समझदारी
2005 की बात है। रामपुर गांव के प्राथमिक विद्यालय में मुकुल गुरु जी की पोस्टिंग हेड मास्टर के पद पर हुई। मुकुल बच्चों के प्रति बहुत संवेदनशील थे और बच्चों से विशेष लगाव व स्नेह रखते थे।
मुकुल जी का व्यवहार बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण, समझदार और प्रेरक था। वे बच्चों की जरूरतों और समस्याओं को समझने की कोशिश करके उन्हें सही मार्गदर्शन देते थे। वे कमजोर बच्चों को उपचारात्मक शिक्षण देकर उनकी पढ़ाई में हर संभव मदद करते थे।
कमजोर व गरीब परिवार के मेधावी छात्रों की भी वे उच्च शिक्षा ग्रहण करवाने में मदद किया करते थे। उनके इस तरह के व्यवहार ने उन्हें बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच बहुत लोकप्रिय कर दिया था।
सभी उनका बेहद आदर-सत्कार व सम्मान करते थे। उसी विद्यालय में नीलम नाम की एक लड़की कक्षा 5 में पढ़ती थी। नीलम अपनी कक्षा के बच्चों से उम्र में काफी बड़ी थी। उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष होगी।
नीलम की मम्मी निशा ने जब तब मौका देखकर विद्यालय आना शुरू कर दिया। अक्सर वह मुकुल जी से नीलम की पढ़ाई के विषय में चर्चा करती। नीलम का घर गाँव की मुख्य सड़क पर ही शुरुआत में पड़ जाता था।
जब कभी भी मुकुल जी, विद्यालय के काम से या विद्यालय के बच्चों को बुलाने गाँव जाते… तो नीलम की मम्मी निशा अक्सर जानबूझकर मुकुल जी को रोक लेती और उन्हें चाय पीने, खाना खाने का ऑफर देती। वे हर बार उनको मना कर देते और आगे बढ़ जाते।
गुरुजी के मना करने पर निशा मायूस हो जाती। इसके बावजूद निशा ने हिम्मत और सब्र से काम लिया। फिर वह दिन जल्द ही आ गया जब एक दिन मुकुल जी को गाँव से वापिस आता देखकर उसने उनको रोकर कहा-
“गुरुजी, मैंने आपको गाँव में अंदर जाते हुए देख लिया था। आपको गाँव में जाता देखकर मैंने चाय बनने को रख दी थी। चाय बन गयी है। मैं आपका ज्यादा समय न लूंगी। अब आपका चाय न पीने का बहाना न चलेगा। चाय तो आपको पीनी ही पड़ेगी।”
मुकुल जी को मजबूरन उनका कहना मानना पड़ा और उसका आतिथ्य स्वीकार करना पड़ा। फिर तो यह अक्सर होने लगा। नीलम के स्कूल से निकल जाने के बाद भी यह दस्तूर लगातार 3 वर्षों तक चलता रहा। जब-जब मुकुल बच्चों को बुलाने गांव में जाते, नीलम की मम्मी निशा उनको रोक लेती तथा उनके घर परिवार के बारे में जानकारी लेकर, अपने परिवार की सब बातें बताकर अपनापन जताती।
फिर एक दिन मुकुल जी का प्रोमोशन जूनियर के हेड के लिए दूसरे गाँव में हो गया। ट्रांसफर के 1 साल के अंदर एक दिन नीलम की मम्मी निशा ने मुकुल जी को बहुत फोन किये और मुकुल जी से जल्द ही घर आने की विनती की।
मुकुल जी ने अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकाला और निशा जी के यहाँ पहुंच गए। निशा ने उनकी खूब खातिरदारी की। गुरुजी के लिए नाश्ते-खाने में उन्होंने कई तरह के व्यंजन रखे। मुकुल जी हैरान थे कि यह सब क्या हो रहा है?
गुरुजी को खाना खिलाकर निशा बोली-
“मास्टरजी, हमने नीलम का रिश्ता तय कर दिया है। लड़का अच्छा है, खूबसूरत है और एक प्राइवेट कंपनी में काम करता है। 40000 रुपये महीना तनख्वाह है उसकी।”
“यह तो बहुत अच्छी बात है।”
इसके बाद निशा ने गुरुजी को लड़के का फ़ोटो दिखाते हुए कहा- “गुरुजी, आपको अपने बच्चों और पत्नी के साथ नीलम की शादी में जरूर आना है। कोई बहाना न चलेगा।”
मुकुल जी ने आश्वासन दिया कि वे सपरिवार नीलम की शादी में आने की पूरी कोशिश करेंगे।
इसके बाद निशा मुख्य मुद्दे पर आई और अपना दुखड़ा रोते हुए मुकुल जी से कहा-
“गुरुजी, आपसे तो हमारे घर की आर्थिक स्थिति छिपी नहीं है। आपको सब पता है कि नीलम के पिता दूसरे शहर में मजदूरी करते हैं। मजदूरी में आदमी कितना कमा सकता है भला? बच्चे पल जाएं, बड़ी बात है। नीलम की शादी हमने जिस परिवार में तय की है, वह परिवार सम्पन्न है।
नीलम राज करेगी उस घर में.. लड़के का नाम अनुज है। अनुज के बहुत जगह से रिश्ते आ रहे थे, लेकिन उसको हमारी नीलम बहुत पसंद आई। उसने नीलम से शादी को हाँ कह दिया। अनुज के परिवार की मांग है कि उन्हें शादी में बुलट मोटरसाइकिल चाहिए।
रिश्ता कहीं हाथ से ना चला जाए इसलिए हमने उसकी हर मांग को पूरा करने का आश्वासन दे दिया है। अब सोच रहे हैं कि बुलट का इंतज़ाम कैसे होगा? तभी मुझे आपकी याद आयी। इसलिए मैने आपको कॉल करके यहाँ बुलाया है।
गुरुजी, हम चाहते हैं कि आप अपनी शिष्या नीलम की शादी में बुलट का इंतज़ाम कर दो। लगभग डेढ़ लाख की बुलट आ रही है। आप सरकारी मास्टर हो। आपके लिए डेढ़ लाख रुपये की मोटरसाइकिल देना कौन सी बड़ी बात है? हम लोग देर सवेर आपके रुपए चुका ही देंगे। हमपर विश्वास रखियेगा।”
निशा द्वारा बार बार कॉल करके बुलाने की मंशा अब मुकुल जी जान गए थे। वे समझ गए थे कि इतने लंबे समय से मुझे जबरन घर बुलाकर, रास्ते में रोककर जो खातिरदारी की जा रही थी… इसके पीछे का उद्देश्य कहीं ना कहीं नीलम की शादी था। इनकी नज़र मुझे मिलने वाली तनख्वाह पर थी।
इसलिए इन्होंने मुझसे मेलजोल बढ़ाना जारी रखा ताकि वक्त पड़ने पर ये लोग झूठा अपनापन, प्यार जताकर मुझे लूट सकें। मुकुल जी को आभास हो गया कि ये लोग भविष्य में मेरे रुपये कभी नहीं लौटा पाएंगे।
अतः मुकुल जी ने सोच समझकर बाइक देने से अपना पल्ला झाड़ते हुए एक ₹5000 का चेक काट कर नीलम की मम्मी के हाथ में रख दिया और कहा- “नीलम की शादी के लिए यह मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट। इन रुपयों को आपको लौटाने की कोई जरूरत नहीं है। मैं आपकी और ज्यादा सहायता करने में असमर्थ हूँ। कृपया इसे सप्रेम रखिये।”
निशा को पाँच हजार का चेक देकर और उनसे विदा लेकर मुकुल जी घर के लिए निकल पड़े। डेढ़ लाख रुपये की मोटरसाइकिल न देकर… सिर्फ पांच हजार रुपये कन्यादान के देकर उन्होंने निशा से पीछा छुड़ा लिया था।
कहीं न कहीं इसमें मुकुल जी का ही फायदा था क्योंकि डेढ़ लाख रुपये निशा कभी वापस देती ही नहीं और उनके सम्बन्धों में दरार पड़ती सो अलग। सही समय पर समझदारी दिखाने पर वे काफी बड़े नुकसान से बच गए थे।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हमें अपने आसपास के लोगों के उद्देश्यों को समझना चाहिए और अपने निर्णयों को सावधानी से लेना चाहिए।
मुकुल जी ने अपने सीमित संसाधनों का सम्मान किया और नीलम की मम्मी की अनुचित मांग को अस्वीकार कर दिया। हमें अपने रिश्तों को सावधानी से बनाना चाहिए और उन्हें अनावश्यक रूप से खराब नहीं करना चाहिए।
मुकुल जी ने अपने रिश्तों को सावधानी से बनाया और नीलम की मम्मी के साथ अपने रिश्ते को खराब होने से बचाया। हमें अपने सीमित संसाधनों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें अनावश्यक रूप से खर्च नहीं करना चाहिए। मुकुल जी ने अपने सीमित संसाधनों का सम्मान किया और नीलम की मम्मी की अनुचित मांग को अस्वीकार कर दिया।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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