Kavita waqt ki raftar

वक्त की रफ्तार | Kavita waqt ki raftar

वक्त की रफ्तार

( Waqt ki raftar )

 

 

तेजी से बीता जाता है पल पल रे संसार
 शनै शनै यूं बदल रही है वक्त की रफ्तार

 

माना सड़के सुंदर हो गई लबों पर लग गए ताले
पत्थर दिल दिखाई देते अब कहां गए दिलवाले

 

भागदौड़ से भरी जिंदगी ये वक्त बदलता जाता
चंद सांसों का खेल सारा समय नहीं रूक पाता

 

हाथी घोड़े महल राजा के सैनिक रखते बेशुमार
कालचक्र में समा गए हैं बदली वक्त की रफ्तार

 

कलयुग डिजिटल हुआ सांकेतिक भाषायें सारी
कोरोना की गाज गिरी कैसी आई भीषण महामारी

 

त्राहि-त्राहि फैली दुनिया में मच गया सब हाहाकार
समय बदलते देर ना लगे बदले वक़्त जब रफ्तार

 

   ?

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

https://thesahitya.com/vairagya-kavita/

Similar Posts

  • किसने देखा | Kavita kissne dekha

    किसने देखा ( Kissne dekha )      कल के कल को किसने देखा ना हमने ना तुमने देखा जीवन के हर गुणा गणित में तू -तू, मैं -मै सबने देखा,   बिन मौसम बरसातें देखा कितने दिन और रातें देखा बदल गये सूरज चंदा क्या? बदला क्यों जज्बातें देखा?   बहती सर्द हवाएं देखा…

  • एक बार मनुहार करना जरूर

    एक बार मनुहार करना जरूर नदी की तरह तुम बहना जरुर,सुभावों को नमन करना जरूर। मन का मीत जब मिल जाए,एक बार मनुहार करना जरुर। मनुजता की पहली पसंद प्रेम,जीवन में सच्चा प्रेम करना जरुर। गम का शोर बेहिसाब समुन्दर में,नदी बनकर समुद्र से मिलना जरूर । झुरमुट की ओट से झांकती चाँदनी,चाँद संग सितारों…

  • सोच की संकीर्णता | Soch ki Sankirnata

    सोच की संकीर्णता ( Soch ki sankirnata )    पानी है अगर मंजिल तुम्हे, तो कुछ फैसले कठोर भी लेने होंगे जिंदगी की हर ऊंचाई का पैमाना निश्चित नही होता.. कभी कभी सोच की संकीर्णता स्वयं की प्रतिभा को ही निखरने नही देता…. बढ़ाएं तो आएंगी ही कभी अपने से कभी अपनों से और कभी…

  • पीढ़ी का भविष्य | Pidhi ka Bhavishya

    पीढ़ी का भविष्य ( Pidhi ka bhavishya )   चाहते हो यदि रखना सुरक्षित कल के भविष्य को तुम अपने तब खोलिए तुम अब आंख अपनी बदलते दृश्य को भी जरा समझिए… पूर्वानुमान ही रचता है भविष्य वर्तमान तो केवल बचाता है भविष्य हाथों तुम्हारे ही होगा निर्भर भविष्य अतीत भी तुम्हे दिखलाता भविष्य….. कलम…

  • वो काले बादल | Wo Kale Badal

    वो काले बादल ( Wo Kale Badal ) वो काले बादल वो गीली मिट्टी वो बरसती बूंदे वो लहराते आंचल वो थिरकते पैर वो भीगी आजादी वो खुशहाल चहरे वो मिठे गीत वो काले बादल वो गीली मिट्टी वो बरसती मोहब्बत वो बिखरी जुलफे वो शरारती बाते वो लहराते आंचल नाज़ अंसारी यह भी पढ़ें:-…

  • .खुद से जंग लड़ने लगा हूं | Khud se

    .खुद से जंग लड़ने लगा हूं ( Khud se jang ladne laga hoon )    मैं आज कल खुदसे जंग लड़ने लगा हूं, मैं कितना काबिल हू इसी कोशिश में खुदको आजमाने लगा हूं, काँच जैसा चमकने के लिये, बिखरने लगा, चाँद जैसा निखरने केलीये, आजकल मैं खुदसे लड़़ने लगा हूं। कामियाबी हासिल करने के…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *