Kavita Maa ki Yaadein

मां की आँखों के हम भी तारे हैं

मां की आँखों के हम भी तारे हैं

मां की आँखों के हम भी तारे हैं
मेरे जैसे ज़मीं पे सारे हैं।

इक नदी सी है ज़िन्दगी यारो
सुख के मिलतें नहीं किनारे हैं

देखता आजकल जिधर मुड़कर
हर तरफ़ ग़म के आज मारे हैं

हम ख़ुशी की तलाश में अब तक
ग़म के मारे थे ग़म के मारे हैं।

तुमको शृंगार की जरूरत क्या
दिल तो हम सादगी पे हारे हैं

क्या करें हम बखान तेरा अब
तेरे अंदाज ही तो न्यारे हैं

लौट आओ न भूलकर राहें
राह तेरी प्रखर बुहारे हैं

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

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