• बहती रहती जीवन धारा | Bahati Rahti Jeevan Dhara

    बहती रहती जीवन धारा ( Bahati Rahti Jeevan Dhara ) महामृत्यु के आंचल में भी जीवन की रेखाएं। मानव मन की जिजीविषा ही पुष्पित हो मुस्काए। विविधि वर्जनाओं में चलता रहता सर्जन क्रम है। आस्थाओं का दीप प्रज्वलित हरता तम विभ्रम है। नित्य नवीन अंकुरित आशा उत्साहित कर जाती, कर्मठता पलती अभाव में करती रहती…

  • आओ जी लें प्रेम से कुछ पल

    आओ ,जी लें प्रेम से कुछ पल अंतस्थ वृद्धन अंतराल , निर्मित मौन कारा । व्याकुल भाव सरिता, प्रकट सघन अंधियारा । पहल कर मृदु संप्रेषण, हिय भाव दें रूप सकल । आओ, जी लें प्रेम से कुछ पल ।। भीगा अंतर्मन संकेतन, जीवन पथ रिक्ति भाव। अस्ताचल स्वप्न माला, धूप विलोपन छांव । अब…

  • क्या आचार डालोगे रूप का | Kya Achar Dalogi Roop ka

    क्या आचार डालोगे रूप का आज समोसा बोला कवि से,क्यों इतना घबड़ाते हो। मिलाकर चटनी,खट्टी मीठी,अपना स्वाद बढ़ाते हो। मेरी कैसी दुर्गति होती,क्या तुम कभी लिखपते हो। देख तड़पता मुझको तलते,अपना हाथ बढ़ाते हो।। पहले पानी डाल मजे से,घूंसे से पिटवाते हो। हाथों से फिर नोच नोच कर,बेलन से बेलवाते हो। हरा लाल मिर्चों की…

  • घर बेटी का | Kavita Ghar Beta Ka

    घर बेटी का ( Ghar Beta Ka ) आज घर में सन्नाटा छा गया। जब बेटी ने प्रश्न एक किया। जिसका उत्तर था नही हमारे पास। की घर कौनसा है बेटियों का।। पैदा होते ही घर वाले कहते है। बेटी जन्मी है जो पराया धन है। बेटा जन्मता तो कुल दीपक होता। पर जन्म हुआ…

  • पिता जी के हाथ के निशान

    पिता जी बूढ़े हो गए थे और चलते समय दीवार का सहारा लेते थे। नतीजतन, दीवारें जहाँ भी छूती थीं, वहाँ रंग उड़ जाता था और दीवारों पर उनके उंगलियों के निशान पड़ जाते थे। मेरी पत्नी यह देखती और अक्सर गंदी दिखने वाली दीवारों के बारे में शिकायत करती। एक दिन, उन्हें सिरदर्द हो…

  • अपनापन | Apnapan

    निशा जी को परिचारिका बड़े प्यार से उनके कमरे में बिठाकर उन्हें सब कुछ समझाकर बाहर निकल गई। निशा जी गौर से कमरे को चारों तरफ से देखने लगीं। कुर्सी से उठकर खिड़की के पास आ गई और बाहर देखने लगीं। बाहर बहुत सुंदर फूलों से सजा बगीचा देख उनके होंठों पर मुस्कान तैर गई।…

  • मेरे मन का दर्पण | Kavita Mere Man ka Darpan

    मेरे मन का दर्पण ( Mere Man ka Darpan ) मेरे मन के दर्पण मे तस्वीर तुम्हारी है कान्हा, प्रतिपल देखा करती हूं तस्वीर तुम्हारी अय कान्हा, खोली ऑखें तुझको पाया मूॅदी ऑख तुझे ही, कितना भी देखूं तुझको न ऑखों की प्यास बुझेगी, इकदिन सम्मुख दरसन दोगे सोच रही हूं मै कान्हा, प्रतिपल देखा…

  • बारिश में सीता | Kavita Baarish me Sita

    बारिश में सीता ( Baarish me Sita ) हो गई शुरू झड़ी बरसात की। दुखिया कौन है आज,सीता सी? पति चरण छाया से कोसों दूर। हो रही है व्थथा से चूर-चूर। हितैषी नहीं है,सब बेगाना। कैसे, दूर संदेश पहुँचाना ? ऋतु ने भी दुश्मनी मोल ले ली। हो गई शुरू झड़ी बरसात की। महलों की…

  • बिनकहे | Kavita Binkahe

    बिनकहे ( Binkahe ) रहते हों इंसान जहाँ वो मकान खंडहर नहीं होते रहते हों जहाँ फकत इंसान वो महल भी खंडहर से कम नहीं होते बुलावा हो फर्ज अदायगी का ही तो वहाँ भीड़ ही जमा होती है आते हैं बनकर मेहमान लोग उनमे दिली चाहत कहाँ होती है शादी का बंधन भी तो…

  • हाथरस की भीड़ में

    हाथरस की भीड़ में हाथरस की भीड़, में शून्य हुआ जीवन रस अंधविश्वासी बनकर बाबा के दरबार में मैं तो नत मस्तक करने गई थी। अपनों के पास पहुंचने से पहले मैं बाबा धाम पहुंच चुकी थी। सुलझाने कुछ समस्या उलझन में सांसे फस गई थी अंधविश्वासी बनकर मैं तो बाबा के दरबार में गई…