Kyon Nahin Aate

क्यों नहीं आते | Kyon Nahin Aate

क्यों नहीं आते

( Kyon nahin aate ) 

वज़्न 1222 1222 1222 1222
अरकान -मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन
बाहर का नाम – बहरे हजज़ मुसम्मन सालिम

 

ग़म-ए-दिल कैद से आज़ाद होकर क्यों नहीं आते
रिहाई को खड़ी, खुशियां बुलाकर क्यों नहीं आते ॥

सही है, दोस्त होते सब, मगर जब कैफियत आड़ी
घुमाते पीठ पीछे सब, मुयस्सर क्यों नहीं आते ॥

यकीनी जब कभी मिलते, शबब नाशाद-ए-दिल पूछे
मगर जश्न-ए-फ़ज़ा में मुस्कुराकर क्यों नहीं आते ॥

हमें इंकार है कब धड़कने दिल में तुम्हारी हैं
जहाँ के फ़ासले सारे मिटाकर क्यों नहीं आते ॥

नज़र जिस शय पे पड़ जाए नहीं सारे नज़ारे वे
सिरात-ए-दिल नज़र से तुम बनाकर क्यों नहीं आते ॥

सुना नाज़-ए-निगारा है पड़ी भारी बहुत उसको
समाकर रूह में, माजी भुलाकर क्यों नहीं आते ॥

कलाम उनका बहर-ओ बर में चर्चा भी उन्ही की है
रुबाई भी उन्ही की, नज़्म गाकर क्यों नहीं आते ॥

 

सुमन सिंह ‘याशी’

वास्को डा गामा,गोवा

 

शब्द :-

कैफियत = हाल, समाचार
आड़ी = तिरछा / प्रतिकूल
मुयस्सर = काम/ उपलब्ध
सिरात-ए-दिल = दिल का रास्ता
शबब नाशाद-ए-दिल = दिल की उदासी का कारण
जश्न-ए-फ़ज़ा = जश्न का माहौल
नाज़-ए-निगारा = सुंदरता (माशूका) के नखरे
कलाम =लेखनी
रुबाई = चार पंक्तियों की एक कविता(अरबी)

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