जाने हमनी के का हो गइल बा
जाने हमनी के का हो गइल बा

जाने हमनी के का हो गइल बा ?

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काम पर वोट ना केहू मांग#ता,
ना केहू दे#ता !
काम कइला से ना कोई खुश होता,
ना केहू रूस#ता !
केकरा के देबे के बा# ?
पहीलहीं से फिक्स बा !
ओहमे कवनो एने ओने ना होखी-
चाहे उम्मीदवार केतनों सज्जन आ पढ़ल बा,
इ समाज जाति धरम के नाम पर बंटल बा।
नेता लोग एके खूबे बूझ रहल बा#,
दिने राते आपन हिसाब जोड़ रहल बा।
हमनी पाले ना मुद्दा बा ना कवनो सोच बा,
कह# तानी# जा कि-
जवन बा तवने ठीक बा!
इ नेताजी के खातिर फायदे बा#;
उनका त# जीत#ला से मतलब बा।
विकास क# के का होइ ?
कवनो फायदा नइखे,
वोट मिलिए नू जाता अइसे;
एहीसे भरमा के चल जा ताड़े जइसे तइसे।
उनकर जोड़ घटाव पक्का होला,
बाकी त# गंउआ में एही तरे हल्ला होला।
वोट के दिन सब मुद्दा गौण हो जाला,
अपने जाति मजहब आ पार्टी के चिन्ह चिन्ह दियाला।
समाज के एही बुराई के फायदा उठावेलन नेता ,
विकास के नाम पर अपन जेब भरेलन नेता।
जबले हमनीं के लड़त रहब आपस में-
फायदा उठावत रहींए इ नेता!
देखीं अबकी इलेक्शन में का होता?
10/11 के फैसला होइए जाई,
के# जीतल के# हारल सब बुझाई;
आ टीबीयो पर हल्ला कम हो जाई।

 

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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