सुंदरता

सुंदरता

एक छोटा सा बच्चा था। उसकी उम्र लगभग 6 वर्ष होगी। उसका नाम राहुल था। बातें बनाने में वह बहुत उस्ताद था। उसके पास एक भद्दी-सी बेकार गुड़िया थी। लेकिन वह गुड़िया उसकी नजर में सबसे सुंदर थी।

वह उसके साथ ही सोता, उसके साथ ही उठता, यहाँ तक कि खाने-पीने से लेकर वह जो भी कोई काम कर रहा होता… उस गुड़िया को अपने साथ ही रखता। वह गुड़िया से बहुत प्रेम करता था।

एक दिन उसके घर पर उसके मामा जी आए। उनका नाम अशोक था। अशोक की नज़र जैसी ही उस गुड़िया पर पड़ी, वह डर गया, सहम गया।

अशोक बोले- ” यह गुड़िया तो अब मैं रखूंगा और थोड़ी देर बाद जब हम मेले में घूमने चलेंगे…तो इसके बदले में अपने बेटे को दूसरी, इससे भी ज्यादा खूबसूरत नई गुड़िया खरीदकर तुम्हें दूँगा।”

“नहीं मामा जी, मुझे कोई और गुड़िया नहीं चाहिए। यह गुड़िया मुझे सबसे प्यारी है। जरा ध्यान से देखों.. कितनी सुंदर है न मेरी गुड़िया। इस गुड़िया को मैं किसी को नहीं दूंगा।” राहुल बोला।

“बेटा यह गुड़िया खराब हो गई है। देखो तो… देखने में कितनी गंदी और बदसूरत लग रही है।”

“नहीं मामा जी, मेरी गुड़िया को आप खराब मत बोलो। नहीं तो मैं आपसे नाराज़ हो जाऊंगा। यह बहुत सुंदर है। इसकी सुंदरता आपको दिखाई नहीं देगी। इसलिए आप इसे बदसूरत बोल रहे हो। इसकी सुंदरता मैंने देखी है। यह मेरे साथ पिछले 3 सालों से है। यह मुझसे बात करती है।

मेरे साथ खेलती है, मेरे साथ हँसती है और यहाँ तक कि जब मैं उदास होता हूँ तो यह उदास होती है, मेरे साथ रोती भी है। इसलिए मामा जी, आप भूल जाओ कि इस गुड़िया के बदले में मैं कोई और गुड़िया लूंगा। यह कभी नहीं होगा। आप अकेले ही मेले चले जाओ। मैं आपके साथ मेला देखने नहीं जाऊंगा। कहीं ऐसा न हो कि मेरे पीछे कोई इस गुड़िया को चुरा ले या गायब कर दे। मैं घर पर रहकर ही इस गुड़िया से खेलूंगा।”

“बहुत बातें बनाने लगा है लेकिन मैं तेरी कोई बात न सुनूँगा, तुझे तो मैं इस गुड़िया के बदले में दूसरी गुड़िया दिलाकर ही दम लूंगा। इस गुड़िया को मैं मौका देखकर चुरा लूंगा और फेंक दूँगा।” मामा जी बोले।

मामा जी का बस इतना ही कहना था कि राहुल भयभीत हो गया। उसने गुड़िया को कसकर पकड़ लिया और जोर-जोर से रोने लगा। राहुल का रोना सुनकर राहुल की मम्मी अर्चना वहाँ आयी।

सारा मामला जानकर उन्होंने अशोक से हंसते हुए कहा- “भैया यह लड़का आपका कहना नहीं मानेगा। रो-रोकर घर भर लेगा। मैं भी इससे बहुत बार उस गुड़िया को फेंक देने को बोल चुकी हूँ लेकिन ये नहीं मानता है। इसको तो वही गुड़िया चाहिए। अभी कुछ दिनों पहले हमारा पड़ोसी सोहन घर आया था।

