इज्ज़त का सवाल

इज्ज़त का सवाल

“बेटा, मैंनें तेरा रिश्ता अपने दोस्त रोशन की बेटी मालती से तय कर दिया है। यह बता, तुझे छुट्टी कब मिल रही है? मैं चाहता हूँ कि तू एक बार मालती से मिल ले।” फोन पर राधेश्याम ने दूसरे शहर में तैनात अपने नवनियुक्त पीसीएस अधिकारी बेटे मोहित से कहा।

राधेश्याम का यह फैसला सुनकर मोहित को गुस्सा आ गया। वह नाराजगी व्यक्त करते हुए पिता से बोला-

“पिताजी, आपको मेरी शादी तय करने से पहले मुझसे पूछना तो चाहिए था। यह गलत है। आप उन्हें मना कर दीजिए। मैं वहां शादी नहीं कर सकता।”

“क्यों? तुझे वहाँ शादी करने में क्या दिक्कत है? लड़की आदत-व्यवहार में अच्छी है, खूबसूरत है, पढ़ी लिखी है और क्या चाहिए।”

“आप गलत समझ रहे हैं। बात यह है कि मैं कोचिंग समय से ही नीलम से प्यार करता हूँ। मैं उसको वचन दे चुका हूँ कि मैं उसी से शादी करूंगा।” यह सुनकर राधेश्याम को गुस्सा आ गया। उनको यह उम्मीद नहीं थी कि मोहित उनका कहना नहीं मानेगा या अपनी चलायेगा।”

“पीसीएस अधिकारी बन गया है तो क्या अपनी चलायेगा? अब तू फैसला करेगा कि किससे शादी करनी है और किससे नहीं? मेरा बाप बनने की कोशिश मत कर। बेटा बनकर ही रहेगा तो ज्यादा अच्छा होगा। यह बात गांठ बांध लें कि हमने भी अपने मां-बाप की पसंद से शादी की थी।

अब तुझे भी वहीं करनी पड़ेगी, जहां मैंने तय की है। तेरी मम्मी को भी मालती पसन्द हैं। एक काम कर, शीतल को मना कर दे, उससे बोल दे कि मैंने अपनी शादी के लिए घर पर बात की लेकिन मेरे माँ बाप शादी को राजी नहीं हो रहे हैं। तुझे वह भूल जाए।”

“अगर यही बात मैं आपसे कहूँ तो? आप अपने दोस्त की लड़की से शादी की बात को भूल जाओ, उनको मना कर दो तो…”

“तू क्या चाहता है कि मैं समाज में मुँह दिखाने लायक ना रहूं। मैंने बिरादरी की भरी पंचायत में अपने दोस्त को जबान दी है कि मैं तेरी शादी उनकी बेटी से करवाऊंगा। मैं अपनी जबान से नहीं फिर सकता। यह मेरी इज्जत, प्रतिष्ठा का सवाल है।”

“लेकिन पिताजी, मेरी जिंदगी का क्या?”

“मैं कुछ नहीं जानता और न ही कुछ सुनना चाहता। बस ये समझ ले कि तेरी शादी मालती से ही होगी। मां-बाप हमेशा अपने बच्चों की हमेशा भलाई चाहते हैं। हम तेरे दुश्मन नहीं है।”

“पिताजी, मैंने सोचा लिया है कि मैं मालती से शादी नहीं करूँगा।”

“आखिर तू चाहता क्या है कि मैं जीते जी मर जाऊं? ध्यान रखना.. अगर तूने मेरा कहना ना माना, मेरी समाज में प्रतिष्ठा, इज्जत मिट्टी में मिलाई… नीलम से शादी की तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।”

“मैं किशोरावस्था से ही आपकी धमकी सुनता आ रहा हूँ। मैं शादी के बाद जीते जी रोज मरूं, इससे अच्छा है कि आप आत्महत्या ही कर लो।” पड़ोस में खड़ी रुक्मिणी बाप बेटे की यह तीखी बहस सुन रही थी। आत्महत्या वाली बात सुनकर वह चुप न रह सकी। मोहित को डाँट लगाते हुए बोली-

“अपने बाप से बात करने की तमीज भूल गया है क्या? यह क्या बोल रहा है? होश में भी है या नहीं? तुझे वो लड़की प्यारी है, हम नहीं?”

