प्रेशर

“प्रेशर”

शिक्षक-अभिभावक मीटिंग में एक पिता अपने बेटे को पीट रहा था। प्रिंसिपल सर ने उस व्यक्ति से पूछा- “क्या हुआ? बेटे को क्यों मार रहे हो?”

“क्यों न मारू इसे? पूरे साल ट्यूशन पर हजारों रुपए खर्च किये लेकिन इसके दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं है। देखो, इसके वार्षिक परीक्षा में कितने कम नंबर आए हैं?

आज इसका रिजल्ट आया है और यह 40% नम्बर ही ला पाया है। पूरे दिन बस क्रिकेट खिलवा लो इससे तो… इसमें ये खुश हैं। पढ़ाई तो इसको करनी ही नहीं है, बेशर्म कहीं का…. इसलिए इसको मैं कूट रहा हूँ।”

“यह तो आपकी बड़ी गलत बात है। आपको बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए। कुछ नहीं तो… स्कूल में ही शुरू हो गए, लग गए पीटने… क्या सिर्फ एग्जाम में अच्छे नंबर लाना ही बहुत जरूरी है? आप इसको प्यार से भी तो समझा सकते हो, गुस्सा घर जाकर ही निकाल लेते?।”

“कहना आसान होता है। जब आपके बेटे के बहुत कम नंबर आएंगे या फेल हो जाएगा तब आपको पता चलेगा कि एक बाप के दिल पर क्या गुजरती है? बच्चों का एक पिता क्या कुछ नहीं करता, लेकिन अगर बच्चे ढंग से न पढ़ें, तो गुस्सा तो आता ही है। इसको पीटू न तो क्या करूँ? एग्जाम कॉपी में सब कुछ गलत-गलत करके आया है।”

“एक पिता के रूप में मैं अपने बच्चे के साथ ऐसा सलूक नहीं करूंगा, जैसा आप कर रहे हो। मेरे पिता ने मुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए कि मैं अपने बच्चों का दुश्मन बन जाऊं, उनकी पसन्द-नापसंद का ख्याल भी न रखूं?

और उनको ज्यादा मार्क्स लाने के चक्कर में मानसिक प्रताड़ना से गुजारूं, उनको टॉर्चर करूँ? श्रीमान जी, आपका बेटा तो अभी मात्र सातवीं कक्षा में ही पढ़ रहा है…. मुझे याद है कि जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था और सेकंड ईयर में था, उस वक़्त मैं फेल हो गया था।

तब 6 माह तक मैंने अपने पिता को इस बात तक की भनक तक न लगने दी थी कि मैं फेल हो गया हूँ, लेकिन 6 माह बाद मेरे एक दोस्त ने घर जाकर मेरे पिता से शिकायत कर दी थी कि मैं फेल हो गया हूँ और मैंने यह बात उनसे छिपाई है। पता है, मेरे पिता ने तब क्या कहा था?

मेरे पिता बोले- “मेरा बेटा, फेल हो गया है तो क्या हुआ? इम्तिहान क्या कुंभ का मेला है जो 12 साल बाद आएगा? अगले साल एग्जाम दे देगा, पास हो जाएगा। इतना क्या परेशान होना।” मैं उस वक्त घर पर ही था। यह बात उनको पता थी। वे चाहते तो मेरे दोस्त के सामने ही मेरी क्लास ले लेते या पिटाई लगा देते।

लेकिन उन्होंने समझदारी से काम लिया। जब मैंने चोरी छिपे अपने पिता के मुंह से यह बात सुनी कि एग्जाम क्या कुम्भ का मेला है, जो 12 साल में आयेगा? तब मुझे पता चला कि मेरे पिता के लिए मेरी खुशी सबसे बढ़कर है।

इस घटना के बाद मैंने भी अच्छे से पढ़ाई की। शायद मेरा प्रिंसिपल बनना भी उसी घटना का परिणाम है। आज मैं 50 साल का हूँ लेकिन आज तक उन्होंने मुझ पर किसी भी तरह का प्रेशर नहीं डाला। मेरे पिता मेरे आदर्श हैं।”

आगे समझाते हुए प्रिंसिपल सर बोले-

“आज हम बच्चों को इतना तनाव देते हैं कि पांचवीं, छठी के बच्चे भी आत्महत्या करने में लगे हुए हैं। हाई स्कूल व इंटर में तो आत्महत्या करने वाले बच्चों की संख्या तो बहुत ज्यादा है। हमने बच्चों का बचपन मारकर खा लिया है। इससे बड़ा अपराध मां-बाप अब जिंदगी में कभी कर ही नहीं पाएंगे।

आपको यकीन हो या ना हो लेकिन अपने पिता की तरह ही मैंने तो अपने बेटे से मजाक में कह दिया था कि ग्रेजुएशन में 50% से ज्यादा नंबर मत लाना क्योंकि मेरे 51% आए थे। अगर मुझसे ज्यादा ले आया तो जिंदगी भर मुझे चिढ़ाता रहेगा। उसके 45% नंबर आए, तो मुझे बड़ी खुशी हुई। अगर वह 95% नंबर ले आता तो अमेरिका भाग जाता… 45% ले आया तो मुझे छोड़कर गाजियाबाद तक भी नहीं भाग सकेगा।

मेरा या हमारा सुख यह नहीं होना चाहिए कि मेरा बेटा अमेरिका में बैठकर, ज्यादा पढ़-लिखकर, मुझसे दूर रहकर, पाँच लाख रुपये महीना कमा रहा है। जबकि मेरा या हमारा सुख यह होना चाहिए कि मेरा बेटा भले ही तीस हजार रुपये महीना कमा रहा है लेकिन शाम का खाना मेरे साथ बैठकर खा रहा है।

हमने जिंदगी के सारे सुख पैसों में तब्दील कर रखें हैं। सबको ज्यादा पढ़ लिखकर सिर्फ पैसा ही कमाना है। जब से हमने एकमात्र सुख पैसे को मान लिया है, तबसे सारी दिक्कतें, परेशानियां पैदा हुई है, देश में भ्रष्टाचार पैदा हुआ है। बच्चों और मां-बाप का सबसे बड़ा सुख और सबसे बड़ी भलाई एक दूसरे के साथ प्रेमभाव से मिलजुलकर रहने में है, एक दूसरे के सुख-दुख में साथ देने में है।

हालांकि पढ़ाई लिखाई बहुत जरूरी है लेकिन जोर जबरदस्ती करके नहीं, दबाव से नहीं। हर बच्चे की अपनी सीमाएं होती है। कोई खेल-कूद में अच्छा होता है, कोई पढ़ाई-लिखाई में अच्छा होता है, इसी तरह हर बच्चा किसी न किसी चीज में अच्छा होता है, हर बच्चा स्पेशल होता है।यह हमें समझना होगा।

हमें बच्चों की क्षमताओं को पहचान कर, उसको आगे बढ़ाने में मदद करनी चाहिए। ना की जोर जबरदस्ती, दबाव से, भय से, पिटाई से बच्चों में डर बिठा करके वे काम करवाने चाहिए, जिसमें उसकी मर्जी नहीं है। यह गलत है, अपराध है।

अभी आपने कहा कि इसे खेलकूद में रुचि है, खासकर इसे क्रिकेट खेलना पसन्द है तो क्यों नहीं आप इसको खेलों में आगे बढ़ाते? आजकल तो खेलकूद में पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा कमाई है।”

अब बच्चे का पिता खामोश था, शांत था। शायद प्रिंसिपल सर की बातों का उस पर गहरा असर पड़ा था। उसका व्यवहार बदल गया था। उसने सलाह देने व मार्गदर्शन करने के लिए प्रिंसिपल सर का आभार व्यक्त किया, उनकी बातों पर अमल करने का आश्वासन दिया और बच्चे को प्रेमपूर्वक घर लेकर चला गया।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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