तब उसकी नज़र भी इसकी गुड़िया पर पड़ गयी थी। उसने राहुल के हाथ में गुड़िया देखकर, झूठ मूठ ही बोल दिया था कि यह गुड़िया उसको चाहिए। यह राहुल को बहुत बुरा लगा था। राहुल गुड़िया लेकर, भागकर कमरे में चला गया और यह तब तक रोता रहा, जब तक वह पड़ोसी घर से न चला गया।

उसके जाने के बाद ही यह कमरे से बाहर निकला। अब जब कभी भी वह पड़ोसी इधर से गुजरता है तो यह गुड़िया के साथ घर में छिप जाता है या गुड़िया छुपा के आ जाता है और पड़ोसी को हाथ खाली करके दिखाता है कि मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। पता नहीं इसको इस गुड़िया में क्या पसंद है?

यह तो मैं खुद भी नहीं जानती लेकिन यह इसके बिना नहीं रह सकता। इसका उठना, जागना, सोना, खेलना आदि सब इसी के साथ है। बहुत बार जब घर में कोई नहीं होता तो यह अपनी गुड़िया से ही बातें करता है।”

मामा बोले- “बड़ी विचित्र बात है। ऐसा मैं पहली बार देख रहा हूँ कि कोई इतना बड़ा बच्चा अपनी गुड़िया को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता है, चाहता है जबकि इसके हमउम्र बच्चों को हर रोज नए खिलौने चाहिए। दो दिन में ही खिलौने तोड़ कर रख देते हैं।”

अशोक ने प्यार से राहुल का रोना बंद करवाकर आश्वासन देते हुए कहा कि वह गुड़िया को बदलने की जिद्द छोड़ देंगे। उनको एहसास हो गया है कि प्रेम व स्नेह की कोई सीमा नहीं होती है। तब जाकर राहुल की जान में जान आयी।

अशोक अर्चना से बोले:-

“काश, लोग राहुल जैसे बच्चों से सीख पाते कि हम जिन लोगों से प्यार करते हैं, उनकी सुंदरता हमें उनके चेहरे से ज्यादा उनके आंतरिक स्वभाव में दिखाई देती है। हम अपने प्रियजनों की सुरक्षा और सुख के लिए हमेशा चिंतित रहते हैं।

जो लोग हमारे अपने होते हैं, उनकी सुंदरता और महत्ता हमें उनके बाहरी स्वरूप से ज्यादा उनके आंतरिक गुणों में दिखाई देती है। हम जिन लोगों से जुड़े होते हैं, उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता और जुड़ाव बढ़ जाता है। प्रेम और स्नेह की सच्चाई यह है कि हम अपने प्रियजनों को उनकी सुंदरता और महत्ता के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ जुड़े होने के कारण प्यार करते हैं।

अपने प्रियजनों पर हम किसी भी गलत इंसान की बुरी नजर, कोई बुरा साया बर्दाश्त नहीं कर सकते। हम उसको हमेशा बुरे लोगों से बचाकर रखना चाहते हैं। यह भी सच है कि कहीं ना कहीं जिस इंसान से हम प्यार करते हैं, उसके दूर जाने का, उसके खो जाने का, बदल जाने का डर हमें भयभीत करता है।

हम चाहते हैं कि जिस इंसान के होने से हमारी जिंदगी में रोशनी है, वह हमसे कभी दूर न जाए। हम उसको हमेशा अपनी नजरों के सामने, हर बुरी बला से बचाकर रखना चाहते हैं।

किसी और की कुदृष्टि भी हमें अंदर तक झकझोर देती है, हमारी रातों तक की नींद उड़ जाती है। शायद यही प्रेम है। जो हमारा अपना होगा, वह हमेशा हमारी चिंता करेगा, फिक्र करेगा। उसी के मन में हमारी सुरक्षा को लेकर उल्टे सीधे, गन्दे विचार भी आएंगे। लेकिन जो गैर होगा, जिसको हमसे प्यार, अपनापन नहीं होगा, उसकी बला से हम ‘जियें या मरें’… उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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