क्या कहने | Kya Kahne
क्या कहने
इक तो जुल्फें दराज़, क्या कहने
उसपे बाहें ग़ुदाज़, क्या कहने
मुँह को तेड़ा किये यूँ बैठे हैं
हुस्न और उसपे नाज़, क्या कहने
अहले-दुनिया को ताक पर रख कर
एक उसका लिहाज़, क्या कहने
जब भी गाऐ तो अंदलीब लगे
उस पे परवाज़-ए-बाज़, क्या कहने
गुफ़्तुगू भी पहेलियों जैसी
और आँखों में राज़, क्या कहने
कल तलक था ‘असद’ नशेबों में
आज इतना फराज़, क्या कहने

असद अकबराबादी







