मेरा सपना

मेरा सपना

“कोई सपना देखा क्या?” पत्नी ने पति को नींद में बड़बड़ाते हुए देखकर… नींद से उठाकर कहा।

“हाँ, मैंने सपने में देखा कि मैं एक बहुत महँगी कार में बैठा जा रहा हूँ। अचानक सामने एक विशालकाय दैत्य आया। वह दैत्य मुझे कार सहित निगल गया है। उसके नुकीले दांतों से बचता हुआ मैं उसके पेट में चला गया। उसके पेट में मैंने सोने का ढ़ेर, नोटों की मोटी-मोटी गड्डियां, हीरे-जवारत आदि देखे। यह देखकर मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैं दैत्य के आगे हाथ जोड़कर बोला- हे विशालकाय दैत्य जी! मुझे घर जाने दो। मेरी डार्लिंग, मेरी प्यारी पत्नी घर पर मेरा इंतजार कर रही होगी।”

“तुमने सच में उस दैत्य से ऐसा कहा?” खुश होकर पत्नी ने सवाल किया।

“हाँ, मेरी रानी। फिर वह दैत्य बोला- ठीक है। मैं तेरी यह अंतिम इच्छा जरूर पूरी करूँगा। मैं तुझे घर भेज सकता हूँ, लेकिन केवल 48 घंटे के लिए। तेरे वापिस आने तक तेरी कार मेरे पास रहेगी। अगर तू वापस नहीं आया तो मैं तेरी कार को खा जाऊंगा और तुझे ढूंढकर तेरे परिवार सहित तुझे खत्म कर दूँगा।”

“फिर क्या हुआ?”

“खैर छोड़ो… है तो सपना ही। मैंने कुछ सोने के जवाहरात, हीरे, मोती व नोटों की कुछ गड्डियां अपनी पैंट की जेब और शर्ट के अंदर पहने बनियान में छुपा ली और बाहर निकल आया।”

“अच्छा एक बात बताओ, तुम्हें 48 घंटे मिले तो उन 48 घंटे में तुमने क्या-क्या किया?” पत्नी ने सवाल किया।

“सबसे पहले मैं अपने मां-बाप से मिलने घर गया। उनके जीविकोपार्जन हेतु रुपये दिए। फिर इसके बाद मैं अपने कार के लोन के रुपये चुकाने के लिए एजेंसी गया। उसके बाद मैं….” पति की बात सुनने से पहले ही पत्नी नाराज होकर दूसरे कमरे में चली गई।

“अरी भाग्यवान, आगे सुन तो सही..” पति बोला।

“पूरे दिन इस आदमी के लिए खाना मैं बनाऊँ, बच्चों का ध्यान मैं रखूँ और यह आदमी 48 घण्टों को यूं ही बर्बाद कर रहा है।” पत्नी गुस्से से बोली।

“अरी नाराज क्यों होती है? पहले पूरी बात तो सुन ले। यह जो अपना घर नीचा हो गया है, कमजोर पड़ गया है… फिर मैंनें आकर इसे ऊँचा करवाया, बहुत आलीशान मकान बनवाया। इसके बाद मैंनें अपने दोस्तों के साथ जाकर दो दो पेग पिए।”

पति द्वारा यह सपना सुनकर पत्नी रोने लगी।

“क्यों रो रही हो? अभी मैं मरा नहीं हूँ, जिंदा हूँ।”

“सपने में भी मरने से पहले तुम्हें अपने मां-बाप ही याद थे, तुम्हें गाड़ी का कर्ज चुकाना याद था… दोस्तों के साथ बैठकर दारू पीना याद था, मकान की मरम्मत करवाना, मकान बनवाना याद था लेकिन तुम्हें एक भी पल के लिए मेरी याद ना आई?”

“अरे पगली! कितनी नासमझ है तू! यह सब तो मैंनें तेरे लिए किया है। मेरे मरने के बाद तुझ पर मेरे मां-बाप बोझ ना बनें… इसलिए गाँव जाकर उनके जीविकोपार्जन का इंतज़ाम करके आया। लोन वाला तुझे लोन चुकाने के लिए परेशान ना करें..इसलिए उसका लोन चुकाया। मेरे दोस्त बिजनेस करते हैं तो उनको रुपये देकर आया ताकि व्यापार से हुए लाभ को वे हर महीने तुझ तक पहुंचाते रहें।”

“तुम्हारे मरने के बाद मुझे कोई तकलीफ ना हो इसलिए तुमने यह सब किया?” भावुक होकर पत्नी बोली।

“और नहीं तो क्या पगली?” पति बोला।

पति के गले लग कर पत्नी बोली- तुम्हारे बिना इन सबका मैं क्या करूंगी ? तुम ही मेरी सच्ची दोलत हो। तुम हो तो सब कुछ है मेरे पास।”

“सही कहा। मेरे लिए भी तुम ही सब कुछ हो, इसलिए जब मैं वापिस उस विशालकाय दैत्य के पास गया तो तुझे साथ लेकर गया।”

“लव यू मेरी जान” पत्नी बोली।

“लव यू टू” पति ने जवाब देते देते प्यार से कसकर पत्नी को बाहों में भर लिया।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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