पुण्य

पुण्य

केशव अपने शिक्षक साथियों के साथ बस से रामेश्वरम मंदिर घूमने जा रहे थे। रास्ते में एक टी पॉइंट (Tea Point) पर बस रोककर ड्राइवर बोला- “हम इस टी पॉइंट पर 15 मिनट रुकेंगे। आपको जो खाना-पीना है, खा लीजिए।

टॉयलेट होकर आना हो तो हो आइये। इस समय दोपहर का 1:00 बज रहा है। हम 1:15 बजे तक हर हाल में यहां से निकल लेंगे।

सभी यात्री बस से बाहर निकल गये, लेकिन केशव बस में ही बैठे रहे। केशव बाहर का खाना खाने से परहेज करते थे। वे घर से खाने का जो सामान लेकर आए थे, उसे बस में बैठकर खाने लगे।

10 मिनट हो चुके थे। धीरे-धीरे यात्री बस में बैठने लगे थे। 15 मिनट के अंदर बस ड्राइवर भी आ गया और बोला- “हम चलने को तैयार हैं। सभी यात्री एक बार अपने आसपास के यात्रियों को चेक कर लें, कहीं कोई यात्री छूट तो नहीं गया।”

अचानक एक शिक्षक (मोहित) घबराकर बोला- “भैया, मेरा दोस्त दीपक अभी तक नहीं आया। बस दो मिनट रुकिए, मैं अभी उसको लेकर आया।”

उस यात्री के बस से उतरने से पहले ही, अचानक सामने से दीपक भुट्टा(मक्का) खाते हुए, आता दिखाई दिया। उसके पीछे-पीछे एक बुढ़िया चली आ रही थी, जो बार-बार उसको रोक कर कुछ मांग रही थी। दीपक बार-बार उस पर झुंझला रहा था, गुस्सा कर रहा था। बस के अंदर बैठे शिक्षकों की समझ में कुछ ना आ रहा था कि आखिर माजरा क्या है? क्यों दीपक उस बुढ़िया पर चिल्ला रहा है? और वह बुढ़िया क्यों दीपक के दुत्कारने पर बार-बार उसके पीछे आ रही है?

मोहित ने दीपक से पूछा- “क्या हुआ? यह बुढ़िया तुम्हारे पीछे क्यों पड़ी है?”

दीपक बुढ़िया पर गुस्सा करते हुए बोला- “यह बुढ़िया पागल है। मैंने 20 रुपये का इससे भुट्टा खरीदा था। तभी मैंने 20 रुपए दे दिए थे, लेकिन यह बुढ़िया बेईमान है। मेरे पीछे पड़ी हुई है। बोल रही है कि इसको मैंने रुपए नहीं दिये। इस इलाके में नया बंदा समझ कर लूटना चाहती है, पर मैं ऐसा होने नहीं दूंगा।”

अब मोहित उस बुढ़िया से बोला- “अम्मा, आपको तो इन्होंने रुपए दे दिए, फिर आप बार-बार इनके पीछे क्यों आ रही हो? आप अपने रुपए फिर से चेक कर लो। शायद आपको गलतफहमी हो रही होगी।”

बुढिया बोली- “अरे बेटा, सच कह रही हूँ। इन्होंने मुझे भुट्टे के रुपए नहीं दिए। अगर मुझे रुपए मिल गए होते तो क्या मैं 20 रुपये के लिए इतनी मिन्नतें करती? बेटा मैं बेईमान नहीं हूँ। मेरे रुपए इनसे दिलवा दो, बड़ी मेहरबानी होगी।”

अब मोहित ने दीपक से कहा- “अरे सर, 20 रुपये देकर मामला खत्म करो। बस चलने के लिए बिल्कुल तैयार है। बस सिर्फ तुम्हारी वजह से रुकी पड़ी है।”

दीपक गुस्से से बोला- “इस कमीनी बुढ़िया को तो मैं एक रुपया भी न दूंगा। जब मैं रुपए दे चुका तो फिर से रुपए क्यों दूं? मैं रुपये नहीं दूंगा।”

बुढ़िया बार-बार हाथ जोड़कर दीपक से रुपये की भीख मांग रही थी, लेकिन दीपक का दिल ना पसीजा। बार बार रुपये मांगे जाने पर… दीपक ने बदतमीजी दिखाते हुए अपना खाया हुआ आधा भुट्टा बुढ़िया के ऊपर फेंक कर मारा और कहा- “रुपए लेने के बाद भी भुट्टा चैन से खाने ना देगी कमीनी। ले पकड़ अपना भुट्टा। ठूस ले अपने पेट में और दफा हो यहां से।”

बस में बैठा हर व्यक्ति दीपक के इस तरह के व्यवहार से अचंभित था। दीपक एक प्रतिष्ठित अध्यापक थे। उनको हाल ही में मुख्यमंत्री जी ने सम्मानित भी किया था। उनका ऐसा रूप भी हो सकता है, किसी ने इसकी कल्पना भी ना की थी। बस में बैठा हर शिक्षक कह रहा था कि दीपक सर से ऐसी उम्मीद ना थी।

मात्र 20 रुपये के लिए इतना ड्रामा करने की और उस बुढ़िया को अपशब्द बोलने की कोई जरूरत नहीं थी। वैसे भी बस को रुके हुए 15 मिनट के चक्कर में 30 मिनट होने को आये।

दीपक सर बेचारी गरीब बुढ़िया को अगर 20 रुपये ज्यादा दे भी देंगे और तो गरीब तो हो ना जाएंगे? सभी व्यक्ति बुढ़िया को रुपए देने की वकालत तो कर रहे थे, लेकिन रुपए देने कोई आगे नहीं आ रहा था। ऐसे में केशव चुपचाप बस से बाहर निकले और उन्होंने उस बुढ़िया को साइड में ले जाकर, 50 रुपये का नोट देते हुए कहा- “अम्मा जी, उन सज्जन के दुर्व्यवहार के लिए मैं आपसे माफी मांगता हूँ।

शायद उन्हें गलतफहमी हो गई कि उन्होंने आपको रुपये दे दिए। ये लीजिए अपने रुपये। अम्मा जी उन सज्जन की बात का बुरा मत मानना। उनका दिमाग ठीक नहीं है।”

बुढ़िया अपने 20 रुपये काटकर शेष 30 रुपये केशव को देने लगी। केशव ने रुपये लेने से इनकार कर दिया। कहने लगे- “अम्मा जी, मुझे बाकी बचे रुपये नहीं चाहियें, वे रुपये आप ही रख लीजिए।”
बुढ़िया ने केशव के सिर पर हाथ फेरा, उसको ढेर सारा आशीष प्रदान किया और खुशी-खुशी केशव को दुआएं देते हुए वहां से चली गई।

आसपास के लोग, जो इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी थे, उन्होंने भी केशव के इस प्रयास की सराहना की और बुढ़िया की सहायता के लिए आभार व्यक्त किया।

50 रुपये की वैल्यू भले ही केशव की नजर में ज्यादा ना थी, लेकिन वे रुपए उस बुढ़िया के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे। उनसे वह अपने घर की जरूरत का सामान ले सकती थी। उस बुजुर्ग महिला को रुपये की सख्त जरूरत थी तभी तो वह लगभग 70 वर्ष की उम्र में भुट्टे बेच रही थी।

केशव को उस महिला की मदद करके मन को बेहद शांति, सकूं और संतुष्टि मिली। देखा जाए तो रामेश्वरम जाकर जो पुण्य वे कमाने जा रहे थे, वह उन्हें उस बुजुर्ग महिला की मदद करके रास्ते में ही प्राप्त हो गया था।

उधर रामेश्वरम् पहुंच कर दीपक सर ने अपना बटुआ ठीक से चेक किया तो उन्होंने पाया 20 रुपये उसी में मौजूद थे। वह बुजुर्ग महिला अपनी जगह सही थी। लेकिन अब क्या हो सकता था, उनकी झूठी इज्जत पर अपने शिक्षक साथियों के सामने बट्टा लग चुका था।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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