कमल कुमार सैनी की कविताएं | Kamal Kumar Saini Poetry
सब एक जैसे ही है सब एक जैसे ही हैहांसब एक जैसे ही हैसब कहते हीं सही हैहोता भी यही हैमनोविज्ञान कहता हैलगभग भावनाओं का जालसभी मेंसमान रहता हैमेरे वाला/मेरे वालींअलग हैं यह वहम हैसब उसी हाड़ मांस किबनावट हैये जो बाहरी रंग हैये सिर्फ सजावट हैकुछ में चमक हैकुछ में फिकापन है सब्र अब…










