जब भी कोई कहीं बिखरता है

जब भी कोई कहीं बिखरता है

जब भी कोई कहीं बिखरता है
अक़्स माज़ी का खुद उभरता है

क्यूँ रखूँ ठीक हूलिया अपना
कौन मेरे लिए संवरता है

चाहतें कब छिपी ज़माने में
क़ल्ब आँखों में आ उतरता है

वस्ल में हाले-दिल हुआ ऐसा
पेड़ झर झर के जब लहरता है

बात कर लेना हल नहीं लेकिन
जी में कुछ पल सुकूं ठहरता है

कुछ तो बतला मुझे ए अच्छे वक़्त
इतनी तेज़ी से क्यूँ गुज़रता है

सिर्फ अपने ही मन की करता हूँ
इसलिए भी ‘असद’ अखरता है

असद अकबराबादी 

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