सरहदें

सरहदें

सरहदें

कौन कहता है,
सरहदों का कोई रंग नहीं होता,
वो बताएँगे सरहद का रंग,
जिसने इन लकीरों को बनते देखा,
बहते गर्म लहू से,
बनती खिंचती रेखा

सरहद का रंग लाल होता है
गाढ़ा तरल लाल
जो बहता रहता है
गलेशियर से निकली
नदी की तरह
जो कभी सूखती नहीं

धर्म और भाषा का भेद
बड़ा होता है, बहुत बड़ा
जिसे नहीं मिटा पाया
गाँधी जैसा महामानव भी
उसने कभी नहीं चाहा
लकीरें खींचे
अगर खींचेँ तो उनकी लाश पर
पर लकीरें नहीं मानी
उनके सामने तनी
वो……बनी
ख़ून से सनी लाशों के ढेर
बच्चों के उखड़ते श्वास पर
सिसकते मानव मूल्यों के
उजड़ते विश्वास पर

सरहदें समुद्र में
रेगिस्तान में
पर्वतों, घाटियों में
हर जगह मिलेंगी
और उनका रंग एक ही
वो रंग कभी मिटता नहीं
सरहदों ने क़त्ल करवाए
रोते बाप के काँपते हाथ से
नन्हें -नन्हें मासूम
जवान बेटियां, पत्नियां
जैसे वो इंसान नहीं श्राप थे
सरहदों ने आदमी को
उसकी सभ्यता को भाप बनवाया
गिरते बमों ने जमीं को कंपकपाया
दूध पिलाती माँओं को
कोमल देह नवजात को
जिसने अभी दुनिया नहीं देखी थी
कंक्रीट नीचे दबवाया
खेल के मैदानों को
हंसती गलियों को
घुप खामाशियों में तब्दील करवाया

धर्म, जाति की कीलों का वजूद
मानो इंसानियत से
बड़ा, बहुत बड़ा हो
धरती कैसे इन
चूबती कीलों का दर्द
सहती होगी
खुले जख्मों से,रिसते घावों से
कितना कराहती होगी
और कोई मुल्क
जितना विकसित होता गया
अपनी सरहदों को
बड़ा,बहुत बड़ा करता गया
सदियों से यही हुआ
यही होता आया

क्या हम बस देखते रहेंगे……
तबाह होती दुनिया को
सिकुड़ती इंसानियत को
अब सरहदों को ही नहीं
‘सरहद’शब्द को मिटा दिया जाए
और ध्वज का रंग
नीला, सिर्फ नीला कर दिया जाए

बलवान सिंह कुंडू ‘सावी’

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