Hindi diwas par poem

हिन्दी दिवस है | Hindi Diwas Hai

हिन्दी दिवस है

( Hindi Diwas Hai )

हिंदी दिवस है क्यों हिंदी विबस है
अपने ही लोगों का मन परबस है ।

अपने ही लोग सब अपने ही भाई
अंग्रेजी में जमकर करे सब पढ़ाई।

अपने ही लोग करे जब उपेक्षा
बढ़े कैसे हिन्दी बढ़े कैसे शिक्षा।

हिंदी में सोते सब हिंदी में जागे
फिर भी अंग्रेजी के पीछे क्यों भागे ।

भावो का सागर है हिंदी हमारी
सदा अपने लोगों से हिंदी है हारी ।

देशी ह्रदय में विदेशी चलन है
अपनी ही ममता से कैसी जलन है

रोए चिल्लाए गड़े जब कांटे
दुःख के भावो को हिंदी तब बांटे।

भूषण आभूषण बिहारी का गागर
तुलसी के भावो का हिन्दी है सागर।

सूर कबीर और केशव की भाषा
पंत निराला और “रूपेश” की आशा l

कवि : रुपेश कुमार यादव ” रूप ”
औराई, भदोही ( उत्तर प्रदेश।)

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