नफरत भरी है जमाने में

नफरत भरी है जमाने में

नफरत भरी है जमाने में

नफरत भरी है जमाने में
दर्द भरा है दिवाने में
वह मजा नए में अब कहां
जो मजा होता था पुराने में।।

पैसा है तो अब प्यार है
मोहब्बत भी एक व्यापार है
इंतजार कौन करता है
जब बेवफा सरकार है।।

दौर कहां अब पुराना है
देवदास जैसा कोई दीवाना है
अब तो पैसे से दिल्लगी होती
प्यार तो एक बहाना है।।

भरोसा कहां अब दीवाने मे
जहर दे देते हैं लोग खाने में
दूर होते हैं जब कभी
देर नहीं लगती भूल जाने में ।।

कवि : रुपेश कुमार यादव ” रूप ”
औराई, भदोही ( उत्तर प्रदेश।)

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • सुभाष चंद्र बोस ने कहा था ( कविता )

    सुभाष चंद्र बोस ने कहा था ( कविता )     ‘नेता  जी’  निज  हिन्द सैना से, जोश  मे   भर  यूं   कहे  खङे। सबक  सिखाना  है  दुश्मन को फैसले    लेगे   आज    कङे ।।   ‘जयहिंद’ बोल के समर-भूमि मे, कदम     मिलाते   चलो   बढे। ऐसा  जोश  जिगर मे  भर  लो, दस-दस  के   संग  एक लङे ।।…

  • शरद पूर्णिमा का चांद | Sharad Purnima ka Chand

    शरद पूर्णिमा का चांद ( Sharad purnima ka chand )   चारू चंद्र का मनोरम स्वरूप कितना सुंदर कितना प्यारा, इसकी सुंदरता देख रहा है एकटक होकर ये जग सारा। शरद पूर्णिमा का चांद अपनी सोलह कला दिखलाता, मानो अंतरिक्ष के मंच पर सुंदर नृत्य सबको दिखलाता। समूचे ब्रम्हांड में चारों ओर ये चमक चांदनी…

  • होली के दिन | Poem Holi Ke Din

    होली के दिन ( Holi ke din )   छोड़िए शिकवे गिले खटपट सभी होली के दिन। अच्छी  लगती  है  नहीं ये बेरुखी होली के दिन।। वो  हमारे  पास आकर कान में ये कह गये, आदमी को मानिए न आदमी होली के दिन।। चार  दिन  की  जिन्दगी ही पाई है हमने, सभी, इश्क के रंग…

  • मुहूर्त | Muhurat par kavita

     मुहूर्त  ( Muhurat )   क्यों भागे मनवा व्यर्थ मुहूर्त के पीछे || 1.न जन्म मुहूर्त से हुआ, न मृत्यू होगी किसी मुहूर्त मे | फिर क्यो सारी जिन्दगी घूमें, शुभ मुहूर्त के चक्कर मे | क्या शुभ है क्या अशुभ, सब आधीन है प्रकृति सूत्र मे | फिर क्यों सारी जिन्दगी ढूंडे, खट्टापन मीठी…

  • ओज भरी ललकार | Poem oj bhari lalkar

    ओज भरी ललकार (Oj bhari lalkar )   ढूंढता रहा हूं सारी दुनिया क्या मेरा वजूद है। आग का दरिया दहकता धधकती बारूद है।   ओज भरी हुंकार कहूं या जलती हुई मशाल। देशभक्त मतवाला कह दो लेखक बेमिसाल।   लेखनी दीपक ले अंधकार मिटाया करता हूं। राष्ट्रधारा में रणवीरों के गीत गाया करता हूं।…

  • गोरी नखराली | फागुनी धमाल

    गोरी नखराली ( Gori nakhrali )   गोरी नखराली नथली थारी हंस बतलावे ए गोरी नखराली-नखराली गोरी   गोरा गोरा गाल गुलाबी थारा नैणां तीर शराबी फागण आयो मस्त महीनों ल्यायो गुलाल गुलाबी थारी तिरछी तिरछी चाल रसीला होठ करै बदहाल चाल थोड़ी धीमै चालो ए गिगनार गोरी नखराली नखराली गोरी   फागण म गोरी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *