Shrishail

श्रीशैल चौगुले की कविताएं | Shrishail Chougule Poetry

विषय सूची

दुःख सहारा वक्त.

वक्त का कमाल देखो
सुरज भी सागर में समा रहा
हम ही क्यों खडे अभी
अंधेरे को साया समजता यहाँ.

धरती का अंग भिगता धीरे से
मेरे आँख क्यों भिग रहे
सितारे चमकने लगे नभ में
मन में मेरे क्यों डर सा.

चाँद कि पुरी रोशनी छायी सी
इंतजार करता वक्त
कोई आए या ना आए राहों में
दुःख सहारा बना वक्त.

नेता की चिंता.

हिंसा से कोई देश नही बनता
अहंम से भी नेता नही चुनता
तिनके बुनके कोसला बनता
ऐसे सेवार्थी का ही देश सुनता.

भ्रष्टनिती से होता देश पतन
संस्कृती-संस्कार अमुल्य रतन
देशभक्त ज्ञान करता जतन
जाँबाजी समय से जीता वतन

असत्य अधर्म स्वार्थ ही कुकर्म
मिट्टी से जोडे जीवन जो विचार
उसकी ही सदा जयजयकार
जो पढाए ग्रंथ वीरधैर्य सार.

पिछे न हटेगा विद्वान ओ कभी
लक्ष जिसका राजव्यवस्था शास्त्र
आदर ,अस्मिता का सम्मान रखे
दया ,क्षमा, मानवता ज्ञानशस्त्र.

चुनौती न समझेगा टिका घोर
शत्रु को हराए प्रेम से जो नेता
वंही जीत देश कि ध्वज प्रेरणा
प्रतिज्ञा पालन कि होगी समता.

हिंसा से कोई देश नही बनता
दहशत को देगा सहज ऊत्तर
प्रजा जिसका संसार बनेगा नित
शरण में आएगा लोकतंत्र के पथ.

कर्तव्य.

कर्तव्य ही कर्म है अपना
दोष नशीब को देना है पाप
कुछ श्रम किए बिना यश
मुर्ख लक्षण है सच्चा शाप. //धृ

बिज बोए बिना कैसी कृपा
धरती दे कैसा वृक्ष-फल
बेली सजे फुल से गंधीत
वायू-धूप-नभ देती जल
ऐसे ही मेहनत करते
भर देती है जीवन माप
दोष नशीब को देना पाप.//१

बूँदो से बनती है सरिता
निरपेक्षित भाव है धर्म
प्रभू होते है तब प्रसन्न
कर्तव्य ही ज्ञान का है मर्म
क्यों गमाए अवसर जनम
बिना श्रम के करते विलाप
दोष नशीब को देना है पाप.//२

कर्तव्य ही कर्म है अपना
दोष नशीब को देना पाप
कुछ श्रम किए बिना यश
मुर्ख लक्षण है सच्चा शाप.

मन कि भाषा.

मन कि भाषा
कोई न समझे
जीना समस्या
प्रश्नों में ही उल्झे.

कहे किसीसे
अपना दर्पण
कोई ना देखे
दुःख अर्पण.

पिडा न बने
औरो को मन
अपने भाव
कर्मो का धन.

समय सत्य
सहते जाना
धैर्य विश्वास
नही है खोना.

उत्तर सही
मिलेगा सभी
मन सुंदर
बनेगा तभी.

ईश्कीयत.

हम चाँद पहनकर निकले
दिल की गगन से लगन
हाय रे हाय, कैसी अगन
भिगे-भिगे से सावन में.

हवा भी कैसी रुख बदलती
बेचैन मन को भी तडपाती
हाय रे हाय ये कैसा रिश्ता
पास-पास रहके दुरी.

आँखो में खुशिया भर वादिया
राह में कितनी बिती सदिया
हाय रे हाय, कैसा जीवन
तनहाई में धूप-छाँव.

फुरसत से पलके छलके
दुःख बताए ओठो से मिलके
हाय रे हाय, ये कैसी रात
हँसते तारे नसीब पे.

ईश्क न होता मुझ मुर्ख पर
दाँव न लगाता मैं प्रेम पर
हाय रे हाय,कैसी जुदाई
जिंदगी को छिनती ईश्कीयत.

एक अमर प्रेम.

भाव ने कहा मन से
नजर कि अंदाज से देखो
मन का उत्तर आया
नजरे अक्सर धोके खाते है
दिल में उतर आओ,
दिल का क्या ?
वक्त के साथ रंग बदलते है
मन का सूर कसमो से
सच्चाई प्रेम कि वादे निभाते है
वादा और शिशा भरोसा नही
अब प्रेम सोच के संभ्रम मे
सारे खयालात का जीवन.
एक मात्र सोच का निश्चय
यादे लेकर लफ्जो से मिलकर
जीने लगा प्रेम,
खुद के अंदाज पर
कलम ही बन गई संदेश
और कुछ पल में ही
लफ्जों के साथ कविताएँ
लहरने लगी मन में
दिल-मन-भाव एक बनकर
प्रेम के बीते यादगार का जल्लोष
प्रेम अमर बन गया कविता से
गगन, हरियाली, सागर, पंछी, पौंधे
फुल खिलने लगे झुमकर
ऋत कि बहारे,बारिश की बुँदे
एक ही सूर में गाने लगे कविता
अमर प्रेम,अमर प्रेम.

कृष्ण जन्म.

दुष्ट कंस कि कारा मे
देवकी-वसू को बंदी
संकट भारी जीवन
विष्णू प्रार्थना आनंदी.

मानो हथकडी बेडी
जैसे ब्रम्हा की परिक्षा
दुःख कि चिंता छोड
भक्ती दोनो कि सुरक्षा.

सपनो में सच्चा वरद
देकर गए जो नारद
सात पुत्र को भी धोका
आठवा कृष्ण हो शायद.

प्रती पुत्र ध्यास लगा
कंस भय से कंपित
हर एक को मृत्यू में
मारने लगा मुर्ख नित्.

साँतवी पुत्री बिजली
आठवा कृष्ण सफल
नंद को प्रसन्न गंगा
स्पर्श होते रास्ता जल.

आकाशवाणी भुलोक
पृथ्वी पे जो अवतार
सब गोकुल मे स्वर्ग
मना अष्टमी त्यौहार.

राज, यशोदा का भाग्य
अपना हि लाल है कान्हा
मथुरा में मौन ही मौन
ऐसा क्षण देव ही नन्हा.

लिला यह जाने ना कौन
शिवा ब्रम्ह के नारायण
गोकुल नगरी मिठा धन
ईश्वर रुप साक्षात् देन.

वृंदावन भी झुम उठा सा
मयूर नृत्य बासुरी साथ
पुष्पवृष्टी गगन से भारी
पँहुची देवलोक में बात.

त्रैलोक्य का आया है रक्षक
अब असूरो की होगी हार
लिलाएँ एक काया आनंद
कृष्ण जनमा जीवन सार.

सूर्य सा चमके मुख तेज
हातो से मानो भोग रचैता
धन्य हो गयी देवकी-वसू
आत्मभक्ती महती देता.

गोकुल अष्टमी शुध्द समय
मंदिर दिप का बने उजाला
कृष्ण आ गया,जी कृष्ण आ गया
यशोदा के सखीयाँ खुशी भाँती.

आज भी कलियुग का ही पुण्य
जो मुरलीधर,कंस विनाशी
चलो मनाए धुमधाम से ही
जन्माष्टमी उत्सवादी खाशी.

.दोस्ती.

अब दुनिया से क्या डर
दोस्त अपने सारे साथ है
सब खुशियाँ जीवन में
दोस्ती, सबसे अच्छी बात है.

पल-पल साया बनके
दुःख में धीर देता दोस्त है
यारी निभाता भाई जैसा
दिल से रिश्ता जोडे मस्त है.

दूर रहकर भी पास
यादें लेकर जिंदगी जीता
मेरे आसूं ,ऊसके आसूं
नेक जो वक्त पे काम आता.

असली विजय.

आप कहते हो
पत्थर बनके लढो
सभी ईतिहास पढो
योध्दा होकर रणभुमी में
अर्जुन कि तरह विजयी बनो
मैं कहता हुँ
जहाँ अर्जुन ही दुर्योधन हो
पांडव कि भुमिका ही दुर्जन
उठाकर खडे है
श्रीकृष्ण ही एक दुष्टों को छात्र
जैसा हो
तो किस कुरुक्षेत्र में जिते हम
प्रजावासी ना कौरव-पांडव कि
ओर
जहाँ रथ भी झुठा और सारथी
भी झुठा
युध्द करना ही प्रजा का विनाश
हो
कुरुक्षेत्र असत्य और हिंसा
अत्याचार ,अन्याय को साथ दे
क्या हमारी भुमी हस्तिनापूर के
योग्य रहेगी ?
आप कहते हो पत्थर बनो
पत्थर में भी सत्य का अंश
नही करता जो सत्य को दंश
युग को लेकर तुफान आँधी से
लढता है
यहाँ पत्थर है कोयला
जो टुटकर बन जाती है
पल में काली राख.
अंदर कि हिम्मत भी अशक्त
जो गांधी विचार को ठुकराकर
विश्वविजेता में जुटा सैन्य
हमे लढना है देश के सुख के
लिए
मगर विचार का गगन बनके
एक चाँद कि राज्य में
सितारे जैसे चमकते चमकते
रहना है हर अंधेरा दूर करने के लिए रोशनी बनकर
एक असली श्रीकृष्ण बनकर !

अपूर्व जीत.

(कारगील विजय को समर्पित रचना.)

अभिवादन अभिमान से
गर्व देश का जवान मेरा
एक तिरंगा और लहरे
कारगील कि जीत सबेरा. / धृ

मिट्टी कि कसम से जवान
लढता रहा हर वीर भला
चढते हुए पर्वत ऊँचाई
पाकि दुश्मन को हराते चला
भारतमाँ को वंदन से प्यारा./१

क्या कहे हमारी वतन रक्षा
सन्मान से लष्कर पुत्र भारी
संकट को चिरते हुए आगे
सैनिक पार करे हिल कि दूरी
कश्मीर’ ईतिहास देश का पूरा /२

आँख में आसू हर माँ की खुशीयां
बलिदान व्यर्थ न गया जिद में
नारा गुँजते जयहिंद’भारत
मनाते दिवाली ही सरहद में
विजय को दे सलामी देश सारा/३

प्रेम जतन.

झुठ प्रेम का करता है असर
जीवन में खुशी का रहता डर.

भुल न समझे हो जाएँ तो प्रेम
बिरहा का दर्द सच्चे दिलबर.

कस्मो से दर्पण का दिखावा होए
प्रेमियों में बेवफाई होती अक्सर.

राधा-कृष्ण के जैसा मन भाव रहे
मिलन कि ब्याकूल यादें हो अधर.

जिंदगी एक वृंदावन का गोकूल
संसार में रहे जतन प्रेम कर.

लफ्ज कि कश्ती.

कुछ लफ्ज थे कश्ती में
दुनिया बेवजह टुट पडी
कविताएँ रुह में
आखिर दुनिया ही झुठ पडी.

हमने भी न छुपाया
गुफ्तगू रिश्ते कलमों से जुडी
कहना था उसको ही
दिले प्रेम बेशर्त बात बढी.

लफ्ज-लफ्ज में जीवन
हर पल बिरहा से ही लढी
दर्द सहना सिखाया
आफत काव्य किनारो में अडी.

सुनसान तुफानो में
जहाँ दिखती लहरे बडी
अक्षर प्रतिभा बने
भावनभ में प्रेमपंख उडी.

भिगी रचना.

अभी-अभी आँख खुली
देखते ही हरियाली
मन में भँवर गुँजे
झुम रहे फुल डाली.

इंद्रधनू में रजत
पुरब से उगम रंग
बुँद-बुँद तृण कण
चमका धरती का अंग.

गगन कृष्ण ही बने
हवा बजाती बासुरी
नये जीवन दिल में
प्रेमऋतू राधा भरी.

ऐसी मस्त दश-दिशा
सावन कि जो आहट
अब झुलेंगे सपने
गाते हुए जळ तट.

रात का चाँद छुपासा
मेघ के पिछे से भाव
कुछ अधुरे सितारे
छुते दृष्टी ख्वाब छांव.

कुशल बनी रातराणी
सरोवर बने गगन
सत्य मेरी कविता कहे
बरसे पाणी में जलन.

पलके बंद घनी रात में
यादों में हँसते लफ्ज कभी
न जाने कब कि बरसात
भिगी रचना राज में सभी.

सावन का कलम.

अब मुझसे रहा नही जाता
सावन कि रिमझीम सी घटा
दिल में कुछ उधल-फुदल
आँखो में बुँदे दर्पण सी छटा.

ऋत वंही,यादे पुरानी छाती
भिगे फुल,बारिष में भाव लुटा
सवांरु कैसे पल मिलन के
अधुरे सपने फिर मन टुटा.

सतरंगो जैसा जीवन सुंदर
वर्षा-धूप से सुख-दुःख समेटा
बेचैनी भी बढाती, भिगी पलके
सावन प्रेम का सबूत है मिठा.

ऐसे में शब्द ना सुझे जो कवी को
वो कैसा प्रेमकवी जाने ही मोठा
कलमो से बरसे बिरहा काव्य
कवीकल्पना देखो झरती घटा.

रुख बदलती हवा.

यह कैसी हवा है
पल में रुख बदलती है
मेरी आँख में धूल
स्वप्नभंग से मचलती है.

दिल में भी ऐसे ही
कुछ जैसे शाम ढलती है
धुआँ-धुआँ जीवन
लफ्जों में आके संभलती है.

बेचैन मैं बाउर
समझ नही पाता ऋत कैसी
यादें लेकर आती
फिर उदास सी चलती है.

अब अंधेरा होगा
तारे हलके पलकों पे ही
शबनम सा स्पर्श
कविता ‘चाँद में मिलती है.

यह कैसी दवा है
बिरहा दर्द भी थमते है
कैसे काबू में रहे
लफ्जो कि जिंदगी खिलती है.

सत्यांश.

मुझे अब कहने दो
मौन सी सारी बाते
बचपन के दिन
दिन जवानी बीते.

कितने ख्वाब सारे
अधूरे दिन सभी
सुख-दुःख में बाँधे
प्रण थे कभी-कभी.

राहे गीत लफ्जों में
खुशियों के फुल सी
जन्नत सी दुनिया
आँखो में धूल सी.

मुझे अब कहने दो
संसार के सारांश
रिश्ते कभी पराए थे
मन भाव सत्यांश.

शांतीशस्त्र.

मैं बोलना भी चाहुँ तो
किसीके बारे में
मौन रहता है मन
डर से नही,परंतु
कंही दंगा-फसाद हो न
जाए
और निमीत्त का कारण
प्रवृत्ती बनकर
प्रकृती पर विपरित न
हो परिणाम
जैसे हिरोशिमा-नागासकी
कि आज भी स्थिती
न्युक्लीअर के अहंकार में
खाक न हो सारा सत्य
मैं मौन हि ठीक हुँ
मुझे मौन ही रहने दो
मुझे मौन ही रहने दो.

तजुर्बा.

अब संभलकर हम भी चले
जो हमे नेक कारवां ही मिला.

हारते हद पार से पहले
जिंदगी को मानो दुआ ही मिला.

कैसा दूर तक फैलाव पराया
नफरत में लफ्जे दवा ही मिला.

मरने का ईरादा जो अमानुष
मानुष बनाने कलमा ही मिला.

लिखते चला गया कहानी सारी
अपनापन का जो गवा ही मिला.

अब क्या शिकवा करु ऐ जिंदगी
कविताओं से ज्ञान सेवा ही मिला.

मर्जी से स्वीकार किया हर लफ्ज
दर्दे दुःख में एक तजुर्बा ही मिला.

साकी.

मैं क्यूँ डरु भला
समस्या मेरी हाला
मुझे ही पिना है जो
जीवन मधू प्याला.

मैं न पिता थोडी
दुःख डाला साकी
महखाना खाली
क्या रहता बाकी.

यार पिना सिखो
दर्द दूर फेंको
हौसला भी रखो
भारी नशा देखो.

और मजा ले लो
साकी कि है जोरी
आगे सुख द्वार
पिने कि है बारी.

साथी यहाँ जमे
दाँव वक्त थमे
साकी से है रिश्ता
जन्म दिया हमे.

बेवफाई नशा.

अब मुझे कौन रोक सकता है
बोतल की ईस शौकिन जाम से
सारे हद गुजर चुका हुँ अब
जिंदगी मौत बनाकर जाम से.

दुनिया समझाती चली गई जो
मैने अपनाया नशे का शहर
मेरी फिकर क्यों करने लगी ओ
मर्जी अहंम से पिता हुँ जहर.

उजड गए जीने के सुंदर ख्वाब
बेहोशी कहाँ सुने किसीके सलाह
संसार का बनाया नाटक जिसने
दिल के दर्द क्या जाने कोई पनाह.

प्याला भी प्रीत भंग खुशियाँ में नाचे
शराबी कहे तो गुनाह, मैं प्रेम रोगी
जवानी के महफिल में जोश का भोगी
माफ कर दुनिया बेवफा का मैं जोगी.

प्रेमभोगी.

एक पल की बात नही
जनम-जनम की बात है
क्या कहे मन की हालात
दुःख ही अपने साथ है.

दुनिया से कँहू कहानी
तकदिर मेरी जाँत है
भेद काहे कर्म में करु
भोगी की चली बारात है.

कौन अपना-पराया है
जीवन को सब ज्ञात है
अंजाने की प्रीत है यँहा
यह संसार का प्रांत है.

कविता जीवन.

