सबसे बड़ा रुपैया

सबसे बड़ा रुपैया

आज राजू सर स्कूल नहीं आए थे। उनकी जगह मैं कक्षा एक को पढ़ाने में इतना व्यस्त हो गया था कि समय का पता ही नहीं चला। अचानक एक बच्चा आकर बोला, “सर इंटरवेल कब होगा?? मिड डे मील बन चुका है??”

मैंने घड़ी देखी। समय हो चुका था। मैं प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर तैनात था। मैं रसोई की तरफ गया तो देखा कि तीनों रसोईया आपस में किसी बच्चे को चोट लगने को लेकर बातें कर रही हैं।

मुझे देखते ही उन्होंने कहा, “सर, क्या आप अमरपाल के घर हो आए??”
“नहीं तो, मैं तो कक्षा में बच्चों को पढ़ा रहा था। अमरपाल के घर कुछ प्रोग्राम था क्या?? क्या हुआ??”
अभी कुछ देर पहले पायल मैम और अंशु मैम दोनों एक साथ अमरपाल के घर होकर आयीं थी। क्या वह आपसे बोल कर नहीं गई??

मैंने कहा, ठीक से बताओ, क्या हुआ?? कुछ समझ मे तो आ नही रहा??
अमरपाल के बच्चे के पैर में काफी चोट लग गई है। उसको देखने के लिए दोनों मैम अमरपाल के घर गई थी। मेरा माथा ठनका।

मैंने सोचा आज तक तो यह दोनों मैडम, कभी नामांकन को लेकर भी, स्कूल से बाहर नहीं निकली। आज कैसे चली गई?? दोनों मैडम ही स्कूटी से आती थी।
मैंने रसोइया से पूछा, “क्या पायल मैडम या अंशु मैडम की स्कूटी से बच्चे को चोट लगी है??”

हां सर, पायल मैम की स्कूटी से ही बच्चे को चोट लगी है। आज सुबह की ही बात है। मैडम स्कूल आ रही थी। उनकी स्कूटी तेज थी। अचानक बच्चा स्कूटी के सामने आ गया। उन्होंने स्कूटी को रोकने की भरपूर कोशिश की, ब्रेक भी लगाये पर फिर भी बच्चे के पैर पर स्कूटी चढ़ गई। आप शायद क्लास में पढ़ा रहे होंगे। उसी वक़्त पायल मैडम, अंशु मैडम को साथ लेकर बच्चे के घर गयी थी।

मैं पायल मैडम से इस सम्बंध में बात करना चाहता था परंतु मैंने देखा कि पायल मैडम किसी से फोन पर बात कर रही थी। मैं सीधा अंशु मैडम के पास पहुंचा और उनसे पूछा, “मैडम यह आपकी बड़ी गलत बात है आप दोनों में से किसी ने भी मुझे उस बच्चे की चोट के बारे में बिल्कुल नहीं बताया।

कम से कम आपसे तो मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी। आपको तो बताना ही चाहिए था। सोचकर देखिए, अगर कोई अभिभावक बच्चे की चोट देखकर, आप लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करता, मारपीट करता या स्कूटी को नुकसान पहुंचाता तो क्या होता???

मैं स्कूल का प्रिंसिपल हूं। स्कूल आने के बाद बच्चों से लेकर, आप सभी की समस्त जिम्मेदारी मेरे पर हो जाती है और आपकी भी कहीं न कहीं विद्यालय के प्रति या हमारे प्रति भी तो जिम्मेदारी बनती है। ईश्वर न करें, अगर आपके साथ कोई अनहोनी, अप्रिय घटना हो जाती तो मैं खुद को और विभाग को क्या जवाब देता?? अगर पायल मैम से चोट बच्चे को लगी थी तो वे सारा मामला बाहर ही सुलझाकर स्कूल आतीं।

स्कूल में आने के बाद, उनका बच्चे के घर जाना और साथ में आपका भी उनके साथ हो जाना, बड़ी गलत बात है। मुझे अभी अभी इस दुर्घटना के बारे में रसोइयों ने बताया। तभी मैं आपके पास आया। सुबह, जब मैं ऑफिस में बैठा था। तभी पायल मैम स्कूल में आई थी और मुझे गुड मॉर्निंग कह के अपनी क्लास में चली गई थी। उनको उसी समय बता देना चाहिए था कि वह बच्चे को चोट पहुंचाकर, सीधे स्कूल आ रही हैं।

सर, “उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी आपसे यह बात बोलने की… इसलिए आपके कक्षा में जाते ही वह मेरे पास आयीं, मुझे उन्होंने सब बात बतायीं औऱ कहा, मैडम, सर को इस बारे में मत बताना और आप मेरे साथ उस बच्चे के घर चलिये। इसलिए मैं उनके साथ चली गईं।”

जो हुआ सो हुआ, अच्छा यह बताओ कि बच्चे की तबियत कैसी है, उसको ज्यादा चोट तो नही आई??
सर, “बच्चें का पैर स्कूटी से बहुत बुरी तरह से कुचल गया है। मुझसे तो उसका पैर देखा ही न जा रहा था।”
मैंने अंशु मैडम से कहा, मैडम जी, आप बच्चों को ठीक से लाइन में बैठाकर मिड डे मील खिलवाओ। मैं बच्चे के घर होकर आता हूँ।

उस बच्चे का नाम मानव था। मानव 4 साल का बच्चा था। वह आंगनबाड़ी में पढ़ता था, आंगनबाड़ी केंद्र विद्यालय परिसर में ही था। मानव के बाकी भाई बहन हमारे स्कूल में ही पढ़ते थे।

जैसे ही मैं अमरपाल के घर जाने के लिए स्कूल से निकला, तभी स्कूल के ही सहायक अध्यापक नितिन सर मेरे साथ हो लिये और बोले, मैं भी बच्चे को देखने चलता हूँ। जैसे ही हम अमरपाल के घर पहुंचे, हमने देखा कि अमरपाल की पत्नी भैसों को नहला रही थी। घर की हालत अच्छी नही थी। जैसे ही उनकी नज़र हमपर पड़ी, वह तुरंत अंदर से दो कुर्सियां निकाल कर लायीं और बच्चों से पानी लाने को कहा।

मैंने कहा, आप बिल्कुल भी परेशान मत होइये। मानव के पापा कहाँ हैं?? हम तो आपके बच्चे को देखने आए थे। हमें अभी अभी पता चला कि हमारे स्कूल की मैडम से आपके बच्चे मानव को चोट लग गई है। कहां है मानव??
वह बोली, “मानव के पापा तो मजदूरी पर गए हुए हैं। शाम को ही आएंगे।

मानव अंदर कमरे में लेटा हुआ है। गलती तो हमारे बच्चे की है। इसको ही चैन ना पड़ता। जब देखो भागता फिरता है। मैडम की गलती ना है। वह तो अपनी साइड से ठीक चला रही थी। इसने ही अचानक सड़क पार करने की कोशिश की। मैडम ने ब्रेक भी लगाए थे लेकिन फिर भी बच्चे के चोट लग गई।”

“यह तो आपका बड़प्पन है बहन जी, कि आप अपने बच्चे की गलती बता रही है वरना आजकल ऐसे अभिभावक कम है, जो अपने बच्चे की गलती बताएंगे। देखा जाए तो गलती हमेशा बड़ी सवारी की होती है।

यहां गलती पायल मैडम की है। पायल मैडम को कम से कम गांव में तो आराम से स्कूटी चलानी चाहिए। जानवर हो या बच्चा, अचानक से ही सड़क पार करते हैं। इनका कुछ नहीं पता, कब सड़क पर आ जाएं। आप की जगह पर कोई और अभिभावक होता तो मैडम से अभद्र व्यवहार करता और बच्चे के इलाज का खर्च लेता सो अलग।”

इतने में मानव की बड़ी बहन तनु, मानव को गोद मे लेकर कमरे से बाहर लायी। आज तनु अपने भाई को चोट लग जाने के कारण स्कूल नहीं गयी थी। हमने देखा, बच्चे के पैर में पट्टी बंधी थी। पट्टी देखने से ही प्रतीत हो रहा था कि मानव को चोट काफी लगी थी। मैंने पूछा, यह पट्टी किसने करवाई?? क्या पायल मैडम ने पट्टी करवाई है?? मुझे पता चला है कि अभी कुछ समय पहले पायल मैम और अंशु मैम यहां बच्चे को देखने आई थी।

“नहीं सर, उन्होंने नहीं करवाई, बच्चे की मरहम पट्टी तो हम ने ही करवाई है। गांव के ही डॉक्टर अयाज जी से ही दवा ली है, इंजेक्शन लगवाया और पट्टी करवाई।”

मुझे बेहद गुस्सा आया, मैंने कहा, “फिर दोनों मैडम यहां करने क्या आई थी?? जब उनको बच्चे के लिए कुछ करना ही नहीं था। एक तो बच्चे के इतनी चोट मार दी और मरहम पट्टी भी ना करवाई। बड़ी शर्म की बात है। अच्छा ये बताओ, क्या उन्होंने बच्चे के इलाज के लिए आपको कुछ रुपए दिए हैं??”

रुपए की बात सुनकर मानव की मम्मी कुछ संकुचित हुई। वह बोलना नहीं चाह रही थी परन्तु मेरे द्वारा जोर देने पर बोली, “सर पायल मैडम बीस रुपये देकर गई हैं। बोल रही थी कि बच्चे को दवा दिलवा देना।”

बच्चे की दवा व मरहम पट्टी के लिए बीस रुपये का सुनते ही मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मैं सोचने लगा कि आज के समय में इतनी महंगाई में बीस रुपये में कोई कैसे अपना इलाज करा सकता है??

हर इंसान को अपना दुख ही सबसे ज्यादा लगता है, दूसरे के दुखों से कोई मतलब नहीं, चाहे वह मर जाए। अगर खुद के बच्चे के साथ ऐसा हो जाता तो यही मैडम चोट मारने वाले इंसान की ऐसी तैसी कर डालती और इलाज का खर्चा वसूलती सो अलग।

शायद इसी वजह से भगवान ने अभी तक पायल मैडम की गोद नहीं भरी थी, क्योंकि ईश्वर भी ऊपर से सब कुछ देखता है। जो कदर करता है, उसी की झोली भरता है।

मैंने मानव की मम्मी से कहा, “बच्चे को लेकर आप चिंता मत कीजिए। बच्चे के पूरी तरह से ठीक होने तक, बच्चे की मरहम पट्टी, दवाई वगैरह का समस्त खर्चा मैं वहन करूंगा। मैं अभी डॉक्टर साहब से मिलते हुए जाऊंगा।

आप डॉक्टर अयाज जी से दवा वगैरह ले लिया करना और बच्चे की टाइम से पट्टी करा दिया करना। वह आपसे रुपए नहीं लेंगे। वैसे भी मैंने उनसे बोल रखा है कि स्कूल के किसी भी बच्चे की अगर तबियत खराब हो या किसी भी बच्चे को मेरे पीछे चोट लगे तो आप उसका इलाज फ्री में करेंगे।

वो ऐसा करते भी है। बाद में समय मिलने पर मैं उनका पूरा हिसाब कर आता हूं। डॉक्टर साहब अच्छे इंसान हैं। अब मैं डॉक्टर साहब से मिलने जा रहा हूं। बच्चे के पैर का हाल-चाल भी उन्हीं से पता कर लूंगा क्योंकि इस समय तो बच्चे के पैर में पट्टी बंधी हुई है। सही स्थिति वही बता पाएंगे। आप निश्चिंत रहें। बहुत जल्द मानव ठीक हो जाएगा।”

यह बोलकर मैं नितिन सर के साथ डॉक्टर अयाज जी की दुकान के लिए निकल पड़ा। रास्ते में नितिन सर ने कहा, “मैडम ने पता नहीं क्या सोचकर बीस रुपये दिये। आजकल 20 रुपये में होता ही क्या है?? मुझे तो यही लगा था कि कम से कम 500 या 1000 रुपये दिए होंगे। मैडम इतनी ज्यादा कंजूस व निर्दयी है, आज पता चला”

हम डॉक्टर साहब के क्लीनिक पर पहुंचें। हमें साथ देखकर उन्होंने मुझसे पूछा, मास्टर साहब कैसे आना हुआ?? सब खैरियत से तो हैं?? मैंने कहा, “आज सुबह हमारे स्कूल की मैडम से एक बच्चे को चोट लगी थी। उसी के बारे में आपसे जानकारी लेने आया हूं। उसके पांव की स्थिति कैसी है??”

उन्होंने बताया, “बच्चे का पैर बुरी तरह से जख्मी है। बच्चे के पैर पर स्कूटी चढ़ने से मांस फट गया है। अच्छी बात है कि बच्चे की हड्डियां फ्रैक्चर नहीं हुई। बच्चे को ठीक होने में कम से कम 2 महीने तो लग ही जाएंगे।”

मैंने डॉक्टर साहब को रुपये देते हुए कहा, “डॉक्टर साहब, यह कुछ रुपए रखिए और उस बच्चे का इलाज जरा ठीक से कीजिएगा। जब तक बच्चा ठीक ना हो जाए, तब तक आप उस बच्चे के इलाज के लिए उसके मम्मी पापा से कोई रकम नहीं लेंगे। अगर रुपये और भी लगें तो अपने पास से बच्चे का इलाज कर देना पर उनसे मत मांगना। समय मिलने पर मैं आपकी दुकान पर आकर बाकी रुपये चुका दूंगा।”

