Maharishi Valmiki par Kavita

महर्षि वाल्मीकि | Maharishi Valmiki par Kavita

महर्षि वाल्मीकि

( Maharishi Valmiki )

 

बुरे कर्मों को छोड़कर सत्कर्मों में लगाया ध्यान,
साधारण इंसा से बनें महर्षिवाल्मीकि भगवान।
देवलोक के देवर्षि मुनि नारद जी के यह शिष्य,
प्रचेता के ये दसवें पुत्र और संस्कृत के विद्वान।।

महर्षिवाल्मिकी जीवन से मिलती प्रेरणा हजार,
जो कभी राहगीर को लूटकर भरा पेट परिवार।
आदिकवि एवं मुनि कहलाएं प्रसिद्ध रचनाकार,
श्रीराम का नाम जपकर हुऐं भवसागर से पार।।

एक रत्नाकर से बन गऐ यह महर्षि ऐसे महान,
महाकाव्य रामायण रचकर दिया सबको ज्ञान।
जीवन अपना बदल लिया बदल गया वह नाम,
जैसा करेगा वो वैसा पाऐगा ये बताया विधान।।

माता सिया को आश्रय दिया पुत्री लिया बनाई,
लव और कुश को ज्ञान दिया हरा न पाऐं कोई।
स्वर ज्ञान और पराक्रमी दिया अतुलित ये ज्ञान,
क्या घटेगा भविष्य में लिख दिया पहले बताई।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

पहला मिलन | Kavita Pahla Milan

Similar Posts

  • अक्षय तृतीया शुभ घड़ी | Kavita Akshay Tritiya Shubh Ghadi

    अक्षय तृतीया शुभ घड़ी ( Akshay tritiya shubh ghadi )   अक्षय हो सुख समृद्धि भरा रहे भंडार। जीवन में यश कीर्ति का हो जाए संचार।   अक्षय तृतीया शुभ घड़ी मंगलदाई हो योग। परिणय सूत्र में बंध युगल पाते पावन संयोग।   पावन तिथि को करे दान धर्म का काम। अक्षय धन पात्र रहे…

  • किसान | Kisan par Kavita

    किसान! ( Kisaan ) ( 3 ) हर तरफ होता किसान हि किसान है फिर भी किसान हि क्यों बेपहचान है गर्मी हो या ठंडी गुजर रही सब खेतों में हर मौसम में जूझ रहा वही नादान है दाना दाना चुगकर करता जीवन यापन तब हि हर महलों में पहुँच रहा राशन है जीवन प्यासा…

  • ना ही इंकार ना ही इजहार | Na hi inkar na hi izhar

    ना ही इंकार ना ही इजहार ( Na hi inkar na hi izhar )   ना ही इन्कार किया और ना ही इजहार किया। तुझको आँखों में बसा कर सिर्फ इन्तजार किया। मै भटकता ही रहा शाख, से टूटे पत्तो की तरह, तुझमे भी प्यार जगे, वक्त का एतबार किया।   उम्मीदों से भरे कलश…

  • कभी रुको जरा | Kabhi Ruko Zara

    कभी रुको जरा ( Kabhi ruko zara )   जिंदगी दौड़ती, भागती कहती है रुको थमो जरा पलट के तुम  देखो जरा पद चापो को सुनो जरा  फिर बचपन में आओ जरा  दरख़्त दरवाजे, खिड़कियां  सीढिओ को पहचानो जरा एक दिन बचपन जी लो जरा खिलखिलाहटों को सुनो जरा लगता है जैसे सब मिल गया…

  • धुंआ | Dhuaan

    धुंआ ( Dhuaan )   धुंये के कितने रंग…|| 1.उठता है ऊपर आसमान, छूने का जनून होता है | उसे देखकर लोगों मे, हलचल सा शुरूर होता है | भीड जमा होती है, जाने कितने सबाल होते हैं | धुंआ कहाँ से उठा है, पता कर के निहाल होते हैं | धुंये के कितने रंग…||…

  • रात पूस की!

    रात पूस की! **** पवन पछुआ है बौराया, बढ़ी ठंड अति- हाड़ मांस है गलाया! नहीं है कोई कंबल रजाई, बिस्तर बर्फ हुई है भाई। किट किट किट किट दांत किटकिटा रहे हैं, कांपते शरीर में नींद कहां? निशा जैसे तैसे बिता रहे हैं। चुन बिन कर लाए हैं कुछ लकड़ियां- वहीं सुनगा रहे हैं,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *