Kavita Saal ke Barah Maah

साल के बारह माह | Kavita Saal ke Barah Maah

साल के बारह माह

( Saal ke Barah Maah )

चमके सूरज चैत मे, ताप बढ़े वैशाख
जेठ तपन धरती जरे, बरे पेड़ सब राख।

गरमी से राहत मिले, बरसे जब आषाढ़
सावन रिमझिम मेघ से,भादो लागे बाढ़ ।

क्वार द्वार सूखन लगे,मौसम की नव आस
गर्मी में नरमी आए, शीतल कार्तिक मास ।

अगहन सघन ठंड पड़े, सुंदर लागे ताप
पूस प्राण पाला हरे, तन मन जाए काप।

शीतल सुखद वात चले, आए जबसे माघ
फागुन मस्त महीना मे,दिल को भाए राग।

कभी गर्मी जाड़ा पड़े,कभी बरखा बहार
अपने समय पर आवत, देखो मौसम चार।

बारह माह में छः ऋतु, अलग अलग व्योहार।
एक भरोसे एक बल, जीवन का आधार।

कोई सरल कठोर है ,कोई माह अनुकूल
निज सीमा मे रहत सब ,कोई करे न भूल।

कवि :  रुपेश कुमार यादव ” रूप ”
औराई, भदोही
( उत्तर प्रदेश।)

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