उम्र और भी होती तो
कुछ लफ्ज और बंया कर देता
कलम और साथ देती
कविताओं में भर देता जिंदगी
क्या करे,सागर को भी है
किनारा,मन कि लहरों को पंक्ती.
यह नाव एक घटना
जो तैरते-तैरते पार करती है
सुख-दुःख के सभी यादे
फिर भी मेरी कविता को उम्र कँहा ?

जीवन जादू.

ये जीवन है एक जादू
बाकि खेल निराले है भोंदू
भव है झूठासा तकलादू
संसार में कर्म जीए साधू.

भौतिक से निकले पैसा
भोग मे एक अभिलाषा
बढता हि जाता है तमाशा
बचपन यौवन निराशा.

पत के लिए बने पापी
जैसे वाल्या ही नित् शापी
अधाशी दशेंद्रिंय तपी
मृत्यू का सत्य ही छूपाती.

आचरण अच्छाई मन
देगा संस्काररुपी धन
देह सत्व का सच्चा सदन
पालन प्रार्थना जीवन ऋण.

तकदिर का फेरा.

जिने कि उम्मीद को
मंजील का सहारा
शिकवा न किसीसे
तकदिर का फेरा.

दुःख भी साथी बडा
दुनिया का उपकार
साये भी पराए है
हो सबका ही उध्दार.

मेरा क्या, मैं से रिश्ता
मैं से हात मिलादू
मन भी कहाँ सुने
जो हाल बतलादूँ.

रुक नही सकता
राहे जिंदगी थोडी
बदल नही जाता
नशीब रेखा टेढी.

मुझपे न वो जाए
जो सुख माने जीना
खुश रहे ये दुनिया
सिखा हुँ गम पिना.

माहौल.

यह कैसा माहौल है
जहाँ चेहरे नजर आते नही
देखो मगर डौल है
जहाँ ईन्सान नजर आते नही
अवयव जाने से
पहचाने से जो अपनाते नही.
ईतनी ऊँची काया
प्रेम का रंग नजर आते नही
रिश्ते नाते धर्म कि
अवशेष भी इंसान पाते नही.
यह कैसा माहौल है
जहाँ जीवन भी साँस लेते नही
खुद के शोहरत में
आग-धुआँ भी कोई बुझाते नही.
मौत-मौत का सामना
खाक शहर कोई बचाते नही.
युध्द कहे कि विनाश
खून जरा भी नजर आते नही
यही सच कलयुग
दया-क्षमा-शांती में समाते नही
सत्य ढुँढे तो ना मिले
अग्नी कि बौछार आँखे रोते नही
फिर ना जीवन
माहौल मृत्यू का रोक पाते नही.

सुनो भारतवासी

जो रंग कभी न जाए फिका भी
ओ तिरंगा है सुनो भारतवासी
चाहे ऊस तरफ शत्रू हो कोई भी
तिरंगा के मोह में फँसेगा विदेशवासी.
गीता-रामायण कि ताकद तिरंगा
यँहा कि नारी दुर्गा द्रौपदी या झाँसी
समता ममता सत्य अहिंसा जँहा
ओ तिरंगा गगन में ऊँचा भारतवासी.
लहराता तिरंगा पर्बत के ऊपर
और लहर भी पवन के साथ गाती
आझादी खासी.
देशभक्ती के खातिर दिए आहुती
स्वातंत्र्यसेनानी वीरों को भी फाँसी
आज भी सीमा पर लढता है जवान देशी.
जयहिंद ! वंदे मातरम् !!” जयघोष
हृदय चिरता भारतमाँ का वरदान
अमृतवर्ष के क्षण पर प्रणाम शत
करो भारतवासी.

प्रतिशोध.

हम प्रतिशोध लेते है
जब खुद से ही
दोष दुनिया को देने
में क्या अर्थ है.
खुद से ही पुछ ले
जरा, हम क्या है
तो एक गुनाहगार है
जीवन के,जो सत्कर्म के
उसूल जाने बिना
तकदिर को रहते है कोसते
जब अपने ही अंदर के
शत्रू को नाश करके
एक ज्ञान की प्राप्ती करते
रहते है
सारे विकार को मारकर
और दुष्कर्मो को जीतकर
विजय प्राप्त करते है
खुद पर
वही असली प्रतिशोध है
और पात्रप्राप्ती है
काया को एक नाम धारण
करने के लिए.

गरिमा.

युँ ही जिंदगी गुजर चली
कुछ यादों के सितारे लिए
मैं गरिब कैसा दोस्त बनू
उसने प्रेम का चाँद ही दिया
मुझे लगा शायद दिल कि
दुनिया बस जाएगी मन के
गगन नगरी मे
पलक झपकते ही सपना
बन गया पल-पल
अब बारिश कि तरह बहते
आंसू के सागर में सफर
प्रेम के चाँद को संभलते हुए
कँही डुब न जाए
उसके बेवाफाई कि तरह
मैं तब भी अपने जीवन कि गरिमा जानता था,

जब उसने दिया वो चाँद
नही था,
आज भी उसी गरिमा में हुँ
उसी चाँद कि रोशन में
जहाँ कायम दिल उजाले में
रहता है
तुफानों को सहना भी सीख
लिया है
पलकों के किनारों पे कँही
अपने जीवन कि गरिमा न खो जाऊँ
और प्रेम का चाँद भी.

वक्त से समझौता

कभी चलता है
कभी रुकता है
हँसते-हँसते
पल में रोता है
ये वक्त सभी का
होता और खोता
जिंदगी करले
ईसे समझौता.
ज्ञानी या अज्ञानी
होनी अनहोनी
मत कर गर्व
वक्त तेरा सत्य-
असत्य अवस्था
तेरी काया और
श्वास और खंत
प्रारंभ या अंत
दुःख का विलाप
वक्त ही तो साथी
जिंदगी करले
ईसे समझौता.
वक्त वर्तमान
कल था,कल भी
वायू या जल भी
वक्त बनाता है
मन से दृढता
नाम से आत्मा भी
युँ मानो परमात्मा
वक्त ना मानो तो
तू जीत कि हार
अहंम संहार
अस्तीत्व विहार
वक्त सबकुछ
जिंदगी करले
ईसे समझौता

चार कदम.

१.
लाख कोशीषे कर मगर
तेरा खेल नही चलेगा
तकदिर का गनिम आगे खडा
काया लेकर एक दिन जलेगा.
२.
जाने के बाद रोना काहे को
जिंदापन को जान न पाया
कर्म न जाने,रत् हो गया
सच्चा जीवन भव में खोया.
३.
छोड झूठी ईच्छा,मनोकामना
तेरा ही तु दुश्मन है
औरों का नशीब छीनकर भी
तेरा जीवन एक कफन है.

एक ज्ञान ज्ञानी कि साधना
ध्यान-चिंतन नाश वेदना
दुःख क्या होता है पता नही
मैं का हवन सफल जीना.

छलका जाम.

बरसे बुँदे तरसी आँखे
घन नभ से बीजली झाँके.

मन भी भिगा तन भी भिगा
पंछी पौंधे भी पवन झोके.

पर फडफडे सृष्टी काया
पर्वत नदि बादल रोके.

भाव नचाती कोयल गाती
मयूर भाँती फुल नहाके.

राज प्रेमका धरा छुपाती
हरे रंग की भिगी पलके.

दुःख या हर्ष क्या कँहू स्पर्श
धुप में वर्षा जाम छलके.

आसू.

मुझे कहाँ पता था
आसू मेरी जिंदगी है
मुझे खबर ना थी
आसू मेरी बंदगी थी.

कुछ रिश्ते ऐसे है
छुपे गम जिंदगी है
लागी नही छुटती
दिले जांन बंदगी है.

आँखे भिगौते रोना
फिर मौन जिंदगी है
आंसू मोती बिखरे
खयालो से बंदगी है.

आंसू सदा सोबती
खुशी कभी जिंदगी है
टुटे शिशा दिल का
प्रेम कि ये बंदगी है.

पलको से छिलके
आंसू लम्हा जिंदगी है
जितने भी बहाए
पल-पल बंदगी है.

मुझे कहाँ पता था
आंसू मेरी जिंदगी है.

धोका.

हिंदी प्रेमकाव्य.

जश्न मनाना था ,मुझे जिंदगी का
वक्त ने मगर धोका हि दे दिया
कैसे बताऊँ मजबूर’ खुद से
खुद ने आखिर धोका दे दिया.

और कोई नही होता है दुश्मन
मन चंचली ने धोका दे दिया
आँख लगी क्या जरासी अपनो मे
सपनो ने जिंदा धोका दे दिया.

सुख ढुँढने दिल-दिवानगी
भरोसे ने ज्यादा धोका दे दिया
नाराज जीवन किसीकी हँसी
ईमान में वादे,धोका दे दिया.

चलता है अब यादों में जीना
दर्दे आँसूओ ने धोका दे दिया
बरखत टुट गयी ख्वाबों कि
जनाजे ने मेरे धोका दे दिया.

जीवन मरणः एक समय

उम्र बुढापन
दिल का दौरा
ठेंच लगने से मौत
यह तो हो सकता,प्रारब्ध.
लेकिन सबकुछ जानकर
विज्ञापन का विश्वास पाकर
क्या जिंदगी का दावा
कर सकते है ?
चलते चलते ही साँस भी
कभी रुकते है.
हवा में लहरता जैसा
भौतिक का आनंद
हवा से ही बनी साँस को
धोका.
कुछ हुआ है
यह भी नही कह सकते
कुछ भी नही हुआ
यह भी कह सकते है
नशीब कहे तो प्रकृत्ती-प्रवृत्ती
में सतर्कता बेपर्वाही.
जागरुक रहा जीवन भर
फिर मौत को तो आना ही था
बचा न कोई अमीर-गरिब
एक दिन सबको जाना ही था.
अस्थीस्पंजर पे सोचे पल
ईच्छाधारी होकर भी मृत्यू हलचल
सोचे पितामह कैसा ये खेल
कृष्ण कहे तब,
‘प्रारब्ध का समय मेल’
मैं ये करता तो बच जाता
शायद
शायद तो शायद ही होता है
मृत्यू के आगे विश्व रोता है.
दुःख या बैर मृत्यू से नही
परंतु
काश बताया भी उन साँसो को
अब समय जीवन खोने का
हम भी शोक न करते रोने का
थोडि सहकारी आया भी था
दूत बनकर देने सुचना
फिर क्यूँ करते रहेंगे आलोचना
बाकि कि मौत एक बचा
यँही तो प्रारब्ध ही सच्चा.
जनम मरण दिखाई देता
शायद
शायद हि तो शायद होता है.
ऐसा न करता तो रह जाता ?
भुकंप-तुफान-सैलाब
प्रलय मृत्यू का कारण
समय ही एक सत्य है मानव
बाकि सबकुछ मिथ्या है!
बाकि सबकुछ मिथ्या है!!
कर्म सावधान,यँही जागृती.

सृष्टी और मन का रुह.

कँहा से आता है चाँद
धरती कि आँखे रोशन करने
कँहा से सितारे आते
सृष्टी के सपने ही पुरे करने.

वँही मन का रुह भी
लगता है जीवन हर्ष भरने
दुःख मिटाने के लिए
बहते आँख से है ऋतू झरने.

ईमाने ईश्कियत.

ईतनी नेक नही थी कभी
दिल मोहोब्बत करने से पहले
नजरे भी बेईमान तेरी
तुझे ख्वाबसजे भरने से पहले.

सच कँहू तेरी बेवफाई
मुझे बदनाम करने से पहले
पता नही चला जिंदगी में
आज तु जलील मरने से पहले.

और भी बहोत थे दिवाने
तुझपे भरोसा हारने से पहले
तेरी ईश्कि में लुटे ईमान
दिल न्यौंछावर करने से पहले.

हर्ष ऋतू.

बादल बन गए पंछी के पर
दूर गगन में सावन का घर.

पवन मधूर सी गान भी कोयल
तितलीयाँ भँवर फुल-फुल पर.

नन्ही दुनिया का मन भावन सारा
धरती हरे रंग सजाए मन हर.

कृष्ण के भाँती सूर लहराती ऋतू
क्षण में भिगे,क्षण में सुखे से नीर.

झरने छुनछुन पैंजण नचाती
मानो राधा का आनंद भरा अधर.

मयूर केकारव खिले आम्रबन
जहाँ भी देखो हर्षोउल्हास सफर.

जीवन भी सुख-दुःख खेल धुप-छाँव
सावन आया,सावन आया मेघ भर.

सावन कि अगन

नभ में छायी काली घटा
यादों में मन रुठा-रुठा.

सावन लाए हरियाली
भिगे भाव से दिल जुटा.

सृष्टी भी झुलती झुलन
धुप-छांव में तन मिठा.

भिगेपन में भी अगन
वर्षा बुँद ने प्रेम लुटा.

कैसे सँवारु साँस हवा
अब काबू संयम छुटा.

शब्द बने दूत हमारा
कविता में गाती है घटा.

फिर से मिलन कि आस
आँसू लिखते है दिल टुटा.

शहिद जवान !

मैं
एक सुरज कि रोशनी
रात का चाँद और सितारा
बनकर रहुँगा
ईस भारतमाता कि मिट्टी
के कण-कण में
जिंदा,मैं..
शरिर से ईस माँ कि सेवा
में अपूर्ण रहा
किंतू असमर्थ नही.
अशरिर से हर जनम
में नया रुप लेकर आउँगा
भारतपुत्र बनकर,
आपकि ‘अमर रहे शहिद जवान !’गर्जनगुंजन आसमान
में लहराता देश कि सेवा में
आत्मा बनके
भारतमाता की जयजयकार में समाता हुआ
मैं एक जवान, शिपाही !
कर्तव्य का समर्पण
भारतमाँ कि चरणधुल में
सदैव
तिरंगा ध्वज कि लहरान
राष्ट्रद्रोही को चिरता हुआ
मेरा रुह,
लढता रहेगा,कदम बढाते हुए
हर जनम में,कहते हुए
वंदे मातरम् !
वंदे मातरम् !!

शोक साथी.

एक हाला चार साथी
गम प्यासा डाल साकी.

भर प्याला आज भारी
हम साहे हाल बाकी.

मन रोता शाम हँसे
सब साथी दुःख शोकी.

खुश पीता दौर दिले
अब शोला राख पांखी.

कुछ बुँदे गिर जाये
वे आँसू संभाल साकी.

लफ्जों का सिलसिला.

डुब ही जाने दो लफ्जों कि मय में
दुनिया में हिम्मत कँहा तय मे
मेरा तो धर्म, लिखना है जिंदगी
शायर कि मौत शायरी लय में

रुह से जब भी पुछता हुँ
यह कैसा लफ्जो का ये सिलसिला है
हँसते हुए आवाज कभी आती है
ए शायर के शायरी का हौसला है.

प्रभू लिला.

प्रभू कि लिला खेले जो गोपाला
सुंदर ग्वाला हरी नंदलाला.
रुप सलोना मोरपंख साजे
बासुरी बाजे कन्हैया सांवला.
देव जगत् धन्य रे भगत्
बाल क्रिडीत भगवान भोला.
चरण पुण्य गंगा भी पावन
नीर श्रावण प्रणाम उजाला.
यशोदा तंग गोपीयो के संग
राधा में दंग कृष्ण स्वर्ग माला.

वक्त महखाना.

आबाद जिंदगी के लिए
हर पल जिना भी जरुरी है
दुःख सहकर ही सारा
हर गम पिना भी जरुरी है.

मतलबी दुनिया जहाँ
जाम भरा होना भी जरुरी है
अपनो ने दिए हूए जो
आँख भर रोना भी जरुरी है.

महखाना वक्त का खैर
ईश्कियत देना भी जरुरी है
नशा उभरती यादो की
दिवानगी पिना भी जरुरी है.

बडी मुद्दत से जी चाहे
मुलाखात होना भी जरुरी है
उसकी अदाए मन में
भुले फिर लाना भी जरुरी है.

देह सखीयाँ.

एक मन तीन सखीयाँ
पुछती रहती कौन पिया
एक ही जैसी रुपवती
पहचाने कैसा रसियाँ.
कृष्ण कि लिला ओ ना जाने
मगर मन भी ना माने
सखियाँ हँसती उस पे
प्रश्न भाव भोले अंजाने.
एक रोज कि जो कहानी
सखीयाँ आए घाट पानी
रसीयाँ के लोचन खुले
काम क्रोध लोभ दिवानी.
सखीयाँ घबराती बोली
क्षमा भगवान भुल की
कृपा से प्रकट कन्हैया
भोग राणीयाँ कबुल की.
मुक्ती कि याचना करती
कर्म लोक कि यह आसक्ती
प्रारब्ध में महत्व बोलते
प्रभु देखो,भव त्यागे युक्ती.

जीवन लम्हा.

एक लम्हें में बाँधकर
जीवन का दौर सफर
सुख-दुःख कि राहो में से
निकले समय गुजर.

कभी धूप की असहाय्यता
मंजीलो में काँटे असर
फिर भी खिलाए ये फुल
ना छोडती कर्म कसर.

मैं क्यूँ मानू जीवन हानी
वक्त मेरा है अवसर
चलता रहना धर्म है
हलाखूँ सलोखा बसर.

ध्यान का स्थान.

उध्दव मित्र कि शंका न्यारी
एक दिन कृष्ण,उल्झे भारी,
देव तुम्हे भक्त भक्ती प्यारी
पट के द्यूत पे द्रौपदी हारी.

क्यूँ न समय पे पँहुचा हरी?
अब उत्तर दो कृष्ण मुरारी
वस्त्रहरण कौरव अघोरी
तुम्हे न चिंता ‘पांचाली’अधूरी ?

अब्रु से लज्जीत सत्य बिचारी
दुष्ट दुर्योधन था व्याभिचारी
हँस रही थी सेना दरबारी
धर्म रक्षा क्यूँ न कृष्ण सँवारी ?

