मुझे बच्चा ही रहने दो

मुझे बच्चा ही रहने दो

क्या कोई मेरा दर्द जानेगा
मेरी पीड़ा को पहचानेगा
सबसे पहले तो आप सब को नमस्ते
तीन साल की उमर से टंगे भारी बस्ते
पापा और मम्मी के सपनो के वास्ते
रोज परीक्षा और परिणाम की टेंशन
पड़ोसी बच्चो के आगे निकल जाना होता मेंशन
स्कूल और परिवार का फर्स्ट आने का दबाब
कौन देगा मेरे बचपन का हिसाब
घूरती अंकलों और आंटी की नजरें खराब
मैंने भी तो देखें थे नन्नी आंखों में ख्बाव
दबाया और कुचला जाता रोज मेरा ख्बाव
जीतते कभी पापा मम्मी तो कभी दादा दादी के ख़्वाब
मेरे सपनों और बचपन का ना जाने कँहा भटक गया रास्ता
मुझे तो दिया जाता रोज संबंधों का नया वास्ता
अरे समाज के सभी परम सम्मानित
रोज रोज मुझे ना करो अपमानित
मैं तो छोटा सा डग भर
नापना चाहता हूँ आसमान और बनाना एक घोंसला
मुझे तो सर्फ आपका आशीष और प्यार देता है होंसला
मैं अपने पदचिन्ह खुद उकेरना चाहता हूँ चलने दो ना
पुराने मापदंडों के बंधन मत जकडो ना
प्लीज़ मैं बच्चा हूँ मुझे बच्चा ही रहने दो ना
खिलखिलाते।मुस्कारते।गुनगुनाते।सपनों को बुनने दो ना।

डाक्टर दीपक गोस्वामी मथुरा
उत्तरप्रदेश , भारत

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