Kavita devtaon ki diwali

देवताओं की दिवाली | Kavita devtaon ki diwali

देवताओं की दिवाली

( Devtaon ki diwali ) 

 

 

भारतवर्ष के त्योंहारों की यह बात है बड़ी निराली,

कार्तिक माह में पूर्णिमा को मनातें है देव दीवाली।

हंसी ख़ुशी संग मनातें है कोई पर्व न जाता ख़ाली,

काशी की पावन धरा पर उतरे मनाने देव दीवाली।।

 

एक वक्त त्रिपुरासुर दैत्य का बढ़ गया यह आतंक,

ऋषि मुनि नर नारी एवं देवो के लिए बना घातक।

तब भगवान शंकर ने काटा उस असुर का मस्तक,

उसी ख़ुशी में बधाई देने आए देवगण काशी तक।।

 

हिन्दू पंचांगो के अनुसार तब आऐ थें वहां देवगण,

है आज भी वहां पर उन देवगणों के कमल चरण।

आतें है हर वर्ष ज़हां देव दीवाली को भ्रमण करने,

मिलता है आशीष उन्हें और पाते ईश्वर की शरण।।

 

मुख्य रुप से काशी में जो गंगा तट पे मनाई जाती,

जिस दिन चारों और काशी में सजावटे की जाती।

गंगा घाट के चारों और मिट्टी के दीये जलाएं जातें,

शुभ-मुहूर्त और पूजन विधि से पूजा ‌कराई जाती।।

 

होती है मनोकामनाएं पूर्ण जो भक्त यहां पर आते,

दीपदान करके वहां देवताओं की कृपा दृष्टि पाते।

होता है महत्वपूर्ण इस दिन का गंगा नदी मे स्नान,

रोग दोष एवं कष्ट-पीड़ा उन सभी के दूर हो जाते।।

 

 

रचनाकार :गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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