ओ निष्ठुर मनुष्य!

ओ निष्ठुर मनुष्य!

ओ निष्ठुर मनुष्य! क्यों तू,
हरे-भरे वृक्षों को काटकर,
उनको टुकड़ों में बाँटता है।
सुनो! ये वृक्ष भी तो रोते हैं,
इनको भी तो पीड़ा होती है।

ओ निष्ठुर मनुष्य ! क्यों तू,
हो गया इतना पत्थर-दिल?
इन वृक्षों से ही जहाँ में तू,
मानव तू ! जीवित रहता है।
सोचा भी है तूने ओ मनुष्य,
इन समस्त वृक्षों के बारे में।

ओ निष्ठुर मनुष्य ! बता मुझे
क्या मिलेगा तुझे काट इन्हें?
बता आखिर क्या बिगाड़ा है,
इन सभी हरे-भरे वृक्षों ने तेरा?
वक़्त रहते त्रुटी अपनी सुधार ले,
वृक्षारोपण करके तू संकल्प ले।

ओ निष्ठुर मनुष्य ! ये वृक्ष तुझे,
जीने के लिए बहुत कुछ देते हैं।
यही सबके जीवन का स्रोत हैं,
तो क्यों उगाने की जगह इनको,
काट-काटकर तू नष्ट कर रहा है?

Salman Surya

देशप्रेमी कविवर श्री सलमान ‘सूर्य’
( प्रसिद्ध हिन्दी महनीय कवि–साहित्यकार तथा अतीव संवेदनशील समाज–सुधारक, सामाजिक कार्यकर्ता, आध्यात्मिक विचारक, विशिष्ट सम्पादक, भारतीय दार्शनिक। )
स्थायी पता :- ऐतिहासिक बागपत,
उत्तर प्रदेश, भारत।

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • सुुुनो | Poem suno

    सुुुनो ( Suno )   सुुुनो… वो बात जो थी तब नहीं है अब जब आँखों में छिपी उदासियाँ पढ़ लेते थे लबों पर बिछीं खामोशियाँ सुन लेतेे थे ….तुम फुर्सतों में भी अब वो बात नहीं वो तड़प, वो ललक नहीं है  मसरूफियात में भी हमारी याद से लरज़ जाते थे जब…..तुम सुनो… तब…

  • ओ निर्मोही | Kavita o nirmohi

    ओ निर्मोही ( O nirmohi )   ओ निर्मोही ओ निर्मोही चले गए क्यों, छोड मुझें परदेश। तपता मन ये तुम्हें बुलाए, लौट के आजा देश। तुम बिन जीना नही विदेशिया,पढ लेना संदेश। माटी मानुष तुम्हे बुलाए, छोड के आ परदेश।   2. चटोरी नयन  चटोरी नयन हो गयी, पिया मिलन की आस में। निहारत…

  • फिर लौट कर नहीं आते | Patriotic poem in Hindi

    फिर लौट कर नहीं आते ( Phir laut kar nahin aate )   मर मिटते वो सरजमीं पर समर में शौर्य दिखलाते बलिदानी पथ जाने वाले फिर लौटकर नहीं आते   शौर्य पताका जिनके दम से व्योम तलक लहराती महावीर जब रण में उतरे बैरी दल सेनायें थर्राती   गोला बारूद खेल खेलकर पराक्रमी रण…

  • बाजार | Geet bazaar

    बाजार ( Bazaar )   नफरत का बाजार गर्म है स्वार्थ की चलती आंधी। निर्धन का रखवाला राम धनवानों की होती चांदी। बिक रहे बाजार में दूल्हे मोटर कार बंगलो वाले। मांगे उंचे ओहदे वालों की संस्कार जंगलों वाले। आओ आओ जोत जलाओ कलम का जो धर्म है। नफरत का बाजार गर्म है -2  …

  • पर्यावरण | Paryavaran

    पर्यावरण ( Paryavaran )    विविध जीवों का संरक्षण मान होना चाहिए। स्वस्थ पर्यावरण का संज्ञान होना चाहिए।। प्रकृति साम्यता रहे धरा का भी श्रृंगार हो, वृक्षों की उपयोगिता पर ध्यान बार बार हो। वृक्ष, प्राणवायु फल छाया लकड़ियां दे रहे, उसके बदले में हम उनकी संख्या न्यून कर रहे। ‘दस पुत्र समो द्रुम:’ यह…

  • पिताजी आप कहाॅं चलें गए | Pitaji

    पिताजी आप कहाॅं चलें गए ( Pitaji aap kaha chale gaye )    अनेंक उपकार करके पिताजी आप कहाॅं चलें गए, अपनें दुःख ग़म को छुपाकर आप संग ही ले गए। निश्छल आपका प्यार हम पर बरसा कर चलें गए, हज़ारों खुशियां हमको देकर आप कहाॅं चलें गए।। जीवन के कई उतार-चढ़ाव मुझको सिखाकर गए,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *