राजेंद्र रुंगटा

टेढ़ी मेढ़ी राहें

सोच विचार कर
करें काम ये चार l
संकट कटे मिटे पीर
मत भूलो शिष्टाचार l

कहो शब्द नापतोल कर
वजन बढ़े बातों में l
और गरिमा मिले सिवाय
जग में गूंजे जय जयकार l

बिन मांगी सलाह
मत दीजिए l
ओ मेरे साईं सरकार
बातों~बातों में रार बढ़े
आपस में हो तकरार l

हो सके तो मदद कीजिए
उधारी मत दीजिए यार
चाहे हों वो नाते रिश्तेदार l
अपयश,अपमान मिले
दुश्मनी का बने आधार l

रब दरिद्रता किसी को
भी ना दीजिए
गरीबी की बड़ी निष्ठुर मार l
जिल्लत भरी जिंदगी मिले
कदम~कदम पर
पड़े भूख की मार l

यादें गरीबी की
भुलाए ना भूले
जीवन की खट्टी-मीठी
यादें अन्तरतम् में झूलें l
बीते दिनों की यादें
दिल विचलित कर जाती है
सकल सुख चैन-छीनकर
वो बैरन ले जाती है l

मर्दों~ मर्द बनों
मार भगाओ।
उन यादों को और
आगे बढ़ते जाओ ।
अपनी लकीर लंबी खींचो
मान-प्रतिष्ठा पाओ।
सुख में ,दुख में तुम
सम भाव रह जाओ।

गुरु नाम अधरा

जनम जनम का साथ है
तुम्हारा हमारा
हमारा तुम्हारा l
एक गुरु नाम अधारा
एक गुरु नाम सहारा l
जब जब भटकी राहें
गही कर तूने उबरा l
एक गुरु नाम अधारा
एक गुरु तू ही सहारा l
चरण वंदन, पूजन
करूं मैं तेरा l
ज्ञान की ज्योति जालना l
रहे कृपा दृष्टि तेरी
बन जाऊं चांद सितारा l
एक गुरु नाम अधारा
एक गुरु तू ही सहारा l
माया,लोभ,मोह ने घेरा
लगा उर मुझको उबारा l
गुरु में दास तुम्हारा
तूने भाव पार उतारा l
मैं दास तुम्हारा
मैं दास तुम्हारा l
मैं दास तुम्हारा
मैं दास तुम्हारा l

वाह रे अंधविश्वास

जब जब देखा
उसने मुझको l
हौले~हौले देख मुस्काई
जली प्रेम रोग की ज्वाला l

अब नैनो से नैनो की
होने लगी बातें l
उठते~गिरते दिल में
अरमान मचलते l

छम्मक छल्लो रानी
छल्ला दे दे निशानी l
निकाल कर दिया
चप्पल का ताल्ला l
ले राजा खेल ले
बना के बैट~बल्ला l

पा कर निशानी
भाग्य पर इतराया l
उसी पल सुनार की
दुकान आया

ले फकीर चंद लाला
मैं बड़ी ऊंची चीज लाया l
इस पर सोन पत्तर पर चढ़ा दे
मेरा सोया भाग्य जगा दे l
कल आकर ले जाना
चांद सितारा जड़
सुंदर जनतर बना दूं l

दूसरे दिन जब
पहुंचा दुकान l
फकीरी लाला बोले
मीठी मीठी जुबान l
मेरी इस पीर से
करा दे पहचान l

रात भर घर वाले
धूप~दीप जला
पूजा पाठ किए l
ले~ले चुम्मा माथा
टेक ~टेक आशीर्वाद लिए l

लाला फकीरी चंद को
जब हकीकत बताया l
ले चिमटा~हथौड़ा
पीछे दौड़ा l
मैंने ये मोहल्ला छोड़ा l

बचो अंधविश्वास से
करो तौबा~तौबा l
साधु, संत, दरगाह
पीर , मजार
सब लूटमार अड्डे l
फैला झूठ फरेब का
झूठा आडंबर
गढ़ लिए ठगने
का हथियार l

इससे बचना है भाई
इससे बचना है भाई l

हम दो हमारे नौ

हम दो
हमारे नौ
लटक झटक कर
चले स्कूटर पर l

इत्तो छोटो सो
मेरो परिवार
इस पर कोई
नजर न लगा दे यार l

बच्चे भारी शैतान
घर में करे
खींचतान l
घर बना
मनोरंजन स्थान l

मैं हो गया
फटे हाल
यही मेरी
पहचान l
फिर भी
मेरा देश
महान l

सुनसान डगर के राही

सुनसान है डगर
अनजान है सफर l
मौन खड़ा है राही
ये कौन सा है नगर l

लक्ष्य को है पाना
बड़ी दूर है जाना।
किस मोड़ पर टूटे दम
कोई नहीं ठिकाना।

मंजिल से पहले
तू बैठ ना जाना ।
हंसने को तो है
यह सारा जमाना।

तू पौरुष दिखाना
अपने पद से सागर।
पर्वत एक-एक कर
पल में लांघ जाना l

लोहा मानेंगे लोग
सब बनेंगे दीवाने l
होगी जय-जयकार
तुम्हारी ओ मस्तानें l

बीबी नामां

फौजी बोला दुश्मन
हमसे डरता है।
हथियार डाल हमारी
शरण में पड़ता है l

घर पर राज बीबी
का ही चलता है l
उसके ख़ौफ़ से
फौजी भी डरता है l

मोची कहे अपनी
राम कहानी l
दुनिया के जूतों की
मरम्मत मैं करता हूं l
गर बीबी भड़की घर में
चिमटों से मरम्मत
वह ही करती है l

स्कूल में बोले टीचर
लेक्चर देना मेरा काम
पाठ पढ़ाना मेरा काम l
घर में बीबी मुझे
सबक रोज सिखाती है
जमकर झाड़ लगती है l
हरदम दुनियाबी
ज्ञान वही सिखाती है l

ऑफिसर बोले
ऑफिस में मैं
सब पर रौब जमात हूँ l
पर घर में अपनी बीबी
मैं हर रोज
फटकारा जाता हूँ।
ऑफिस में बॉस हूँ
मैं सभी का
सब मुझको
शीश झुकाते हैं।
घर में आते ही
मैं बीवी का नौकर
बन जाता हूं ।
उसकी बातों में
हां जी हां जी कर
अपनी जान बचाता हूं l

बोले जज मैं
दुनिया को देता
फिरता हूँ न्याय l
घर पर सहता हूँ
मैं अन्याय।
धाराएं कुछ
काम न आतीं
घर पर मैं
पानी भरता हूँ।
मेरे ऊपर जो
गुजर रही है वह
मैं किसी से
कह सकता हूँ ?

बोले बनिया
मैं दुनिया को
नाप तौल कर
ठगता हूँ l
बीबी है मुझसे
ज्यादा महाठगिनी
बिना माप के
सारी प्रॉफिट
पल में ठग लेती है।
घर जाते ही बीबी
मेरी सारी शेखी
हर लेती है।

बोले डॉक्टर
मैं दवा-दारू कर
इलाज मरीज का
मैं करता हूं l
घर पहुँचूँ मैं लेट
बेलन मुझे चढ़ाती है।
फीस सभी का
वह लेती है
इस तरह इलाज़
मेरा वो ही करती है।

कुंवारे भाइयों अब
तुमको क्या करना है ?
यह सोच समझ लो
मैंने तो सीधी-सच्ची
बात बता दी है l
शादी-शुदाओं के
जीवन की
यही सच्ची राम कहानी है
बाहर में है शेर
घर पर आँखों में पानी है।

आशा की किरण

बुरा समय जब आता
तब मति हर ले जाता l

गलती पर गलती
वह शख्स दोहराता
और जमाने की
फटकारें खाता है l

तन का वस्त्र
बैरी हो जाता l
मानव अपनी पूरी
शक्ति लगाता l

पार नहीं वह पाता
मंझधार में फंस जाता है
अंत में उस मनुष्य को
कण-कण में
प्रभु नज़र आता है।

प्रभु चरण में चित्त लगता है
आर्तनाद सुनकर प्रभु
आशा की किरण दिखता

दे नई शक्ति,नई ऊर्जा
जीवन पथ पर
उसकी गाड़ी दौड़ाता l
नई आशा किरण दिखाता है
नई आशा किरण दिखता है

तेरा अपना कुछ नहीं

तेरा अपना कुछ नहीं
सुन मूढ़मती नादान l
जो दूसरों ने है दिया
मानो उनका एहसान l

जन्म दिया मात-पिता ने
इसमें क्या तेरा योगदान l
नामकरण पंडित ने किया
गुरु ने दिया विद्यादान l

भई शादी ने जीवन संगिनी
दिया किसी ने कन्यादान l
करी नौकरी-चाकरी
किया दम भर काम l
समाज ने तब दिया दाम l

मिथ्या की है मोह-माया
उधार की है तेरी काया l
अंत समय जब आएगा l
कुछ उजर-बसर न पाएगा l

दूसरे के भाग जग में आया
दूसरों के कांधे चढ़ जाएगा l
मुट्ठी बांध आया जग में
हाथ पसारे जाएगा l

तेरा-मेरा करते मर जाएगा
हाथ न तेरे कुछ आएगा l
कर ले गर काम भलाई का
लोगों के दिल में बस जाएगा l
वरना तू तो गुमनामी के
अंधेरे में गुम हो जाएगा l

भाव शून्य ह्रदय

क्या समय आया भगवान
मरी मानवता पाषाण
हुआ इंसान l
रिश्तो की टूटी डोर
स्वयं का ना कोई ठोर l

पहले घर में आए मेहमान
हो दिल बाग बाग
बांछे खिल जाती थी l
घर में रौनक छा जाती थी
दो-चार दिन और रुकने की
मनोहर चला करती थी l

अब घर आए मेहमान
ग्रह~लक्ष्मी भन्ना जाती है
एक गिलास पानी देने में
ग्रह ~लक्ष्मी को सिया
ताप चढ़ आती है l

शर्म से हो शर्मसार
पुरुष मुंह छुपाते है l
पल पल पश्चातापी
अग्नि में जलते हैं
और सिसकते हैं l

जन्म~ मृत्यु हो गए महंगे
सिजेरियन बिन
कोई आता नहीं l
वेंटिलेटर बिन
कोई जाता नहीं l
खुशी गम हुए नदारत
चेहरे पर फैली
हवा हवाई l
हर शख्स तनाव में
जीता भाई l

जब शमशान भूमि में जाते थे
पूरा गांव शोक मनाता था
उसके गम में शामिल हो
उसका हाथ बटाता था
अब श्मशान में जाते हैं
अपने मतलब की गप्पे
लड़ाते हैं
घर आ खा~पी सो जाते हैं l

सच्चे इंसान की
कैसे हो पहचान l
दोनों नकली हुए
आंसू और मुस्कान l
मर गई संवेदनाएं
ह्रदय भाव शून्य हुआ
मनुष्य~ मनुष्य ना
होकर पाषाण हुआ
पाषाण हुआ l

कलम को नही झुकाऊंगा

दौलत शोहरत की चाहत में
दरबारों में शीश नहीं झुकाऊंगा l

पदकों की चाहत में
बन चारण भाट वंदन नहीं कर पाऊंगा l

समेट दुख~दर्द जनमानस का
उनकी दुख पीड़ा का राग सुनाऊंगा l

खोल पोल भ्रष्टाचारी कोढियों की
काल कोठरी तक पहुंचाऊंगा l

फैला है कैंसर देशद्रोही गद्दारों का
हो फांसी इसका जतन भिड़ाऊंगा l

दीमक लगी है सरकारी तंत्र में
काम चोरी रिश्वतखोरी की

छिड़क नमक कर भस्मी भूत
राख का ढेर बनाऊंगा l

हो उन्नति शोषित वंचित की
इसकी अलख जगाऊंगा l

करे शील हरण जो मां बहनों की
खुदवा घर उसका पक्का ताल बनाऊंगा l

तोड़ कमर गुंडे~लुच्चो की
जीवन उनका नरक बनाऊंगा l

काट हाथ पैर आतंकवादी ,हत्यारों का
जिंदा मांस पिंड बनाऊंगा l

फैलाये जहर जात-पात का
उनका घर दावानल की भेंट चढ़ाऊंगा l

खड़े प्रहरी सीमा पर, देश रक्षा में
करने चरण पखारण उनके
स्वर्ग लोक से अनेकों गंगा ले आऊंगा l

करे गुणगान कलम जिस दिन दरबारों का
टांग कलम कलम दान पर
संन्यासी बन जाऊंगा l

ले इकतारा हाथ जन जन की
उठती गिरती धड़कन की तान सुनाऊंगा l

कलम को हाथ ना लगाऊंगा
संन्यासी बन जाऊंगा l

दरबारों में शीश न झुकाऊंगा

प्रकृति कितनी सुंदर लगती है

विधाता तेरा
बड़ा उपकार
त्रय धात्री का
मिला दुलार l
प्रथम मात
जन्म की दातार
दूजा मिला
वसुंधरा का प्यार l

तीजी प्रकृति माता
जग की भाग्य विधाता l
प्रकृति माता की देखो
अद्भुत रचना
कहीं नदी नाले
कहीं पर्वत झरना l

हरे~भरे नाना भांति तरु
खड़े सीना तान
जिन पर वास करें
चिखरू,पंख~पंखेरू नादान l
नीड़ के पंछी मस्ती में गाते
फुदक~ फुदक कर
सबका मन बहलाते l

कहीं घनघोर घटा छाई
कहीं बारिद बरसे अधिकाई l
गगन में रंग~रंगीली
इंद्रधनुष की छटा छाई l

बोले दादुर, चातक
मोर, पपहिया
कोयलिया की कूक
से गूंजे अमराई l
पावक रितु
मनभावन आई l

कहीं बहे शीत
पवन के झोकोरे
कहीं हिम
झर~ झर झरे l
चौक~चौराहे पर
अलाव जले
गर्म कपड़ों के
सजे गए मेले l

शिशिर ऋतु ने ली अंगड़ाई
लू-थपेड़ों ने आफत मचाई l
तप प्रचंड दिनकर
करें हालकान
सोखा~ चूसा सब पानी
आफत में पड़ गई जान l

रात को सोए आंगन में
तारे चम~चम
चमके गगन में l
अब कहानी-किस्से
सुनाने की ऋतु आई l
कहानी सुनाती दादी^ताई
कहानी सुनते-
सुनते नींद आई l

वाह प्रकृति माई
तेरा क्या कहना
तू है जग का है
सुंदर गहना
तू है जग का
सुंदर गहना

अमानती-संसार

तेरा अपना कुछ नहीं
ये समझ ले तू नादान l

मेरा-मेरा क्यों करता इंसान
सुन जग का सुंदर पैगाम l

बेटा हुआ अमानत बहू की
उनमें क्यों दख़ल करता है ?
बेटी हुई दामाद की अमानत
तू क्यों इसमें उजर करता है?

जो दिखती है सुंदर काया
उस पर करे तू अभिमान l
होगी एक दिन खयानत
और तू पहुँचेगा श्मशान l

जीवन गिरवी मृत्यु की है
इसी राह पर सब जाएंगे।
मेरा-मेरा करते मर जाएगा
काम न कोई तेरे आएंगे।

अच्छे कर्म ही साथ जाएगा
बाकी किया धरा रह जाएगा।
अच्छे कर्म फैलेंगे सारे जग में
जगमग-जगमग दीप जलाएंगे
तेरे नाम का लोग गुण गाएंगे l

फूल भेजा है

फूल भेजा है बेटा तुमको
छिपा इसमें जीवन संदेश l

नाजुक,कोमल बना रहे तू ,
कायम रखना यह परिवेश l

फूलों जैसी बसी रहे महक
महका देना तुम पूरा देश l

कंटीले पथ पर चलना सीख
कठिनाइयों से लड़ना सीख l

सीखो,सिखाओ खुश रहना,
विपत्तियों में मुस्कुराना-हंसना l

किसी का दिल न जलाना
बनके फूल मन बहलाना l

दास सरीखा सेवा-भाव
प्रभु शरण में हरदम रहना l

फूल भेजा बेटा है तुमको
इसकी सीखों पर चलाना l

ओ मेघा रे…मेघा रे

मेघा रे, मेघा रे, मेघा l

ओ उड़ते मेघा रे
तू चला कौन प्रदेश रे
थम जा, रुक जा ,
थोड़ा खड़ा हो जारे l
यहां भी थोड़ा
बरसता जा रे l

बोले-रे दादुर
चातक, मोर ,पपीहा रे l
क्या तुझसे किया क्लेश
जो भाग गया प्रदेश l
यहां भी झमाझम पानी
बरसता जा रे l

धरा, पशु,पंछी,प्राणी
सब अकुलाए बिन पानी l
बात सुने ना किसी की
खूब कर ली मनमानी l
मेघा पानी देता जा रे l
बढ़ती गई तेरी
खूब शैतानी l
अब थोड़ा ठंडा
मिजाज दिखाता जा रे l
ओ मेघा पानी देता जा रे l

ऊपर से सूरज दादा
रुतबा खूब बघारे l
घर प्रचंड गर्मी
सब कुछ फूंक डारे l
ओ उड़ते मेघा पानी
देता जा रेl

क्यों ऊपर से निहारे
हाथ जोड़ सब पुकारे
बड़ी मान-मनौव्वल से
अब दिखलाये धारे

खूब झूम-झूम
झमाझम बरसा पानी
सब की बात मानी
खूब बरसा पानी
खूब बरसा पानी

मुझे ना ठुकराना

हे प्रभु मुझे
ना ठुकराना ~ठुकराना
प्रभु मुझे ना ठुकराना l

आया तेरे दर पर
मुझे तुम
अपना बनाना l (टेर )
हे दयासागर
तेरी दया का मिला मुझे
भरपूर खजाना l

प्रभु मुझको
ना ठुकराना~ना ठुकराना
मुझको ना ठुकराना l

मिली दौलत ~शोहरत
तेरी कृपा से पाया सब l
सब कारज हो गए पूरन
जब मैं तेरा ध्यान लगाया l
एक ही आशा दिल की
तेरा दर्शन पाना l

प्रभु मुझको
ना ठुकराना~ठुकराना
मुझको ना ठुकराना l

अपने शरण में
रख मेरे दाता l
हो कृपा तेरी
तो पार उतर जाता l
छोड़ तेरा द्वारा मुझे
और कहीं नहीं जाना l

प्रभु मुझको
ना ठुकराना~ठुकराना
मुझको ना ठुकराना l

आश टिकी है तुझ पर
तू ही मेरा सहारा l
तेरे सुमिरन में बीते
हर सुबह-शाम गुजारा l
हर संकट में सहाय तू
मैं जग छल-छंदों से हारा l

प्रभु मुझको
ना ठुकराना~ठुकराना
मुझको ना ठुकराना l

नयन/अश्रु

मैं सुनाऊं नयन पुराण
मीत सुनियो धर ध्यान l

नयन पुराण की
महिमा अति महान l
नारद~ शारद करें
बखान l

प्रभु निरखे तेरे नयन
उर में छाया सम्मोहन l
हों कृपा दृष्टि भरे नयन
सफल हो जाए जीवन l

वात्सल्य परिपूर्ण
मां के नयन l
सुत के जीवन में
बरसे सुखचैन l

लाल क्रोधित
पिता के नयन l
लगा पर लाल
उड़े गगन l

कजरारे तिरछे
नैनों की चितवन l
उर में बांधे
प्रीत का बंधन l

व्यथा~ हर्ष के अश्रु
छलकाते के नयन l
मन का हाल
बताते नयन l

हां ~ना की बोली
बोले नयन l
संकेत में कही ~अनकही
सब कहते नयन l

सुख-दुख के नजारे
समेटे नयन l
नयन में संसार समाया
बिन नयन सब सुनl

इति नयन पुराण कथा
कही बनाए सुनाए
त्रुटि पर ध्यान न करियो
मीत सुजान l

योग से लाभ और हानि

दिया पतंजलि ने,
योग ज्ञान-विज्ञान l
क्यों भूला बैठा उसे
विषय भोगी इंसान ?

ऋषि-मुनियों का
मानो तुम एहसान l
एक सूत्र में बांधकर
जग को परोसा ज्ञान l

आओ भोर-सकाले
करें योग-प्राणायाम l
निर्मल,शीतल वायु का
करें हम अमृत पान l

हजार रोगों की
है एक दवाई l
नियमित योग
तुम करो भाई l

योग से सबकी भलाई
पैसा बचाये पाई-पाई l
महिमा इसकी अति भारी
मनन करें सब नर-नारी l

डॉक्टर को ये दूर भगाए
तन-मन कांतिमय हो जाए l
योग मुझे है अति भाया
निरोगी-सुखी रहे काया l

करें योग रहें निरोग
आएं रोज भगाए रोग l
योग करने जाओगे
निरोगी काया पाओगे
अपने परिवार को
खुशहाल बनाओगे l

इश्क खुद से

छोड़ा जमाने का
झूठा माया ,मोह ,प्रपंच l
हर कदम अपनों ने
मारे कपटी पंच l

अपनों ने भोंके
खंजर छाती में l
अपनों ने बांधी
जंजीरें कदमों में l

टूटा हौसला
इन गहरे घावों से l
निकली आहे
इस टूटे दिल से l

रोते दिल ने
छोड़ी जग से प्रीत l
इन कड़वे सबको ने
सिखा दी नई रीत l

अब बांधी डोरी
इश्क खुद से करने की l
अपने लिए ही जिऊंगा
इश्क खुद से ही करूंगा l

अपने लिए ही जिऊंगा
अपने लिए ही मारुंगा
खुद का इश्क खुद से
ही करूंगा l

अपने में मस्त रहूंगा
अपने आप में खुश रहूंगा
खुद का इश्क खुद से ही करूंगा l

Rajendra Rungta

राजेंद्र कुमार रुंगटा
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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हे मां रजनी

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