इंसानियत खो गई

इंसानियत खो गई | Insaniyat Kho Gayi

इंसानियत खो गई

( Insaniyat Kho Gayi )

बिछुड़न की रीति में स्वयं को पहचाना
भीडतंत्र में बहुत प्रतिभावान हूँ जाना ।।1।

नयन कोर बहते रहे शायद कभी सूखे
राधा का चोला उतार पार्वती सरीखे ।।2।

तुम गए ठीक से, पर सबकुछ ठीक क्यूँ नहीं गई
इरादे वादे सारे तेरे गए पर याद क्यूँ नहीं गई।।3

सुन्दर सुनीत सुशील सुशोभित सुकोमल
नीरज से नफरत अँकुडी प्रेम उन्नत दो दल ।।4।

पहनकर चैन, कोशिश सुकुन को भूलने की
प्रेम से बगावत, झूठी वजूद झूला झूलने की ।।5।

इंसानियत खो गई बन गए इंसान लाचार
अनुभवहीन की पाठशाला पढ़ते व्यवहार ।।6।

दिखावटपन का बोलबाला बोली में शामिल
इश्क मशहूर किए करके शेरो-शायरी गालिब ।।7।

ब्रह्मांड से चाँद भला क्यूँ कर कोई ला सकता
अधर मुस्कान ही पूरे विश्व में जगमगा सकता ।।8।

कभी किनारे बैठ समन्दर का विलाप सुनने
जल गाता है विरह गीत किसी नए राग धुन मे ।।9।

चोटें मिलीं इतनी, वर्ना प्रेमी बन आहे भरते थे
पूरातन में पत्थर भी कभी मिट्ठी हुआ करते थे ।।10।

प्रतिभा पाण्डेय “प्रति”
चेन्नई

यह भी पढ़ें :-

दोस्त | Kavita Dost

Similar Posts

  • हे मां रजनी

    हे मां रजनी मां रजनी सा ना कोई उपकारी l पूरा भूमंडल मां तेरा आभारी l पूरा जग तेरा वंदन करता है l नमन तुझे भगवान भास्कर भी करता है l मां समय की तू बड़ी पाबंद l नित्य अपने समय पर आती है l फैला तम की चादर थके मांदे भास्कर को ले आगोश…

  • दिव्यांश मौर्य की कविताएँ | Divyansh Maurya Poetry

    मैं कविताएं तब लिखता हूं। मैं कविताएं तब लिखता हूं, जब मेरा मन रोने लगता। जीवन के दुःख दर्दों को जब , मन अश्रु से धोने लगता। मैं कविताएं तब लिखता हूं, जब मेरा मन रोने लगता। बोल नहीं जब मैं कुछ पाता, पर मन ही मन हूं चिल्लाता। जब मन भावुक हो जाता है,…

  • गांव री गुवाड़ आओ | राजस्थानी कविता

    गांव री गुवाड़ आओ ( राजस्थानी कविता )   गांव री गुवाड़ आओ, खेत हरसावै है। ठंडी ठंडी पून बहारां, गांव बुलावै है। काकड़ी मतीरा खाल्यो, चालो म्हारा खेत म। मीठी मीठी बातां करस्यां, ठंडी बालू रेत म। चौपालां अर पगडंडी, गीत सुरीला गावै है। गांव री महक माटी री, थानै गांव बुलावै है। हरया…

  • ओ निष्ठुर मनुष्य!

    ओ निष्ठुर मनुष्य! ओ निष्ठुर मनुष्य! क्यों तू,हरे-भरे वृक्षों को काटकर,उनको टुकड़ों में बाँटता है।सुनो! ये वृक्ष भी तो रोते हैं,इनको भी तो पीड़ा होती है। ओ निष्ठुर मनुष्य ! क्यों तू,हो गया इतना पत्थर-दिल?इन वृक्षों से ही जहाँ में तू,मानव तू ! जीवित रहता है।सोचा भी है तूने ओ मनुष्य,इन समस्त वृक्षों के बारे…

  • अमृतवर्षा की प्राचीन प्रथा | Amrit Varsha

    अमृतवर्षा की प्राचीन प्रथा ( Amrit varsha ki prachin pratha )    पुरानें समय से ही चली आ रही है ये प्रथा, शरद पूर्णिमा सब जगह पर मनाया जाता। चैतना और नवीनता को आयाम यही देता, मुख्य त्यौंहारों की तरह इसे मनाया जाता।। इस दिन चंद्रमा भी अपना सौंदर्य दिखाता, अपना प्रकाश फैलाकर अमृतवर्षा करता।…

  • आई फ्लू | Eye Flu

    आई फ्लू ( Eye Flu )    बारिश बुला रही बीमारियां रखना उसका ध्यान, छूने मत देना प्रभावित व्यक्ति कोई भी सामान। नाक-कान स्कीन के साथ रखें ऑंखों का ध्यान, मौसम-करवट बदल रहा बचना सभी इन्सान।। आज हर तरफ़ा हो रहा है इस वायरस का शोर, हल्के में नहीं लेना इसको करना बातों पर गौर।…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *