parenting

परवरिश | Parvarish

परवरिश

( संस्मरण )

 

उस दिन भी सावन का ही महिना और सोमवार का दिन था । बाबूजी (ससुर जी )शिव के अनन्य भक्त । तो उस काल विषय में माँ का पत्नी होने के नाते अनुगामिनी होना निश्चित ही था ।

पूरा परिवार ताल वृक्ष एक तपो भूमि है़ जयपुर से अलवर जाने के रास्ते के मध्य पड़ता है़ । ।बस वही जाकर शिव जी का दुग्धाभिषेक करने का मन हुआ बाबूजी काऔर प्रोग्राम बन गया । पूरा परिवार बम बम भोले के दर्शन के लिये तय्यार होकर चल दिया । मेरा बेटा मनु करीब 7 साल का रहा होगा ।

अपने दादू का लाडेसर पोता । ढेरो कहानियां, छोटी छोटी पर उपयोगी बाते किस्से क्या-क्या नही सुनाते थे उसको। और मनु समझो प्रश्नो का पिटारा इतने सवाल पूछता बाबूजी उतने ही धैर्य से उसके हार एक प्रश्न कां उत्तर देते । फलस्वरूप दादू पोते की बडी पटती थी।

बडी अदभुत जोड़ी थी दोनो क़ी सब के लिये आश्चर्य पर मेरे लिये बड़े सुकून का विषय थी ।
हम दोनो डाक्टर व्यस्तता भरी जिन्दगी में मनु को मिला बाबूजी का सानिध्य ,मनु में संस्कार रोपित करता था ।जो हम दौनो को बड़ा आश्वस्त करता था।

हमारी गाड़ी रफ्तार से चली जा रही थी ॥सभी भजन गाने में तल्लीन । मन पावनता से भर रहा था। गंतव्य स्थान यानी कल्प वृक्ष पहुचे । ओह कितना सुरम्य स्थान मानो कैलाश पर आ गये । सावन का महिना बारिश से नहाए पाम के हजारों पेड़ ॥ विभिन्न आकार लिये खड़े मानो हमारी आमद का स्वागत कर रहे थे ।।

सुरम्य अरावली पर्वत की धुली धुली सी घाटियाँ, शिखर तपस्वी की भांति निश्चल खड़े हुये थे । कलरव करते पक्षी ..एक स्वर्गिक सुख का अनुभव हों रहा था ।धीमी गती से बहती हवा मानो सफर की थकान उतार रही थी।

उस पर अदभुत नजारा विशालकाय शिव लिंग हैरान हो गये हम सब देख के ।इस जंगल में किसने स्थापना की होगी इसकी इस विशाल शिव लिंग की
और कब और कैसे??
हाय रब्बा क्या बताऊ करीब 15 या उससे कुछ।अधिक ही होगा ऊँचा और करीब 7 आदमी बाँह फैला ले तो शिव लिंग घेरे में भी मुश्किल मुश्किल आ पाये इतना मोटा शिव लिंग।देखते ही बनता था ऊपर तक देखो तो सर पर रखी टोपी गिर जाये ।इतना ऊँचा।

पर प्रथम देव दर्शन थे हमारे सो मन आनंदित हो गया देख के । सभी खुश हुये । सारा सामान गाड़ी से आ गया पर दूध रह गया । सब को बैठने के लिये कह कर मैं और ये दूध लेने गाड़ी तक आये पीछे पीछे हमारा मनु भी आ गया ।
दूध की थैलियां उठाते समय दूध की दो थैलियां नीचे गिर गई ।पास खड़े गरीब बच्चे उसे उठाने के लिये लपके इन्होने डांट दिया वो सहम कर पीछे हट गये ।

तभी हमारी और मनु की नजर पास की नाली पर पड़ी। ऊपर शिव लिंग पर चढ़ाया दूध नीचे नाली में बह कर आ रहा था और कुछ कुत्ते उसे पी रहे थे साथ कुछ भिखारी भी ।

मनु ने उलझन भरी आँखों से नाली ,नीचे गिरी दूध की थैली और दूर खड़े उन दो गरीब बच्चों कों देखा फिर उसकी नजरें घूमी इनको देखते हुये मेरी नजरों पर आकर रुक गई कितने सवाल भरे थे उसकी मासूम आँखों मैं ।कुछ समझा मैने और हाँ में सर हिला दिया । मनु चेहरा खिल उठा उसने झट से दौनो थैलियां उठा कर उन गरीब बच्चों को देदी बच्चे भी खुश होकर शोर मचाते भाग गये ।

हाथ में लगी मिट्टी झाड़ते हुये मनु बडी मासूमियत से बोला ….मम्मा मैने ठीक किया ना ?
बाबूजी के दिये संस्कार सचमुच उसके मन पर छाप छोड़ रहे थे ।देख मन आद्र हों गया ..मैंने हाँ में गरदन हिलाई और उसे सीने से लगा लिया । खुश हों गया वोऔर कूदते उछलते हुये हमारे आगे आगे चल दिया ।

ऊपर दूध लेकर पहुचे सब ने मिल कर पूजा की ऐक सुखद आनन्द की अनुभूति हों रही थी ।पहली बार ऐसी जोड़े में बैठ सारे परिजन एक साथ पूजा कर रहे सो बहुत अच्छा लग रहा था ।
पूजन के उपरान्त भोजन करने के लिये पास के बाग में हम तय्यारी करने लगे ।

तभी बाबूजी के साथ मनु को एक हलवाई की दुकान की तरफ जाते देखा सोचा बाबूजी सब के लिये कुछ मिठाई लेने गये होगे और मनु का उनके साथ होना कोइ बडी बात नही एकदम पक्के दोस्त थे दोनो ।

खाना लगा कर ये बाबूजी को पास ना पाकर बाबूजी को ढूढने लगे । तभी एक अनोखा दृश्य दिखा ..ढेर सारे गरीब बच्चे और उनका शोर मध्य बैंच पर खड़ा मनु साथ में बाबूजी … सब को दूध और जलेबी खिला रहे थे। मनु के चेहरे की खुशी देखते बनती थी और बाबूजी तो अपने पोते को खुश देख कर ही मगन हो रहे थे ।

माँ बोली जैसा दादा वैसा पोता । हमारे घर के बाकी बच्चे भी बाबूजी के पास भाग गये ।करीब एक घण्टे इंतजार करना पड़ा दादू और पोते का ।

मैं सोच रही थी ऐसा कुछ करने का तो कोइ विचार नही था हमारा ।खैर ..बाबूजी आये
खाना खाया बात चीत के मध्य बाबूजी ने बताया ..जब में शिव लिंग पर दूध चढ़ा रहा था तब मेरी गोद में बैठा मनु बोला दादू भगवान तो दूध पी ही नही रहे सारा नाली में नीचे जा रहा है़ वहाँ कुत्ते उस दूध को पी रहे है़ और भिखारी भी ।तो हम ये दूध सीधा उन लोगो को नही पिला सकते क्या???
मुझे लगा सच ही तो कह रहा है़ ।

आत्मा परमात्मा होती है़ और आत्मा तृप्त तो परमात्मा भी तृप्त हो जायेगा ।
रोज मैं इसे सिखाता हू आज इसने मुझे बहुत बडी बात सिखा दी ।
कथनी और करनी के फर्क को छोटा सा बच्चा समझा गया मैं इतने दिनो में भी समझ नही पाया।

इन सब बातों से अनभिज्ञ मनु दादू की गोद में बैठा अपने गले में पड़े जनेऊ से खेल रहा था।जो पूजा के दौरान सभी पुरुषो को पहनाया गया था । बाबूजी बहुत भावुक हो उठे थे और मनु के सर पर हाथ फेर कर माँ से बोले शान्ति देखना मैं मरने के बाद भी मनु में जिन्दा रहूंगा ।

सभी का मन और तन सावन की बारिश के साथ बाबूजी की बातों से भीग गया। हांजी सही सही सोच रहे है़ आप बाबूजी का परिवर्तित हुआ मन इस घटना के बाद कई परिवर्तन कर गया हमारे घर में। नवरात्रे में कन्या भोज और श्राद्ध में ब्राम्हण भोज का तरीका एकदम बदल गया ।

इन दिनो….
छोटे छोटे डब्बों में एक व्यक्ति के खाने लायक खाना पैक किया जाता और ढेर सारे डब्बे तय्यार होते ।दादू पोता दोनो गाड़ी में भर कर ले जाते ।कच्ची बस्तियों में बाँट कर आते ।

बरसौ बीत गये बाबूजी हमारे मध्य नही रहे पर उनके दिये संस्कार आज भी हमारे मन जड़े जमाये है़ ।
हम आज भी उनके दिये संस्कारो कां पालन करते है।

विशेष
आम बोये से आम मिले
नीम बोये से नीम
आओ दुआ बोते चले
उगने दो आमीन ॥

डा इन्दिरा गुप्ता यथार्थ
राजस्थान

यह भी पढ़ें :-

कभी चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत की संस्कृति से हुआ था बहुत प्रभावित | Yatra vritant

Similar Posts

  • हमारे हाईस्कूल के शिक्षक | Hamare High school ke Shikshak

    मैंने हाईस्कूल सीताराम सिंह इंटर कॉलेज बाबूगंज बाजार से किया। सीताराम सिंह जी आटा गांव के ठाकुर परिवार के थे। पहले विद्यालय का नाम महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज था जो कि उनकी मृत्यु के पश्चात बदलकर उनके नाम पर कर दिया गया । वे आजीवन प्रधानाचार्य रहे । लेकिन जब मैं पढ़ रहा था तो…

  • मेरी डायरी से

    मनुष्य जब जीवन के उत्तरार्ध में होता है तो जिंदगी के अनुभवों को किसी  सुपात्र व्यक्ति को सौंपना चाहता है। सोचता है जिंदगी में जो कुछ हम नहीं रह कर सके उसे आने वाली पीढ़ियों को सौंप दूं । जिससे ज्ञान की धारा सतत बहती रहे । जितने भी बड़े बुढो से मिलता हूं एक…

  • दादी जी का घर

    दादी जी सलुम्बर में अकेले ही रहती थी.. नागपुर छोड़ने के बाद वे और दादाजी दोनों सलूंबर में स्थायी हो गए थे.. दादा जी के निधन के बाद मैने दादी जी को बहुत बार कहा की चलो मेरे साथ अकोला.. मगर वे नही मानी। वे तो भरेपूरे समाज में समाज के साथ रहना चाहती थी…..

  • मेरा सबसे अच्छा मित्र | संस्मरण

    आज मै प्रस्तुत हूँ अपने एक शानदार दोस्त के साथ जिसके साथ मेरा संम्बंध लगभग उन्नीस साल पुराना है। जिसके साथ हँसी मजाक मे ही इतने वर्ष कैसे बीत गए मुझे पता ही नही चला। जो परेशानियों मे मेरे साथ मजबूती से खडा रहा और आज भी बिना मेरे पैरो को दबाए बिना सिर की…

  • चाय

    जब मैं छोटा था, 12 वर्ष का रहा होऊंगा। मैंने तब चाय बनाना सीखा ही था। तब घर में कोई भी मेहमान आता, चाय मैं ही बनाता था। मुझे चाय बनाने में खुशी मिलती थी, बड़ा मजा आता था। इसी बहाने मुझे भी चाय पीने को मिल जाती थी। एक दिन घर पर सीताराम अंकल…

  • सव्वा किलो गुड़

    महेंद्र भाई की छोटी सी उम्र मे मौत के बाद मेरे ससुर जी स्व. गेबिलाल जी ढालावत साहेब ने नागपुर के गड्डी गोदाम स्थित दुकान और घर को छोड़ने का फैसला करते हुए निर्णय लिया की कलमना स्थित घर मे रहने हेतु जाये.. वहीँ किराणे की दुकान शुरू की जाये। महेंद्र भाई मेरे इकलोते साले…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *