Poem Ginti ki Saanse

गिनती की सांसे | Poem Ginti ki Saanse

गिनती की सांसे

( Ginti ki Saanse )

 

फूटल कौड़ी साथ में केहू न लेके जाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।

पाप और पुण्य कै ई बाटे दुई डगरिया,
दुई दिन कै जिनगी बा, छूटी ई बजरिया।
सोनवाँ जस देहियाँ के दीहैं लोग जलाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।
फूटल कौड़ी साथ में केहू न लेके जाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।

मोह के तू खोह में न सूता ऊ मचनवाँ,
गरदा जमें न पावे, मन के गगनवाँ।
मिली प्रभु जी कै दर्शन जब करबा सफाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।
फूटल कौड़ी साथ में केहू न लेके जाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।

खोजा अपने नइया कै अब तू खेवइया,
बहुत खाई चुकला तू अबतक मलईया।
छूटी घर-द्वार और छूटी ऊ लुगाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।
फूटल कौड़ी साथ में केहू न लेके जाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।

गिनती की साँसें तू बेकार न गँवावा,
छल औ कपट से न तनिको सजावा।
पिंजड़ा से सुगवा अकेले उड़ी जाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।
फूटल कौड़ी साथ में केहू न लेके जाई,
लूटा मत दुनिया के सुना मेरे भाई।

Ramakesh

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )

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