रूह़-ए-नज़र

रूह़-ए-नज़र | Rooh-e-Nazar

रूह़-ए-नज़र

( Rooh-e-Nazar )

नक़्शा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।
जलवा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

छुपते थे जिसको साय में शर्मा के वो सदा।
परदा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

हंसते हुए दिया था जो उसने गुलाबे इ़श्क़।
तोह़फ़ा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

लिक्खा था ख़ूने दिल से जो मैंने कभी उसे।
रुक़्का वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

सिंगार झूम-झूम के करते थे जिसमें वो।
शीशा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

नज़रों से उनकी नज़रें मिली थीं जहां कभी।
जलसा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

शब्बीर ने किया था जो तेग़ों के साय में।
सजदा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

अपना बना के लूटा है जिसने मुझे फ़राज़।
चेहरा वो आज तक मेरी रूह़-ए-नज़र में है।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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