भगवान का क्रोधविन ज्ञान
सुने उद्धव बडे सावधान
लगे मित्र को जीत भ्रांती वाण
हँसना प्रभू का’ भईत प्राण.

कहने लगे प्रसंग कि कथा
जनम-मृत्यू लोक कर्म प्रथा
पुछो बहन द्रौपदी को दुता
देर से सुनी पुकार सभ्यता.

मित्र,आत्म हाक का मैं देवता !’
‘कृष्ण’ कँहू तो विश्व संभलता
संसार माया ,देव को भुलता
क्या द्रौपदी ने मुझे बुलाया था ?

पहले दरबार में भिष्म गाथा
फिर विदुर को देखती रक्षता
कृपाचार्य द्रोणाचार्य कि क्षमता
द्रौपदी को अपनी आशा लुब्धता.

धर्म और अर्जुन स्तब्ध वचनी
भिम निराश, व्याकुल सुलोचिनी
नकुल-सहदेव से विश्वास ऋणी
पर संसार संकट में न ध्यानी.

अंत क्षण में ‘कृष्ण’नाम भक्ती का
पल में रक्षण कर्तव्य पुर्ती का
हे उध्दव,संसार माया गती का
द्रौपदी को न छुटा ये आसक्ती का.

पहली पुकार होती जो मुझको
क्या हिम्मत कौरव भी करती
मैं समय में था जो संहरती
ईस मोह जाल में फँसे अती
कैसे मैं पँहुचू रक्षण प्रती.

उद्धव क्षमा माँगे ये प्रभू को
लिला कर्म कि भुगत सभी को
ध्यान आया उचीत अजबी को
मोक्ष कृष्ण का मित्र मैं अज्ञानी ?
प्रसन्न स्वयं निमीत्त विश्वमुनी.

कंचे कि सच्चाई.

बिखरे कंचे उठा रहा हुँ
मन में यादे लुटा रहा हुँ
मैदान वँही ढुँढ रहा हुँ
पाठशाला ओ जुटा रहा हुँ.

कँहा गये सब दोस्त प्यारे
खेल कुदने आते थे सारे
उसी जगह अब बझार
कैसे पढे हम नन्हे तारे.

रंग-बिरंगी कंचे लुभाए
तरह-तरह के बिखरे
घंटा भी न याद रही तब
मास्टर आकर जो ठहरे.

भीड जनों कि हँस रही थी
बचपन में खोया था खडा
शिक्षापन से ईतना जुडा
लज्जीत होकर चल पडा.

सोच रहा था पाठशाला की
पुछा जाकर सिधा पंच को
बोले,’ग्राम का बझार बना’,
मन उदास फैंका कंच को.

अब मिट्टी ना धुल-बारिष
सिर्फ विज्ञापन का ही वारिस
ईतने में दोस्त राजू मिला
करता रहा मेरी ही शिफारिश

कंचे जैसे ढलते सितारे
बुढे होकर भी बच्चे कोरे
टि.व्ही.मोबाईल झुठा दिल
कँहा गए राष्ट्र-भक्ती नारे.
(कंचा ः रंगबिरंगी काँच कि गोटीयाँ )

नंगे फेरे

एक तकदिर पे भरोसा
एक मृत्यू को अपनाने की ईच्छा
एक जीने कि राह पर चलना
एक किसी को जीवन देना
नंगे को नंगे कहना पाप है
वस्त्र से झाँकना ईन्सानियत,
वैसे तो पाँव नंगे ही चलते है
और रस्ता भी तो नंगा है
नंगे गगन की नंगी छाँव में
जरा सोचो,दिगंबर है काया
मन बुध्दि ही सात्विक है
जो नंगे को निर्मळ दृष्टी से देखे
माता के स्तनपान में बालक नंगा
पत्नी के यँहा यौवन नंगा
पोते के सामने जर्जर नंगा
यँही असली रुप है सृष्टी का
जिसे हम कुदरत कहते है.

जिंदा मृत्यू.

जीने कि आदत जो पड गयी
सब देखकर अंधे रहना
सब सुनकर बहिरे होना
सब जानकर गुँगे रहना
थोडा बहोत लंगडा लूलाभी
ऐसे जिंदगी को क्या कहना.
वर्तमान भयंकर ही है
खुद के संकट खुद हि सहना
क्या दुष्प्रवृत्ती में उचित बहना ?
सब जानकर अंजाना बन जाना
सत्य अहिंसा को है किसने माना
एक नही अनेक समस्या का संभ्रम
फिर भी जीवन नाम ईसका
मरके भी जिंदा है रहना.

दिल का सफर.

यह जीवन जिंदा
दिल धडकने तक
यह माया ममता
दिल धडकने तक.
यह संसार दृष्टी
दिल धडकने तक
यह सुख- दुःख है
दिल धडकने तक.
यह मंजीले राहे
दिल धडकने तक
यह जन्म दिगंत
दिल धडकने तक.
सभी खेल काया के
दिल धडकने तक
प्रेम भक्ती संगत
दिल धडकने तक.
क्या है यह दिल्लगी
दिल धडकने तक
दिवानापन मन
दिल धडकने तक.
दिल को संभलना
दिल धडकने तक
एक सफर जिंदा
दिल धडकने तक.

चेहरे कि दुनिया

कुछ खुबसूरत चेहरे खाते है
बदसूरत मगर,सुंदर मन
कितनी जिंदगानीया बरबाद भी
गहराई दर्द जख्म,लफ्जही धन.

आईने देखता हुँ मैं बार-बार
सुंदर दुनिया खेलती है दिल से
अपनाने को ठुकराकर बेफिक्र में
रात ना होती खफा चाँद मंजील से.

ओह रे ,जीवन निर्माता भेद के
जलते है सुंदर बदसूरत पे
एक जैसी होती भुमी जो अगर
शायद न हँसते किसी मुरत पे.

मामला

अब क़ँहा ढुँढू राम-रहिम
सारा मिडीया युग मामला है.

मंदिर-मश्चिद ,साधु-मुर्च्छिद
नेता का डर सत्ता मामला है.

नमाज-आरती पठण कँहा
डिजे पर रिमीक्स मामला है.

दुर के मेहमान रोज होती
बातें, मोबाईल का मामला है.

रिश्तों से ज्यादा ऐप अॕडमीन
मौन चॕटिंग योग मामला है.

हँसना-रोना कुछ चिंता नही
मेसेज का जमाना मामला है.

सपनो में दोनो प्रसन्न हुए
संभालो प्रलय का मामला है.

नसिब का साकि

मगर हम जीते किस लिए है
दुःख-दर्द से भरा जाम लेकर
जिंदगी कि हाला,नसिब का साकी
जहर जानकर भी जो पिकर.

मगर हम रोते किस लिए है
जो अपना नही,वक्त को ही पाकर
खोकर खुशियाँ ख्वाब पाते नही
जीवन मैफिल के नशिले होकर.

यह कैसा जाम पिला दि साकी
कुछ और प्याला दे खास भरकर
जिसमे झुठी कस्मे ना हो कोई
नाते रिश्ते सत्य भर दे सुखकर

परेशान

मैं कितना मशहुर हुँ मगर
खुदसे क्यूँ ईतना मैं दूर हुँ
दुनिया में जितना नाम कमाया
खुद पर क्यूँ मैं मजबूर हुँ.

हर किसीने साथ दिया पर
अपने मन से क्यूँ नामंजूर हुँ
अहंः से ठुकराया प्रेम दिल
अस्वीकार का एक दस्तूर हुँ
मैं कितना मशहूर मगर….!

तकदिर से हाथ मिलाकर
तस्वीर से खुद के मग्रूर हुँ
समय से समझौता करके
जीवन में ठोकर से चूर हुँ
मैं कितना मशहूर मगर
खुदसे ईतना क्यूँ मैं दूर हुँ.

आस.

नजर में पूरे दुनिया कि नफरत
दुःख का जहर पलको से ऊतरता है
अब आखरी मुलाखात कि जरुरत
बीते दिनों कि याद में दिल उभरता है.

एक समंदर को किनारे कि ख्वाईश
मुझे बुँद काफी प्रेम तेरा सँवरता है
मौत आज-कल साथी नित् संदेश का
अक्सर खुशियों से मन उभरता है.

जीना नशीब होता है ये जानकर भी
तेरे उन खयालों से जो मचलता है
कैसे ठुकराए वक्त को सोच भी धोका
थोडी आहट मुस्कान में उभरता है.

क्या है कविता.

मन में जो रहती है
ओ कैसी कहती ‘कविता’
कलम से उतरे नज्म
जो दिल से जाए लिखता.
बात सागर-तुफान
दबी रहे ओ न कविता
और तीर बने लफ्ज
लहरों के जैसे लिखता.
जब यादे मेघ बने
आँखो से शाई कि कविता
जो रोती नही कभी
लफ्जो में कैसे मैं लिखता.
डेरे कि धडकन
आग में तपे पानी कविता
जो झाँकि से निकले
उसे शायरी में लिखता.
हर पल सोचती
वह अमर होती कविता
अनुभव नाम से
किताबो में रोज लिखता.

राधा कि राह.

राधा नाचे,दिल ए सोचे
वो कृष्ण-कन्हैया कब आए
यँहा देखू ,या वँहा देखू
जँहा भी,कान्हा नजर आए//धृ/

पनघट पे बैठी-बैठी
लज्जा रखके घुंगट ओढे
पुरब लाली तंग करे
सखीयाँ देखी तो छेड काढे
हाय क्या बताऊँ मन रोए
राधा नाचे,दिल ए सोचे
वो कृष्ण-कन्हैया कब आए //१/

भोर भए मैं उठ आयी
सबसे छुपके घगरी लेके
नीर बहाना कर आयी
मिलने कान्हा को मगन होके
बसुरियाँ कि धून सुनाए
राधा नाचे,दिल ए सोचे
वो कृष्ण-कन्हैया कब आए//२/

कितनी लिला याद करुँ
अब काया काबू में ना रहे
धडकने बनी आहट
उसके शिवा किसको कहे
शाम को ए कैसे सामझाएँ
राधा नाचे,दिल ए सोचे
वो कृष्ण-कन्हैयाँ कब आए //३/

मेरी कविता का कारण.

आसमांन में उडती चिडीयाँ
फुल पे मंडराते तितलीयाँ
पर्वा नही करते है तुफानों की
वृक्षभी निर्भीड होकर खडे रहते है
फल और पौंधो को समतोल रखकर
ऋतू के साथ ही पंखोतले जीवन
कि सैरभैर चलती है
किंतू,
मानव क्यों चंचल है बुध्दि ,विवेक,
वाणी होकर भी ?
अक्सर यँही सवाल छेडता है
अंतर्मन को
और मैं मगन होकर कलम कि अस्वस्थता दूर करता रहता हुँ
अपनी नयी कविता को जनम
देते हुए.

सुख और दुःख.

सुख बिन माँगे ही मिलता है
दुःख माँगने से भी मिलता नही
फिर भी भुखा जीवन भिकारी
आँसू का अमृत भी मिलता नही.

महल में राजा चिंता ले बैठा
झोपडी में रोशन ढलता नही
चैन का नाटक खुब करे
सोने चांदी में रोटा मिलता नही.

कटोरी खाली भरे संतुष्टी से
तेरी थाली में दर्द मिलता नही
सच कहुँ दुंख कि ये कहानी
अंत में आत्मा मोही जलता नही.

देखो रोना मन का धीरज
अमीरी शिशो में भी मिलता नही
मन के भाव जाने मनही
काँटो से भरा दिल मिलता नही.

अनोखी राह.

जिस राह पे निगाहे
वही जीवन चलता
पाना-खोना एक ख्वाब
सुख कहाँ है मिलता.

हम भी अंजाने राही
भटकता जीवन है
मुसाफिर जन्म-मृत्यू
जीना ही मधुबन है.

पिछे लंबा सफरसा
आगे कौनसी मंजील
ना संदेश ना खबर
वर्तमान भी गाफिल.

मरणभय जमाना.

आज भय है जीने में
धैर्य है गम पीने में.

हिंसा देखे नैत्र अंध
देखके दर्द सीने में.

अबला का अवमान
द्रोहसा हर कोने में.

जलता मरता सत्य
आंदोलन के ताने में.

अन्न पानी सुख नही
पेट कि भुख रोने में.

मै तु ओ और सभी ही
व्यस्त जांन बचाने में.

संपत्ती को चैन कहाँ
दिक्कते तेज सोने में.

सुबह का सुरज भी
परमाणू हि ऐने में.

एक पल रुके तो जो
जिंदगी वक्त खोने में.

न ख्वाब,न मन खुशी
जन्मे ईस जमाने में.

फर्क.

मैं अरब
तु अजम
तु पतियाँ
मैं कलम.
मैं मक्सद
तु हलाखू
तु फुर्सद
मैं शायर.
तु बेफिक्र
मैं उल्झन
मैं सुल्झन
तु बेसब्र.
मैं रुबाई
तु कसाई
मैं ईसाई
तु मग्रुर.
मैं जीवन
मधुबन
ज्ञानधन
तु मरण.

( ज्ञानपीठ पुरस्कार-२०२५ सम्मानित आदरणीय हिंदी साहित्यीक विनोदकुमार शुक्ल की १९९७ -साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हिंदी उपन्यास
“दिवार में एक खिडकी रहती थी”.पे उपन्यास का सारांश रुप सुनकर मुझे सुचित उसी विषय पे
कुछ मेरी काल्पनिक भाव से शब्दबध्द कि गई कविता.
अच्छी लगी तो हिंदी विशेष कार्यक्रम में आप के द्वारा प्रसारित करेंगे यह मेरी दृढ अभिलाषा. )

“दिवार में एक खिडकी रहती थी”

दिवार में एक खिडकी रहती थी
जिसमें बैठकर मैं बाहर कि दुनिया झाँकता
खिडकी बाहर कि दुनिया लेकर ,
मेरे मन में झाँकती
हर सुबह-शाम,कभी भी फुरसत में,
एक सुंदर नजारे के साथ मुझे सपनों कि दुनिया में रखती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
मैं और मेरी बिवी भी,दोनो का भारी रिश्ता सा जुडा हुआ था
खिडकी से
मैं कभी अपने मन की बात कहता
और खिडकी बाहर दुनिया की कहानी कहती
मेरी मनोधारा खिडकी के संग ही बाहर कि दुनिया प्रवाह में बहती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
बिवी खिडकी में साथ बैठकर कभी तक्रार समझौता करती
हर संसार कि समस्या का हल
सुलझाती
खिडकी भी गौर से हर प्रश्न को सुनती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
एक दो दिन बिवी मईके क्या गयी
मेरी खिडकी के साथ खुब जमी
मेरे एकांतवास को कुछ नही पडा कमी
तितली बनकर मेरा मन, मन से ही बाहर कि दुनिया के कामना में लहराती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
एक दिन नोकरी से लौटते देर होने पर सँवारी न मिली,
अचानक एक साधू हाथी पे सँवार होकर हाथी पे सहजता से
उठाते बोला,
‘बैठ जाओ,बाहर कि दुनिया का सैर सफर करे दोनो
रंगीन मजा दिखलाऊँ तुम्हे ,
मैं जरा घबराया सा,धीरज से
साधु के आगे आसन में बैठ गया
ईतना बडा सिंहासन,राजा जैशी
साधु कि युँ लंबी दाढी और गले में रुद्राक्ष मालाओं कि माल,
माथे से लेकर शरिर में राख कि विभुती,मानो सप्तऋषी,
दर बदर सैर सफर हाथी हमें करवाती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
चमत्कार ही चमत्कार जिधर जाए नजर
एक जंगल पर्वत-दरी से पार-पार
फुल,तितलीयाँ,ढेर सारे फल हाथ मे ऐसे ही आते
सरित धार को हाथ में लेकर ,सागर भी समाता और
पवित्र जल में अपना रुप मैं देखता
प्राणीयों का समुह,बाप रे !
कितने शेर,हिरणों का समुह ऊछलते कुदते
रंग-बेरंगी गगन में इंद्रधनू को स्पर्श करता
हर एक पंछियों के पंख को छूते
सुस्वर में गाते हुए,राजहंस भी
स्वागत के लिए पर फैलाती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
रात का चाँद हँसता मेरे पलको को हलका प्रकाशमान करती
सितारों को शरिर में युँ लिपटाता
रोशन रोशनाई का स्वर्ग जो षृमन को भाँता
हरि भरी वसुंधरा हँसती हुई
हर्षोउल्हास में मुझे गोद में लेती हुई,साक्षात देवी ही दिखती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
एक बुढी अम्मा ठिक खिडकी से
आगेवाली टपरी पे हर दिन आती
चाय पिकर चली जाती,कभी हँसकर मिठास भरी नजर से देखती
सारे दर्द-दुःख भुलने आती और मेरे भी दुःख हलका करती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.
आखीर सैर कि सँवारी घर छोड
न जाने कँहा गुप्त हुई और
बुढि अम्मा मात्र मुझे चाय देती
मिठी मुस्कान ही करती रही,
मैं चाय पिकर प्यार भरी मिठास से अमृत रुची में
अपने माता-पिता ,दादा दादी,भाई बहन को याद करता
संतुष्टी से खिडकी में आया
जिधर बिवी राह तकती बैठी थी
मैं बिवी के पास खिडकी से बाहर देखता ही रहा,
मानो खिडकी हमारे जीवन के सारे संघर्ष को सुलझाती,हर संसार समस्या को सहती थी
दिवार में एक खिडकी रहती थी.

टिपः

उपन्यास’ दिवार में एक खिडकी रहती थी’ईसका सारांश यथार्थ को काव्यरुप में संक्षिप्त शब्दबध्द करते हुए मेरी संकल्पना से अधिक बढाते हुए कुछ मेरी कल्पना का भी उपन्यास के विषय से जुडाते कुछ आदरणीय साहित्यीक विनोद कुमार शुक्ल को समर्पीत
दिवार में एक खिडकी रहती थी’का संदर्भ लेकर ही प्रेरित भाव से लिखने में प्रवृत्त रहा हुँ. उपन्यास में से कुछ कमीयाँ जरुर रही है और सारांश रुप को कविता में उतरते हुए आदरणीय शुक्लजी को धन्यवाद भी देना चाहता हुँ.

समय

समय है एक संसार
अच्छे कर्मो का प्रसार
समय है एक विचार
जिसमें अस्मिता आचार.

समय है एक जीवन
सुख-दुःख भरा भुवन
समय है ध्यानस्थ मन
संयम अहिंसा का धन.

समय है पंचमहाभूत
स्वर्ग-नर्क का है यक्षदूत
समय है सजीव शरिर
कल आज और कल फिर.

नज्मे जिंदगी.

हम प्रणाम करते रहे
जिसके हर नज्म को
सफर ए ज्ञान महफिल में
आखिर जीत गए बाजी
सरस्वती देवी कि कृपा से
कलम को ये चंद लफ्ज जो मिले.

शायरों कि जंगल में

हम लिखते चले गए
साजिश’लफ्जों कि जाल में
हम बिकते चले गए
जिंदगी’ख्वाब कि डाल पे.
एक जंगल शायरों की
हम ताकते रहे बात
जब कलम ओठ बने
कविताओं कि थी बारात.


(ताकना -सोचना)

कसर

जिसे मैं संभलकर रखा था
किसीको मालूम मगर नही थी
मैं रोज दिल का आईना झाँकू
सबको मालूम खबर भी ही थी.

कितना छूपाया उम्र गुजारा
बात जो मालूम मगर नही थी
हँसीन सच ख्वाब सा लगता
जिस नजर में जिगर भी ही थी.

बिताई घडी याद सुलगती
जलन मालूम मगर नही थी
बुझ गए वक्त के तारे सभी
खाक में सितम् असर भी ही थी.

रुलाना धर्म नही होता प्रेम
बिरहा मालूम मगर नही थी
बैसाख में फुल हँसते कोई
ऋत खिलने में कसर भी ही थी.

पल

ये गुजरनेवाले पल
मेरी थोडीसी सुन
वक्त फिरसे बुन
बिछडे जोडो मन
ये गुजरनेवाले पल.
ओ था एक जो सहारा
दिल से जोडा धागा
तेरे पिछे ही भागा
बिरहा मैं अभागा
ये गुजरनेवाले पल.
एक आशा है जीवन में
लौटेगी ऋत प्रीत
फिरसे हँसी-जीत
लिखने लफ्ज गीत
ये गुजरनेवाले पल.
मेरी कविता’मेरा मोक्ष
सुख-दुःख का साक्ष
तुझमें पाके लक्ष
समाके रचूँ नक्ष
ये गुजरनेवाले पल.

एक अवस्थाः प्रभा-संध्या

बेचैन मेरी रुह
ढलने लगती है तेरी काया
अब अंधीसी आँखे
संसार जीव में कैसी ये माया.

फिरसे जन्म तेरा
मेरे अंतर्मन को जो जगाता
संभ्रम है बढता
कँही तु तो नही जग विधाता.

सातरंग के पंख
रथ में,विराज तेरा प्रकाश
नारायण निःशंक
तेरा न होना जग का विनाश.

मेरी जाग्र-निंद तू
भय समयकाल में डुंबना
पता नही वक्त का
तेरी तप्त छाया मुझे चुमना.

धीरे-धीरे से जाना
सुंदर धरती से तेरा नाता
झरने वृक्ष-पंछी
प्रार्थना से मानव सुख पाता.

अंजाना

कौनसा चेहरा लेकर यहाँ.
घुमते है हम अंजाने जहाँ

खुदकी पहचान नही कोई
औरों पे हँसता बेचारा जहाँ

नाक किसीकी लंबी,मोठे ओठ
दाँत टेढे-मेढे दिखाता जहाँ

कोई मोठू,कोई छोटू चलता
रुप नही फिर रुबाब जहाँ

लेकर बदसूरत मुखडा
कलादान से जिता रहा जहाँ

जोकर बनाया विधाता देखो
सबका मजाक उडाता जहाँ

धैर्य भारत

काले बम में तन के टुकडे
हर टुकडे से एक पुकार
ईस भारत लीए मर मिटे
और कौनसा महामोक्ष द्वार.

कलेजा फट गया भारत का
हम माँ कि गोद में जो शहिद
हर नयी पिढी धैर्य से चले
आझादी सत्ता कि नही है जिद.

आज घात से मारा मिट्टी माया
क्षमा शत्रु को,शांतता ही धर्म
कँहा जंग थी अपनो में वासी
अज्ञानो कि निती कपट कर्म.

मेरा नाम देशभक्ती से है छोटा
लोकतंत्र का साथ न छोडो बाद
जनम क्या और मिलेंगे माता से
भारत माँ कि ममता रखे याद.

आँसू बहाना नही विरता वासी
गांधी नेहरु इंदिरा देश दासी
जनता कि सेवा में धन्य मरण
शत्रु भी देशपुत्र है,न दे फांसी.

मेरी ईच्छा भारत को सेवा देगी
भारत प्रेमीयों तिरंगा अमर
एक राजीव हजार युवा शक्ती
अहिंसा शांती से रहो बिना डर.

हालात का प्याला

पिनेवालों के होते है दर्द हजार
दुनियेची ऐकता निंदा,होई जीव बेजार.

क्या हाला,क्या प्याला और साथी साकी
काळजाला सल वेदनाविन,काही ना बाकी.

कितना भी करके नशा याद नही मिटती
कुणा-कुणा वाटे खरे,तिलाच नाही पटती.

ईस महफिल में रंगत-संगत झूठी रे
एक सत्य भावनेस या गाठी-भेटी रे.

हालात पे रोना तकदिर कि है बात
मग पिताना दुःख शब्दांची ही खैरात.

जलकोप

घन कि मती
जल कि गती
नभ हि रती
भुलोक में.
रोके न रुके
हवा न झुके
वर्षा का अहं
मेघक्रोध.
दिशा में सभी
बरसे कभी
कोप कि लोभी
जलमाता.
मानव त्रस्त
दया कि भीक
पाप की सिख
क्षमा माँगे.
जल हि जल
फुँटे प्रबल
काल का दल
महाशाप.

राहे नजर.

कुछ आँखे हमसे करती है बाते
ईरादा न जाने क्यों ये लुटना चाहे
मालूम नही गुजरे हम काँटो से
बहाने नजरे बनी बहती राहे.

कुछ जुल्फे हमपे छाती है घटाएँ
हम साया समजके लपेटे चाहे
सारे ख्वाब युँही बिखरे सहज से
दिल में उतरते ही सच्ची निगाहे.

ऐसा भी होता है अक्सर जीवन
रुह से रुह का मिलना जीना चाहे
मगर सपने भी सुंदर टुटते
देकर लफ्ज सुहाने जाते है राहे.

ध्यान का स्थान

उध्दव मित्र कि शंका न्यारी
एक दिन कृष्ण,उल्झे भारी,
देव तुम्हे भक्त भक्ती प्यारी
पट के द्यूत पे द्रौपदी हारी.

क्यूँ न समय पे पँहुचा हरी?
अब उत्तर दो कृष्ण मुरारी
वस्त्रहरण कौरव अघोरी
तुम्हे न चिंता ‘पांचाली’अधूरी ?

अब्रु से लज्जीत सत्य बिचारी
दुष्ट दुर्योधन था व्याभिचारी
हँस रही थी सेना दरबारी
धर्म रक्षा क्यूँ न कृष्ण सँवारी ?

भगवान का क्रोधविन ज्ञान
सुने उद्धव बडे सावधान
लगे मित्र को जीत भ्रांती वाण
हँसना प्रभू का’ भईत प्राण.

कहने लगे प्रसंग कि कथा
जनम-मृत्यू लोक कर्म प्रथा
पुछो बहन द्रौपदी को दुता
देर से सुनी पुकार सभ्यता.

मित्र,आत्म हाक का मैं देवता !’
‘कृष्ण’ कँहू तो विश्व संभलता
संसार माया ,देव को भुलता
क्या द्रौपदी ने मुझे बुलाया था ?

पहले दरबार में भिष्म गाथा
फिर विदुर को देखती रक्षता
कृपाचार्य द्रोणाचार्य कि क्षमता
द्रौपदी को अपनी आशा लुब्धता.

धर्म और अर्जुन स्तब्ध वचनी
भिम निराश, व्याकुल सुलोचिनी
नकुल-सहदेव से विश्वास ऋणी
पर संसार संकट में न ध्यानी.

अंत क्षण में ‘कृष्ण’नाम भक्ती का
पल में रक्षण कर्तव्य पुर्ती का
हे उध्दव,संसार माया गती का
द्रौपदी को न छुटा ये आसक्ती का.

