनते ll
प्रेरणा दी सही – गलत की l
छाव दी शरण आभास की ll
न किसीसे शिकवा – गिला की l
बस चुप – चुप के दुवा की ll
घर से लाए विद्यार्थी बना कर l
घर लौटाया अधिकारी बना कर ll
रात – रात जाक कर पढ़ना सिखाया l
जीवन पथ पर बढ़ना सिखाया ll
संतान का दुःख था नहीं l
पूँछ ने पर कहते ,
निस्संतान मैं नहीं ll
पाठशाला का पितृ छाया हूँ l
निस्संतान मैं कहाँ हूँ ll
कभी ” गणित – विंज्ञान – समाज ” में l
तो कभी ” भाषा ” के रूप में ll
सजाई ” विद्या ” को पारदर्शी में l
दिखे ” जीवन ” के उद्देश्य में ll
संसार दिखला कर ,
बिगड़ी बात बनाते ll
सहपाठी को मुस्कान देकर ,
स्वयम तृप्ति बन जाते ll
गाँव के खलियान में भूख उगे l
हरघर में एक विद्यार्थी जगे ll
ऐसे ते ” गुरुपाद ” गुरु जी l
अब चलेगये ” प्रकाश निवास ” जी ll
” आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित ” l
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ” l

वाहिद खान पेंडारी
( हिंदी : प्राध्यापक ) उपनाम : जय हिंद
Tungal School of Basic & Applied Sciences , Jamkhandi
Karnataka
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