“ऐसा नहीं है माँ। पिताजी मुझे समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। जब देखो आत्महत्या की धमकी देकर मुझे टॉर्चर करते हैं। आप सब जानकर भी अनजान बनती हो। क्या आपको नहीं पता कि मैं पिछले 15 सालों से आत्महत्या ही तो कर रहा हूँ। मैं कभी भी पीसीएस अधिकारी नहीं बनना चाहता था।

पिताजी पीसीएस अधिकारी बनना चाहते थे लेकिन बन न सके तो अपने सपनों को पूरा करने के लिए इन्होंने मेरी जिंदगी दांव पर लगा दी। मुझे एक बार भी आप लोगों ने अपनी मर्जी का न करने दिया। हमेशा अपनी चलाई। मुझे प्रताड़ित करके अगर आपने मुझे सफल इंसान भी बना दिया तो क्या?

मेरे सपनों का तो तुमने गला घोंटा ही है। हर जगह अपनी चलाना गलत है। कभी किसी मामले में हमारी राय से भी काम किया होता तो हमें भी अच्छा लगता। मेरी शादी के इस फैसले में आज भी अगर आपने अपनी मर्जी थोपने की कोशिश की तो मुझसे बुरा कोई न होगा।

आप मेरी नज़र में अपने प्रति नफरत पैदा कर लेंगे जो आपको आजीवन भारी पड़ेगी। बच्चों की खुशी का मतलब उनकी इच्छा, उनके सपनों का सम्मान करना होता है.. अपनी इच्छाओं को थोपना नहीं होता। हम जहाँ गलत है, हमें बताओ, समझाओ, हमें कन्वेंस करो… लेकिन दबाव मत डालिए। यह मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है। ईश्वर ना करें, आपके दबाव से परेशान होकर, मानसिक प्रताड़ना से गुजरकर मैं आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाऊँ।

तब आपकी समाज में इज्ज़त, प्रतिष्ठा का क्या होगा? तब आप पर क्या बीतेगी? कभी सोचा है? मैं आपकी इज्जत करता हूँ, सम्मान करता हूँ। आपने मुझे जीवन दिया है और मैंनें भी अपने सपने मारकर, आपके सपनों को भी पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

लेकिन अब मैं और ज्यादा अपनी जिंदगी के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता। जो लड़की मुझे पसंद है, जिस लड़की को मैं प्यार करता हूँ, मैं शादी उसी से करूंगा। यह मेरा अंतिम फैसला है। इसके बाद भी आपको लगता है कि आप सही हो और मैं गलत तो आप बेशक आत्महत्या कर सकते हैं। मुझे कोई अफसोस नहीं रहेगा। आप सोच समझकर कल तक अपना निर्णय मुझे बता देना।” किशोरावस्था से लेकर अब तक कि अपने मन की सारी भड़ास निकालकर मोहित ने फोन कट कर दिया।

अगली सुबह राधेश्याम ने अखबार में पढ़ा “दूसरी जगह शादी तय करने से क्षुब्ध युवक ने की आत्महत्या”। यह पढ़कर उनकी रूह कांप उठी। कहीं मोहित भी मेरे दबाब में आकर आत्महत्या न कर बैठे? नहीं नहीं… ऐसा हरगिज़ नहीं होगा। उनको एहसास हो गया कि मोहित अपनी जगह बिल्कुल सही है, उसकी कही हर बात सच्ची है।

वे अब तक यही करते आये थे। उनको एक बार मोहित की राय अवश्य लेनी चाहिए थी, आखिर मोहित की पूरी जिंदगी का सवाल है। अब तक उन्होंने अपनी चलाई, अपने सपनों को उस पर थोपा, उसने चुपचाप अपने सपनों को छोड़कर मेरे सपने पूरे किए।

अब ऐसा नहीं होगा। मोहित अब और कुर्बानी नहीं देगा। वे अब एक आदर्श पिता बनकर दिखाएंगे। अब वह अपने बेटे को समझेंगे, उसकी राय को सम्मान देंगे। कुछ देर सोचकर अचानक वे उठे और तैयार होने लगे। उनको तैयार होता देखकर रुक्मिणी ने पूछा-

“क्या हुआ? तैयार होकर किधर चल दिये?”

“मोहित का मालती से रिश्ता खत्म करने। उम्मीद है कि इससे रोशन से मेरी दोस्ती में फर्क नहीं पड़ेगा। वह मुझे समझेगा। जरूरत पड़ी तो रोशन से माफी मांग लूंगा। इसी में मोहित, मालती और नीलम की भलाई है। मोहित को भी की अपनी जिंदगी जीने और अपने सपनों को पूरा करने का हक है।”

यह कहकर राधेश्याम घर से निकल गए। आज रुक्मिणी, राधेश्याम के झुकने पर, मोहित को समझने पर, उसके हक में फैसला सुनाने पर खुशी महसूस कर रही थी। यह सबके लिए उचित निर्णय भी था।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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