बिनकहे

( Binkahe )

रहते हों इंसान जहाँ
वो मकान खंडहर नहीं होते
रहते हों जहाँ फकत इंसान
वो महल भी खंडहर से कम नहीं होते

बुलावा हो फर्ज अदायगी का ही तो
वहाँ भीड़ ही जमा होती है
आते हैं बनकर मेहमान लोग
उनमे दिली चाहत कहाँ होती है

शादी का बंधन भी तो
होता है मेल दो दिलों का
विचारों में हो भिन्नता अगर
तो हो जाता है रिश्ता खेल दिलों का

महक तो आती है केवल
कली से हुए फूल मे
कागज के फूल तो लग जाते हैं फूल
महज दिखावे की भूल मे

बिनकहे भी चुभा देते हैं लोग नश्तर
कहने की जरूरत नहीं होती
आ जाती है समझ बात दिल की
बतलाने की उसे जरूरत नहीं होती

मोहन तिवारी

 ( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

मन की पीड़ा | Kavita Man ki Peeda

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here