रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

ख़्वाबे ग़फ़लत में खोए हुए थे।
जागे-जागे से सोए हुए थे।
आन में रूबरू आ के हाए।
नींद उसने हमारी उड़ा दी।
रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

मारे-मारे से फिरते थे वल्लाह।
कैसे उठ-उठ के गिरते थे वल्लाह।
उसका अह़सान है यह के उसने।
बिगड़ी क़िस्मत हमारी बना दी।
रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

लम्हे लगते थे सदियों से हम को।
कोसते थे ख़ुद अपने ही दम को।
उसने बन कर हमारा मसीह़ा।
बे क़रारी हमारी घटा दी।
रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

रुख़ से चिलमन ज़रा क्या हटा दी।
उसने बिजली सी दिल पर गिरा दी।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • जख़्म के हर निशान से निकला

    जख़्म के हर निशान से निकला जख़्म के हर निशान से निकलादर्द था वो अज़ान से निकला लोग जो भी छिपा रहे मुझसेबेजुबां की जुबान से निकला इश्क़ के हो गये करम मुझ परतीर जब वो कमान से निकला आँख भर ही गई सुनो मेरीआज जब वो दुकान से निकला आज सब कुछ लिवास से…

  • हवाओं में आ गए | Poem Hawaon Mein aa Gaye

    हवाओं में आ गए ( Hawaon mein aa gaye )   शोहरत मिली तो आज हवाओं में आ गए रिश्ते भुला के ख़ास ख़लाओं में आ गए। हमको नहीं मालूम हुआ कब ये वाकया कब ख़्वाब से सरकार दुआओं में आ गए। फ़िरऔन मेरा इश्क़ बनाने लगा उन्हें बुत के सनम वो आज़ ख़ुदाओं में…

  • बारिश | Baarish Poem

    बारिश ( Baarish )    आई है सौ रंग सजाती और मचलती ये बारिश रिमझिम रिमझिम बूंदों से सांसों में ढलती ये बारिश। दर्द हमेशा सहकर दिल पत्थर के जैसे सख़्त हुआ सुन कर दर्द हमारा लगता आज पिघलती ये बारिश। याद हमें जब आते हैं वो उस दिन ऐसा होता है पांव दबाकर नैनो…

  • कमाल करते हो | Kamaal Karte ho

    कमाल करते हो ( Kamaal karte ho )    लगाकर चाँद पर दाग कमाल करते हो, बातें बड़ी आजकल बेमिसाल करते हो। बेचैन हो जाता दिल मेरा बातें सुन तुम्हारी, खुद से क्यों नहीं तुम ये सवाल करते हो? यूँ उलझा नहीं करते हर बार ही किसी से, बेवज़ह तुम हर बात पर बवाल करते…

  • अमित की ग़ज़ल | Amit ki Ghazal

    अमित की ग़ज़ल ( Amit ki GHazal )   साथ मेरे चली है ग़ज़ल ज़िंदगी भर कही है ग़ज़ल गुफ़्तगू रोज़ करती रही दिलरुबा सी लगी है ग़ज़ल ग़ैर का दुख भी अपना लगे मुझमें शायद बची है ग़ज़ल कैसे कह दूँ मैं तन्हा रहा ? साथ मेरे रही है ग़ज़ल ज़हनो दिल से जो…

  • इस जमाने में | Ghazal Is Zamane Mein

    इस जमाने में ( Is Zamane Mein )  जुबां को थोड़ी सी असरदार कीजिए, करो जब भी बात, वजनदार कीजिए। =================== कलंक पसरा है इतना संभल के इनसे, जहान में बेदाग,तुम किरदार कीजिए। =================== कभी किसी से मिलो,लगे मिला कोई, दुखे दिल,रिश्ता ऐसा दमदार कीजिए। =================== शराफ़त न ढूंढो इस जमाने में यार मेरे, सभंल…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *