किधर जाता है
किधर जाता है
राह-ए-उल्फ़त से परेशान, किधर जाता है
अपनी मंज़िल से भी अनजान किधर जाता है
झूठ से हार के नादान किधर जाता है
मार के अपना तू ईमान किधर जाता है
बिक रहा हूँ सरे बाज़ार तेरी शर्तो पर
दे के मुझको तू ये नुक़सान किधर जाता है
तेरी यादों का उठा था जो मेरे सीने से
देखना है कि वो तूफ़ान किधर जाता है।।
मैं इसी सोच में उलझी हूँ बड़ी मुद्दत से
बाद मरने के ये इंसान किधर जाता है।
क़त्ल करती हूँ हर इक लम्हा तेरी यादों का
तू बना के मुझे श्मशान किधर जाता है
मयकदा भी है, तेरा घर भी, सनम-ख़ाना भी
आज़माना है कि अब ध्यान किधर जाता है।।
नेकियाँ छोड़ के जिसने जो कमाया मीना
देखिए ले के वो सामान किधर जाता है।।

कवियत्री: मीना भट्ट सिद्धार्थ
( जबलपुर )
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