कर दे जो दूर ग़म

कर दे जो दूर ग़म

कर दे जो दूर ग़म

कर दे जो दूर ग़म को किसी में हुनर नहीं
यारब क्या ग़म की रात की होगी सहर नहीं

तड़पे जिगर है मेरा ये उनको ख़बर नहीं
ये आग इश्क़ की लगी शायद उधर नहीं

घर से निकलना आज तो मुश्किल सा हो गया
महफ़ूज नफ़रतों से कोई रहगुज़र नहीं

चलती है चाल रोज़ सियासत नई नई
जनता की अश्को-आह का कोई असर नहीं

रोटी मकान कपड़े की तो जंग हो रही
लाशें बिछीं ग़रीबों की है दर्द पर नहीं

ढूँढा हज़ार हमने मगर इस जहान में
आती जहाँ न मौत हो ऐसा नगर नहीं

कैसे हो नाज़ मीना हमें अब नसीब पर
दौलत ग़मों की पायी है लाल-ओ-गुहर नहीं

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

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