पहली पुकार होती जो मुझको
क्या हिम्मत कौरव भी करती
मैं समय में था जो संहरती
ईस मोह जाल में फँसे अती
कैसे मैं पँहुचू रक्षण प्रती.

उद्धव क्षमा माँगे ये प्रभू को
लिला कर्म कि भुगत सभी को
ध्यान आया उचीत अजबी को
मोक्ष कृष्ण का मित्र मैं अज्ञानी ?
प्रसन्न स्वयं निमीत्त विश्वमुनी.

संत , साधू और संसार

जँहा ठहरते है दुःख
वँही जीवन का अंत है
दुःख के शिवा जीनेवाले
आत्मानुभूती में संत है.

जँहा कर्तव्य बिना कर्म
वह संसार सारा व्यर्थ
जो नित् ईश्वर ध्यान में
ओ ही जाने स्वर्ग सार्थ.

जँहा व्यवहार अज्ञान
वह निःस्वार्थी साधू कहे
पंचनियम से ही विश्व
जीवसृष्टी में ज्ञान रहे.

बसंत विश्वास

सुलगे नही तिनका ऊसमे ये घना अंधेरा
थोडी रोशनी आएगी मन में तो जैसा सबेरा.

जलन होने से सर्द का एहसास थोडा कम
आज तो जरुरत है याद कि आग का निखारा.

जिंदगी गुजर गई तलाश में वो बसेरा
मानो वक्त ने साथ नही दिया दर्द भरा.

फैंककर वो चला नशा तमन्ना न जले
सहता हुँ अब थंडी हवा दिलें प्रेम सारा.

यकीन मुझे है यँही-कँही ऋत से संदेश
गिरे पतियाँ लाख ,बसंत का आएगा फेरा.

रंग जीवन

मैनै हजार रंग देखे दुनिया
मेरे प्रितम जैसा ,कँही न देखा
हर बार बदलता मन जो
होली विश्वास में रंगना ही सिखा.

हरे रंगो मे सजके सजनवा
लाल बिंदीया जैसी भाव लगाके
पिले हल्दी में नहाके चैत्रनवा
निले गगन सी सुंदरता झाँके.

सात रंग कि जीवन इंद्र धनू
पल-पल हवा में खुशी उडाए
बडी धोकेबाज रंगीली मनवा
काले गुलाबी से प्रीत ही जडाए.

ऐसी महती रंगबाज अनोखी
दुनिया को अपनाती जैसी हिना
हात क्या अंग भिगोए सुख रंगी
कैसे जिंदगी गुजारे रंग बिना.

काया महफिल

दुनिया कितनी अजीब है
काया महफिल सजाती है
रुह की मंजील छोडकर
जिस्म कि आग ही बुझाती है.

यह नशा जनम जहर
समझकर भी ये पिता है
यँहा पाप के सब साथी है
पुण्य करम नही पाता है.

ऐ महफिल चलानेवाले
तुझे भुलकर दंग जीना
याद न कभी तुझे करेंगे
अब काहे को रे रोना-धोना.

उम्र और सृष्टी

उनको उम्र कँहासे आए
जिस मन में ही सावन हो
उस में दिन कि फिक्र नही
जिसके भाव ही पावन हो.

जिसका प्रेम खिलता हुआ
दिल के बेली पे हर रोज
दुःख पलभर भी न आए
हँसते हुए जीवन के सेज.

फर्क कँहासे लाए उम्र तक
जँहा प्रेम ही प्रेम के पर हो
आखरी साँस तक यँहा मौज
बाहो में सृष्टी के सफर हो.

बुध्द विचार

कभी ‘बुध्द’ने नही कहा
मेरे साथ चलो
कभी ‘बुध्द’ने नही कहा
मेरे साथ मत आओ.

कभी बुध्द ने कहा
सृष्टी कि हर चीज सजीव है
कभी बुध्द ने कहा
पतिया का दुःख पेड का शरिर.

कभी बुध्द ने कहा
वर्तमान और क्रीया से फल
कभी बुध्द ने कहा
अज्ञान ही निर्जीव का दल.

कभी बुध्द ने कहा
समय हि जीवन मृत्यू का सत्य
कभी बुध्द ने कहा
मानवता ,दया-क्षमा जपो नित्य.

कभी बुध्द ने कहा
भगवान का तेज अपनी आत्मा
कभी बुध्द ने कहा
चैतन्य है ज्ञान परमात्मा.

कभी बुध्द ने कहा
तिन दुःख ही संसार कि पिडा
कभी बुध्द ने कहा
त्याग ही महानिर्वाण सबसे बडा.

असलियत जिंदगी.

आज मैं जिन राहो से
चल रहा हुँ
वह पल भर में पिछे
रहनेवाली याद है.
चलते रहना जिंदगी है
रास्ते सभी आझाद है
अपनी मंजील छोडकर
भटकना पागलपन,
जितना अंतर चलकर
आया एक अनुभव है
जँहा नया सबेरा और आँधी
तुफान से भी गुजरना पडा
अब आगे शाम ;
रोशनी का अस्त
साफ नजर ,
जो कुछ पल में अंधकार भी
फैलायेगा
आज कि तरह ही कल भी
चलना है
नयी रोशनी के साथ,कुछ
पल विश्राम है
जन्म-मरण के बिच का अंतर
जिसे हम संसार कहते है.

निर्दोष डकैती

दो-चार लफ्ज क्या चुराया
मीर-गालीब बनने कि ख्वाईश में
अब छोड भी दो माफी में
फैज के अल्फाज जिंदा है.

गुलाम साब ने पकडा
वर्ना तमन्ना पुरी होती शायरी की
गुलजार जी से शिकायत करे तो
कुछ कविताएँ जेब से निकलेगी.

सिलसिला जारी है डकैती का
गझल के हिरे नही मिलते
जो आजकल छिनना मुश्किल
अपने अंदाजी लफ्ज में खुबी.

कौन से शेर सहेंगे दर्दिए
दिल भी छोटेसे है मैफिल में
बिना समझे वाह कि तारिफ
संभलकर रखा हुँ ओ चोरी.

सजा मिले कलम को अगर
जिंदगी में कवी कि सलाखों में
कसम से मीर गालीब फैज
चंद आँसू लिखा हुँ किताबो में

असली जिंदगी

कभी हम सोचते रहते है
जिंदगी कि हरकते
तन से जुडा मन
भाव कि लालसा
भव में ही रत होने कि आकांक्षा
क्या यह जीवन असली है ?
सागर सहता है तुफानों को
लहरे फिर भी किनारो से मिलती है
जीवन में आकर कर्म के संग
संसार में ही खेलते रहे
किनारा कभी न दिखाई दिया
आत्मा आकाश बनकर रहा
मगर आत्मज्योत का प्रकाश नही पाए.
जिंदगी कि हरकते
कभी हम सोचते रहते है
ईश्वर है तो ईच्छा क्यूँ टाले
यँही सवाल पुछता रहा
एक साधू ने उत्तर दिया
तैरने से ही पानी किनारा तक
ले जाती है.
बस मैं सोचता रहा
सोचता रहा,मंदिर से घर
आने तक
नित्य कि घर के आँगन में
पेड कि डालीयाँ पर
चिडीयाँ चहलती सी,कुछ
आँगन में दाने उठाती
कितना सुखी जीवन
शायद यँही जिंदगी असली
और ईश्वर कि सत्य लिला .

आत्मसम्मान

और कुछ खाँस क्या माँगू
जीवन-मृत्यू कि धूप-छाँव में
आत्मकलश भर दिया
संतुष्टी क्षितीज पल घाव में.

माँगना जरुर था तुझे
प्रकट में कँही नजर आते
मगर धूल चरण से,
हम युगो-युगो का सुख पाते.

पाँच तत्व से जुडी कृपा
पँछी जैसे पर, निर्माण तेरा
मैं पामर पुण्य-पाप का
तु क्या करे दाता सम्मान मेरा.

तेरी दृष्टी यह जीवन
श्वास हवा कभी थकती नही
नीर सृष्टी भरा दामन
नभ महानता झुकती नही.

काव्यकल्पवृक्ष कि छाँव मे

काव्यकल्पवृक्ष कि छाँव में
अक्षरों कि ढेर सारी पतियाँ
शब्दों के फल से भरी पौंधे
प्रतिभा कि आत्मा का विश्राम
संतुष्ट से भरा ज्ञान का मन
धुंद सोच-विचार से लहरता
हवा का झोका
तत्वप्रकाश कि मृगजळ सी धूप
और हर पल अपने वश में करता कवी
सफलता के फुल पर मंडराता
भावभ्रमर
चमत्कार सी गगन कि
शुभ्र पत्ते कि काया
निल कलम से भरा हुआ सुंदर
विवेक अंग
धरा सी हरिभरी पंक्तियाँ झुमेसे वहम
परंतु साक्षात् भी शब्दफलों के
रसपान में मगन प्रज्ञाशील संकल्प
तन-मन-दुःख और आनंद भी
कविता ही कविता.


श्रीशैल चौगुले.

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