उन्होंने कहा, मास्टरजी रुपए देने की क्या जरूरत थी?? अगर आप ना भी देते, तब भी मैं उनसे रुपये नहीं लेता। आपने बोल ही रखा है कि हमारे स्कूल के बच्चे से रुपए मत लेना। मुझे नही पता था कि वो आपके स्कूल में पढ़ता है। आज तो गलती से ले लिए, पर आगे से ध्यान रखूंगा।

मैंने कहा, मैं आपको एडवांस में रुपये इसलिए दे रहा हूं ताकि मुझे तसल्ली हो जाए कि अगले कुछ दिनों तक आप उस बच्चे का ठीक से इलाज करेंगे क्योंकि दवाई वगैरह फ्री में तो आती नहीं है। आप भी तो मेडिकल से लेकर आते हैं।

स्कूल पहुंचकर मैंने पायल मैम को बुलाया तथा उनकी लापरवाही के कारण बच्चे को लगी चोट को लेकर बातचीत की।
उन्होंने कहा, “सर गलती मेरी नहीं थी। उस बच्चे की ही गलती थी। मैंने तो उसको बचाने की बहुत कोशिश की फिर भी उसको चोट लग गई।”
मैंने कहा, गलती भले ही बच्चे की थी लेकिन मानवता के नाते, आपको बच्चे का प्राथमिक उपचार तो करवाना ही चाहिए था।
सर, “डॉक्टर साहब तब तक नहीं आए थे मैं उस बच्चे की मरहम पट्टी के लिए उसकी मम्मी को रुपए देकर आ गई हूं।”
उनको लगा था कि मुझे पता नहीं चलेगा कि मैडम कितने रुपए देकर आयीं हैं। मुझे उनकी इस बात पर गुस्सा आ गया।

मैंने कहा, “मात्र बीस रुपये में क्या उस बच्चे की मरहम पट्टी, दवा, इलाज वगैरह सब कुछ संभव है?? क्या आपको बच्चे पर तरस नहीं आया?? डॉक्टर साहब ने बताया है कि उसके पैर की इतनी बुरी हालत है कि कम से कम 2 महीने में ठीक हो सकेगा.. गरीब लोग हैं मजदूरी करते हैं।

कम से कम आप कुछ रुपये तो बच्चे के इलाज के लिए देकर आ सकती थी। आपके पास तो किसी चीज की कमी नहीं है। आप तो खुद ही बच्चे ना होने के कारण बहुत परेशान हैं। जगह जगह दान पुण्य करते फिर रहे हैं। अपना इलाज महंगे महंगे डॉक्टरों से भी करवा रहें हैं।

आपको तो पता ही है कि हजारों रुपए का उन डॉक्टरों का सिर्फ देखने का पेपर होता है। दवाएं, जांचे रही सो अलग। अगर आज शायद आप इस बच्चे की मदद कर देती तो क्या पता भगवान आपसे खुश हो ही जाते।”
मेरे द्वारा इतना बोलने पर शायद उन्हें कुछ शर्मिंदगी हुई। वह बोली, मैं बच्चे के इलाज के लिए अपने पति के माध्यम से रुपये भिजवा दूंगी।

मैंने कहा, मैडम जी, अब आपको रुपए वगैरह देने की कोई जरूरत नहीं है। मदद करनी होती तो आप तभी करते। अब मैंने डॉक्टर साहब से बात कर ली है। डॉक्टर साहब को बच्चे के इलाज के लिए रुपए भी दे कर आ गया हूं। वह इलाज कर देंगे।

दो दिन बाद मैडम ने कहा, उन्होंने उसी दिन अपने पति के माध्यम से बच्चे के इलाज के लिए रुपए भिजवा दिए थे।
मुझे बड़ा अजीब लगा मैंने कहा, जब मैंने आपसे मना किया था कि उसका इलाज मैं करवा रहा हूं तो आपको रुपए देकर आने की क्या जरूरत पड़ी थी?? दो दिन बाद रसोईया के माध्यम से पता चला कि मैडम के पति बच्चे के संपूर्ण इलाज के नाम पर मात्र सौ रुपये देकर आये थे। जबकि मात्र 4 दिन में ही बच्चें पर हजारों रुपये लग चुके थे।

सीख:- यह वास्तविक घटना पर आधारित कहानी है। आज के समय में ज्यादातर लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ है। हर ओर सिर्फ दिखावा है। जरूरतमंद की मदद करने कोई आगे बढ़कर नही आता। सब लोगों में पैसा कमाने, पैसा बनाने की होड़ सी, दौड़ सी लगी हुई है। पैसे से ही लोगों की तरक्की व स्टेटस को आंका जाता है। पैसों के लिए इंसान संबंध बनाने व बिगाड़ने से बाज नहीं आते। आज के समय में इंसानियत कहीं मर सी गई है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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