यह जग की रीत पुरानी है

यह जग की रीत पुरानी है

यह जग की रीत पुरानी है

यह जग की रीत पुरानी है
यह जग की जीत पुरानी है
जो ना पाया बौराया है
जो पाया सो रोया है
यह जग की रीत पुरानी है
यह जग की गीत पुरानी है

तेरे रह गुजर में हम नवीन
कुछ यूं टूट पड़े
आंख से आंसू ना छलका
पर जख्म बहुत गहरा है
यह जग की रीत पुरानी है
यह जग की गीत पुरानी है

नवीन यह कैसी अजीब विडंबना है
मैं हूं समुद्र में पर प्यासा हूं
एक ऐसा गीत सुहाना है
यह कैसा रीत पुराना है
यह जग की रीत पुरानी है
यह जग की गीत पुरानी है

 नवीन मद्धेशिया

गोरखपुर, ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद’ की कविताएं | Avnish Kumar Gupta Poetry

    बरखा की गोद में सोती संध्या घन गगन में गूँज रही बादल की मंद पुकार,धरती के आँगन में झर-झर मोती की बौछार। सूरज की लाली थककर पथ से धीरे खो जाए,बूँदों की चादर में संध्या चुपके सो जाए। पीपल की डाली से टपके मोती-से आँसू,भीगती हवाओं में छुप जाए दिन का मानसू। दीपक की लौ…

  • संभल जा ज़रा | Kavita sambhal ja zara

    संभल जा ज़रा ( Sambhal ja zara ) ए-दोस्त… संभल जा ज़रा पछताएगा,रोएगा अपने किए दुष्कृत्यों पर फिर सोच सोच कर…. अभी समय है बच सकता है तो बच बचा सकता है तो बचा अपनों के अहसासों को अपनों के अरमानों को….. तुमसे ही तो सारी उम्मीदें हैं तुम ही तो पालनकर्ता हो अब तुम…

  • सांप तुम सभ्य कब हुए

    सांप तुम सभ्य कब हुए   सांप तुम सभ्य कब हुए तुम विश्वास दिलाते हो मेरी विष थैली में अब भरा हुआ है अमृत दंश करना छोड़ दिया है मैंने लोग गाते हैं जीवन-गीत सांप तुम पर भला कभी भरोसा किया जा सकता है बेफिक्र जीया जा सकता है नहीं बिल्कुल नहीं हंसुआ टेंढ़ का…

  • चाँद को निखार कर

    चाँद को निखार कर चाँद को निखार कर आज बहुत प्यार दूँ,प्रेमिका की झूमती लटे बिन कहे संवार दूँ निज हृदय प्रतीत होते प्रेम की बात हैछोड़कर समाज य़ह कामना की बात हैहृदय के प्रकोष्ठ यूँ अनुभाव कांपते रहेहृदय को न्यौछावर कर भावना की बात हैरूप कांच को छुए नहीं दृश्य को संवार लूँअपनी निश्चल…

  • मेरी कलम से | डॉ. बी.एल. सैनी

    सप्ताह के सात रंग सोमवार का सूरज संग नया उत्साह लाए,आलस्य मिटे, कर्म का दीप जगमगाए।जीवन की डगर पर पहला कदम बढ़े,सपनों का कारवां उम्मीद से जुड़े। मंगलवार ऊर्जा का संचार करे,परिश्रम की ज्योति हर ओर भर दे।कठिन राहें भी सरल बन जाएं,साहस से हर मंज़िल कदमों में आएं। बुधवार का दिन सिखाए सादगी,ज्ञान की…

  • तिरंगा | Tiranga par Kavita

    तिरंगा! ( Tiranga )    आजादी की कोख से निकला तिरंगा, प्राणों से प्यारा है हमको तिरंगा। बीज आजादी का देखो ये बोया, हम सबकी आँखों का तारा तिरंगा। बलिदानियों का खून इसमें समाया, इंकलाबी राह भी सजाया तिरंगा। क्रांति और शांति का देता है संदेश, जवानी लुटाना सिखाया तिरंगा। जवान-किसान का सबका दुलारा, मर…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *