मां | Maa par Laghukatha

एक विद्यालय में महिला अभिभावक अपने बच्चों के एडमिशन के लिए आई वह प्रधानाचार्य जी से कहे जा रहे थी -“देखिए यह सामने दरवाजा लगा दीजिएगा । वह बाहर साइड में बच्चा ना जाने पाए । मैडम जी! यह बच्चा हमें बहुत समय बाद पैदा हुआ है ।

इसे मैं गली में भी नहीं खेलने देती । गली में मोटर गाड़ी आती रहती हैं। कहीं कुछ हो जाए तो मैं जीवित नहीं रह पाऊंगी। मैं बच्चों की परवरिश में कुछ भी कमी नहीं रखना चाहती। देखिए मैडम जी ! बच्चों को कुछ ज्यादा ना आए चलेगा ।

अभी छोटा है परंतु बच्चों के साथ कुछ नहीं होना चाहिए।” महिला के कहने के साथ ही उसकी आंखों में दर्द, प्रेम ,करुणा वात्सल्य के अनेकों भाव एक साथ उमड़ घुमड़ रहे थे। मातृत्व की साक्षात मूर्ति लग रही थी वह।

कहते हैं कि ईश्वर शरीर धारण नहीं कर सकता इसलिए उसने मां की रचना की। मां तो ईश्वर का साकार रूप है। बच्चों के प्रति कितने अरमानों से वह पालती पोसती एवं बड़ा करती है। जिस मां-बाप ने बच्चों को चलना सिखाया था वही बच्चा बड़ा होकर मां-बाप को चुप रहना सिखाता है तो इससे बड़ा दुख उसके लिए क्या हो सकता है।

मां ही है वह जिसकी गोदी में निखालिस प्रेम मिलता है। प्रेमा की शादी हुए लगभग 15 वर्ष बीत चुके हैं। कहां नहीं था जहां वह ना गई हो एक बच्चे की आस लिए।
मां मंदिर भी जाती है,
मां मस्जिद भी जाती है।
मां गुरुद्वारे भी जाती है तो
मां गिरजाघर भी जाती है। किसकी दुआ लग जाए मुन्ने को,
इसलिए वह दीन धर्म भी भूल जाती है।
एक स्त्री होना सरल है लेकिन मां होना सबसे कठिन है। मां का नाम निराश व्यक्ति के जीवन में आशा का प्रकाश है। मां की गोद अशांत थके पथिक के लिए शीतल छायादार पेड़ की तरह विश्राम स्थली है ।मां के गोद स्वास्थ्य सुख सौंदर्य शांति क्षमता एवं सौजन्य की आहट हैं।

मां प्रेम की भाषा है जो हर प्रांत देश-विदेश में बोली समझी जाती है। सद्भावना संदेश है ।मां की ममता गैरों को अपना बनाने का गुरु मंत्र है। मां की गोद एक ऐसी उर्वरा भूमि है जहां प्रेम के बीज अंकुरित होते हैं ।

करुणा के फूल खिलते हैं । स्नेह सुरभि आती है। मां का प्यार मिले तो लड़खड़ाते जिंदगी भी हंसी से खिल जाती है। मौत भी हिल जाती है । मां की सेवा ही प्रभु की सच्ची सेवा है।
मां से बड़ा कोई धर्म नहीं। मां से बड़ी कोई इबादत नहीं । मां प्रार्थना है ।एक दिव्य आराधना है पावन अर्चना है ।अनोखी उपासना है।

वर्तमान समय में संपूर्ण मानवता घृणा, द्वेष , नफरत , ईर्ष्या में जली जा रही है। निज स्वार्थ के आगे कोई किसी की कदर नहीं कर रहा है। पारिवारिक विघटन बढ़ रहा है । भावनाएं धनलोलुपता के आगे कुचली जा रही हैं ।

भाई भाई के बीच दरारे बढ़ रही हैं। संपूर्ण मानवता बारूद के ढेर के आगे बौनी साबित हो रही हैं।हाईटेक टेक्नोलॉजी के युग में मनुष्य एक उपभोग की वस्तु बन कर रह गया है। घर-घर में राक्षसी प्रवृत्तियां डेरा जमा ली है।

संपूर्ण मानवता को शांति मां की गोद ही दे सकती है। जब हम दुःख में हो,तनाव चिंताओं से जिंदगी में हताश हो जाए तो मां से निर्मल मन होकर सभी गुबार निकाल दे। सारे दुखों को भूल जाए।
मां के उपकारों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

प्रेमा के दुख को समझा जा सकता है। आज भी समाज में किसी स्त्री को बच्चे ना होना उसको ही दोषी माना जाता है। बच्चे न होने का दोष स्त्री पर थोप दिया जाता है। कहा जाता है जब कोई स्त्री मां बनती हैं तो उसका पुनर्जन्म होता है। अब तक तो वह स्त्री थी अब मां हो गई।

 

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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