मेरे साथ साथ | Mere Sath Sath

मेरे साथ साथ

( Mere Sath Sath )

पहाड़ बन के मेरे साथ साथ चलता रहा
वो एक टुकड़ा था बादल को जो बदलता रहा

लिपट गई तो कलेजे को पड़ गई ठंडक
और इतनी ठंड की फिर रोम रोम जलता रहा

जो लोग पहले ग़लत कर चुके दुआ उनको
उन्हीं को देख के हर गाम मैं संभलता रह

मैं कोशिशों में ही मसरूफ़ रह गया बरसों
न जाने कब मेरे हाथों से सब फिसलता रहा

मैं उसका दोस्त बड़ा खास दोस्त था फिर भी
किसी की हो गई वो और मैं हाथ मलता रहा

असद अकबराबादी 

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