नजारा | Kavita Nazara

नजारा

( Nazara )

रंग बिरंगी प्रकृति देखो,
यौवन के मद मे झूमे,
पर्वत पेंड़ों की ये श्रंखला,
आकाश नारंगी को चूमें,

हरित धरा पर सुमन खिले हैं,
बनी मेखला गलियारा,
कौन भला इस यौवन पर
नही है अपना हिय हारा,

अरुणोदय मे अस्ताचल का,
अद्भुत देख नजारा,
कुछ और देर को ठहर मै जाऊं,
कहे ये मौसम है प्यारा।

Abha Gupta

आभा गुप्ता
इंदौर (म. प्र.)

यह भी पढ़ें :-

मेरे मन का दर्पण | Kavita Mere Man ka Darpan

Similar Posts

  • हिंदी दिवस पर छोटी सी कविता

    हिंदी दिवस पर छोटी सी कविता ( Hindi diwas par chhoti si kavita ) सामान्य व साधारण भाषा बोलकर जीवन जीना नहीं होता है कोई विशेष काम, असाधारण प्रतिभा का धनी ही जीतता है जीवन का कठिन संग्राम । प्रवाह के साथ तो हर कोई बहता है, उसके विपरीत जो चलने वाला ही हर मुश्किल…

  • दुःख होता है | Dukh hota hai

    दुःख होता है ( Dukh hota hai )     तेरे हंसने पर मैं भी हँसने लगता हूँ तेरे दुःख से मुझे भी दुःख होता है तेरे दुःखी होने पर भी मुझे दुःख होता है तेरे रोने पर मुझे भी रोना आता है।   पर, मैं तेरे साथ रो नहीं पाता हूँ…. इसका ग़म मुझे…

  • Hindi Poetry On Life | Hindi Kavita | Hindi Poem- भाग्य

    भाग्य ( Bhagya )   एक  डाली  टूट  कर,  गिर  के  जँमी पे आ गयी। अपनों से कटते ही, दुनिया की नजर में आ गयी।   बचना  है  उसको, बचाना  है  यहाँ  अस्तित्व को, द्वंद   में   ऐसी  पडी,  घनघोर  विपदा  आ  गयी।   किसको अपना मानती, सन्देह किस पर वो करे। इससे  थी अन्जान  अब,…

  • धरती के भगवान | Kavita dharti ke bhagwan

    धरती के भगवान ( Dharti ke bhagwan )   आज धरा पर उतर आए धरती के भगवान। मारना नहीं काम हमारा हमतो बचाते जान।   जीवनदाता जनता का कातिल कैसे हो सकता है। जान फूंके मरीज में अन्याय कैसे सह सकता है।   राजनीति का मोहरा सतरंजी चाले मत खेलो। जिंदगी देने वाले को मौत…

  • अलविदा | Alvida

    अलविदा ( Alvida )   मैने पल-पल गुजारा है, तेरे संग-संग बिताया है। तुझे अलविदा क्या कहना, तू दिल में समाया है। तुझे अलविदा…।। कुछ खट्टी मीठी बातों में, जिन्दगी को गुजारा है। यादों के सहारे जो मैने, हर पल दिल लगाया है। क्या परायों की आस करे, मेरे अपने तो अपने है, अपने के…

  • लौटआओगे तुम | Love Kavita

    लौट आओगे तुम ( Laut aaoge tum )   याद है एक बर्फीली पहाड़ी शाम सफेद चादर सी दूर तक फैली बर्फ देवदार के वृक्ष ठंडे ,काँपतें तुम्हारे हाथों की वो छूअन मात्र से पिघलने लगा मेरा रोम,रोम आँखों में तेरी मदहोशी लवों पर मुस्कान कानों में गूँजती वो निश्चल हँसी खो गये जो पल…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *