समझते ही नहीं

समझते ही नहीं | Samajhte hi Nahi

समझते ही नहीं

वो मुहब्बत को मेरी कुछ क्योंकर समझते ही नहीं
प्यार के वादों पे अब तो वो उछलते ही नहीं

एक हम हैं जो उन्हें देखे सँभलते ही नहीं
और वो हैं की हमें देखे पिघलते ही नहीं

मिल गये जो राह में हमको कभी चलते हुए
इस तरह मुँह फेरते जैसे कि मिलते ही नहीं

नित्य गुरबत का करूँ रसपान देखो मैं इधर
और वह अब कह रहे बिषपान करते ही नहीं

किस तरह से मैं सँवारू आज अपने रूप को
जब सजन ही देखकर मुझको मचलते ही नहीं

रात भर इक दीद की खातिर खड़े छत पर रहे
भूल से भी वह मगर बाहर निकलते ही नहीं

सैर को निकला में उनकी राह से कितनी दफा
पर सुना है आजकल वो तो टहलते ही नहीं

इश्क़ भी हमको हुआ तो एक जालिम से हुआ
ध्यान में जिसके कभी हम तो गुजरते ही नहीं

सोच कर हैरान हूँ मैं दूर उनको देखकर
याद करके भी मुझे आसूँ टपकते ही नहीं

किस अदा से हम लुभाए यार को बतला प्रखर
वो किए है दिल को पत्थर जो बदलते ही नहीं

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

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