रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

ख़्वाबे ग़फ़लत में खोए हुए थे।
जागे-जागे से सोए हुए थे।
आन में रूबरू आ के हाए।
नींद उसने हमारी उड़ा दी।
रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

मारे-मारे से फिरते थे वल्लाह।
कैसे उठ-उठ के गिरते थे वल्लाह।
उसका अह़सान है यह के उसने।
बिगड़ी क़िस्मत हमारी बना दी।
रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

लम्हे लगते थे सदियों से हम को।
कोसते थे ख़ुद अपने ही दम को।
उसने बन कर हमारा मसीह़ा।
बे क़रारी हमारी घटा दी।
रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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