सोच-समझकर बोलो

सोच-समझकर बोलो

“मम्मी खाना खा लो। पापा ने भेजा है।” 5 वर्ष की मनु ने रजनी से कहा।

“मुझे नहीं खाना। नाली में फेंक दे इसे।” अपने पति अशोक से नाराज रजनी ने मनु से कहा।

“क्या?” मासूमियत व हैरानी से मनु ने पूछा।

“तुझे एक बार में समझ में नहीं आ रहा, सुनाई नहीं आ रही? चली जा यहाँ से। मुझे परेशान मत कर। मुझे खाना नहीं खाना। अगर फिर कहा तो तेरे साथ उठाकर बाहर फेंक दूंगी मैं इस खाने को।” मनु पर चिल्लाकर रजनी, अशोक को सुनाते हुए बोली।

अबोध, मासूम, नासमझ मनु ने खाने को रजनी के सामने रखना मुनासिब ना समझा और अपनी मां के कहे अनुसार घर से बाहर नाली में… प्लेट का सब खाना पलट आई। रजनी का गुस्सैल व्यवहार देखकर… पारिवारिक माहौल और ज्यादा ना बिगड़े… इसके लिए कुछ समय बाद अशोक ने रजनी को मनाया। जब रजनी नॉर्मल हुई तो वह खाने के लिए इधर-उधर ढूंढने लगी। जब उसे खाने की प्लेट नहीं मिली तो फिर उसने आवाज लगाकर मनु से कहा-

“मनु बेटा, तुमने खाने की वह थाली कहाँ रखी है जो तुम मुझे खाने के लिए दे रही थी? मुझे मिल नहीं रही। जरा ले आना।”

“मम्मी, वह थाली तो मैं घर के बाहर नाली में फेंक आई।”

“ये तूने क्या किया? तुझे अकल है कि नहीं? तुझे किसने कहा.. नाली में बाहर फेंकने को?”

“आपने ही तो कहा था मम्मी कि मुझे खाना नहीं खाना। इसे नाली में फेंक आ… तो मैं फेंक आयी।”

“हे भगवान! इस लड़की का क्या होगा? बिल्कुल भी बुद्धि नहीं है इसमें।” यह कहकर रजनी सिर पकड़कर बैठ गई। वह मासूम व आज्ञाकारी मनु से कहे भी तो क्या कहें? आखिरकार गलती उसकी ही थी जो उसने गुस्से में बिना कुछ सोच विचार के मनु से इस तरह कहा।

कुछ समय बाद एक दिन…

“दादी आम खा लो। मम्मी ने काट कर आपके लिए भेजा है।” प्लेट में रखा आम देते हुए मनु दादी से बोली।

“मुझे नहीं खाना। अपनी मम्मी से कह दो, खा लेगी। उसने आम नहीं खाया है।” दादी बोली।

अब मनु रजनी के पास पहुंची। आम वापिस आया देखकर रजनी बोली-

“तूने अम्मा को आम नहीं दिया?”

“अम्मा बोल रही है कि आपने आम नहीं खाया है इसलिए उन्होंने वापस कर दिया है।” मनु ने बताया।

“अम्मा से बोल दो कि मैंनें एक आम खा लिया था। अब यह आम वो ही खा लेंगी। उन्हें आम बहुत पसंद है।”

आम लेकर मनु फिर से अम्मा के पास पहुंची। इस बार भी अम्मा “मैं नहीं खा रही, रजनी ही खा लेगी।” यह कहकर आम वापस करने लगी।

मनु खुद आम की बहुत बड़ी शौकीन थी। वह खूब आम खा चुकी थी। जब उसने इस एकलौते बचे हुए आम पर मम्मी और अम्मा की इस तरह की हरकतें देखीं और महसूस किया कि दोनों एक दूसरे को आम पास कर रही हैं… दोनों में से कोई खाना नहीं चाहता तो उसने खुद ही दादी अम्मा के सामने वह आम खा लिया। मनु को आम खाता देखकर अम्मा पर बहुत जोर पड़ा। उनका सच में आम खाने का बहुत मन था। वो तो यूं ही आदत अनुसार बोल पड़ी कि मुझे नहीं खाना, बहू खा लेगी। जबकि वे चाहती थी कि मनु उनसे आम खाने के लिए फिर से कहे… अपनापन, प्यार जताते हुए जबरदस्ती से उन्हें आम खाने के लिए बोले… लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मनु को आम खाते देखकर अम्मा बोल पड़ी-

“आजकल के बच्चों से भी हद है। एक हमारा समय था… जब हम प्यार से, अपनेपन से, जबरदस्ती करके मेहमानों को, परिवार के सदस्यों को चीजें खिलाते थे। आज, एक यह समय है… अगर हम बच्चों से एक या दो बार खाने को मना कर दें तो बच्चे खाने के लिए फिर से नहीं पूछते। कोई जबरदस्ती नहीं करते। क्या जमाना आ गया है?”

इस तरह सास को बड़बड़ाते देखकर रजनी बाहर आई और मनु को आम खाता देखकर सब समझ गयी। फिर रजनी अपनी सास को समझाते हुए कहने लगी-

“मां जी, आप बच्चों की आदत तो जानती ही हो। आप खाने पीने की चीजों के लिए मना ही क्यों करती हो? बच्चे या बड़े, जो भी तुम्हें एक बार में दें… तुरंत ले लिया करो, खा लिया करो। अब मनाने का… बार-बार कहने का जमाना न रहा… इसलिए सोच समझ कर बोला करो।”

“हां बहू, अब तो यही करना पड़ेगा। ऐसा मेरे साथ कई बार हो चुका है। बच्चे एक बार मना करने पर फिर से पूछना पसन्द नहीं करते।” प्लेट में आम की मनु द्वारा चुसी हुई गुठली पड़ी देखकर, भारी मन से अम्मा बोली।

बच्चों के सामने सोच-समझकर बोलना बहुत आवश्यक है। एक तरफ जहाँ मां-बाप कहते हैं कि हमारा बच्चा, हमारा कहना नहीं मानता… एक बार में बात नहीं सुनता। वहीं, इसके विपरीत अगर बच्चा उनके द्वारा गुस्से या प्यार में कहीं बात का अनुसरण करने लगे तो वही बात मां बाप को नागवार और भारी गुजरती है। तब वे बच्चों को भला बुरा कहते हैं, उनको डाँट लगाते हैं, बहुत बार मारते-पीटते भी हैं।

अतः आवश्यक है कि बच्चों के सम्मुख गुस्से में या प्यार में कुछ भी अनावश्यक/गलत/गंदी बात कहने से बचें। सोच समझकर बोले। खैर, यहाँ तो इस कहानी में बात सिर्फ खान-पीन की चीजों की थी… कई बार बच्चे नासमझी में या हम बड़ों के कहे अनुसार, हमारी बातों को सच मानकर… अपनों या दूसरों की जान-माल को भी भारी नुकसान पहुंचा देते हैं, जिसकी भरपाई करनी फिर मुश्किल हो जाती है।

अतः बच्चों के सम्मुख पारिवारिक कलह करने, कुछ उल्टा सीधा बोलने से भी बचें क्योंकि कहा भी गया है कि बच्चे जो देखते हैं, वही सीखते हैं। इसलिए उनके सम्मुख ऐसा कोई व्यवहार न करें जो हम स्वयं अपने लिए भी नहीं चाहते। गुस्से या प्यार में कही गई बातों का भी बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों को सही और गलत की समझ देने के लिए हमें अपने व्यवहार और बातों का ध्यान रखना चाहिए।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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