स्वर्ग में कोरोना
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स्वर्ग में कोरोना

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ब्रह्मलोक में दरबार सजा हुआ है। ब्रह्मा जी की अध्यक्षता में देवराज इंद्र, रुद्र, गणेश जी, कार्तिकेय, समस्त लोकों से आये देवगण जिसमे गन्धर्व, यक्ष, पितृ आदि वर्ग के देवता उपस्थित हैं। ब्रह्मा जी के समीप लेखाकार चित्रगुप्त जी बही खाते सम्भाले गद्दी पर विराजमान हैं। सभा मे पृथ्वी सहित अन्य लोकों पर गम्भीर चर्चा हो रही है।
अचानक देवर्षि नारद जी का प्रवेश होता है वह बौखलाए से कहीं से तेजी से चले आ रहे हैं। उनके चेहरे में घबराहट और रुआँसापन स्पष्ट दिख रहा है।
“कहो नारद जी!! क्या समाचार हैं। आज आपके मुखमंडल पर उदासी के बादल छाए हुए प्रतीत हो रहे हैं।” सभापति ब्रह्मा जी ने पूछा।
“नारायण!! नारायण!! मैं अभी पृथ्वीलोक से चला आ रहा हूँ भगवन!! वहां बहुत विकट परिस्थितियाँ हैं”
ब्रह्मा जी(थोड़ा चिंतित होते हुए)- “खुलकर कहो नारद जी!!”
“प्रभो!! पृथ्वी में मानव जाति संकट में है।अपनी इस सुंदर रचना को उस अदृश्य राक्षस से बचा लो भगवन!!” नारदजी इतना कहकर रोने लगते हैं।
(सभा अचानक गम्भीर हो गयी है)
“नारदजी मैं आपकी बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहा हूँ। पृथ्वी लोक पर ऐसा कौन सा संकट आ गया जिसकी हमे जानकारी ही नही है। हमारी बनाई हुई कृति को कौन पापी नष्ट करना चाहता है!!”  इतना कहते ही ब्रह्मा जी के तीनों मुखों में क्रोध की लालिमा छा गयी।
“प्रभु!!यही तो चिंता का विषय है। न तो वह जीव है न जंतु । न ही किसी लोक से भेजा गया कोई विकार। वह अदृश्य है।”
सभा मे उपस्थित देवगण चिंतित नजर आ रहे हैं।
ब्रह्मा जी (चित्रगुप्त से)- चित्रगुप्त जी!! मुझे कल तक इसकी सारी डिटेल्स चाहिए।
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“मानव जाति पर आए अदृश्य संकट के विषय मे क्या समाचार हैं चित्रगुप्त?”
“भगवन!!मुनि नारद जी की बात 16 आने सच है।पृथ्वी पर मानव जाति इस वक्त घोर पीड़ा में जी रही है। एक अदृश्य जीवाणु”कोरोना वायरस” इंसानों का जीना मुहाल किये है।”
चित्रगुप्त ने अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहा- “प्रभु!! हालत ये है कि मानव जाति सिर छुपाए अपने घरों में रहने को मजबूर है।”
ब्रह्मा जी-“यह अद्रश्य जीवाणु जब किसी अन्य लोक से पृथ्वी पर नही गया तो यह आया कहाँ से??”
चित्रगुप्त- “भगवन!! यह उन मानवों के कुत्सित प्रयासों की ही देन है। उन्होंने अपना दुश्मन अपने हाथों से तैयार किया है। अपनी ही बोई फसल काटने को वह अब मजबूर हैं।”
ब्रह्मा जी-“परन्तु इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई?”
चित्रगुप्त-“महाराज!! इसकी उत्पत्ति चीन देश से मानी जा रही है”
“चीन?? इसके बारे में जानकारी दीजिए”
चित्रगुप्त-“भगवन!! यह देश कुछ दशक पूर्व तक अन्य देशों की तरह गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी से जूझ रहा
था परंतु महत्वाकांक्षा, धन लिप्सा और विस्तार वादी स्वभाव के चलते इसने अभूतपूर्व विकास किया है। वहां के लोग औसत कद काठी के, मिचमिची आंखों वाले और लगभग एक दूसरे की प्रतिकृति (Copy) हैं।
भगवन!! ये इकट्ठे खड़े हों तो इन्हें पहचानना मुश्किल है। यह स्वभाव से विस्तारवादी और रचनात्मक हैं।
यह आज महाशक्ति बनने के करीब हैं और दुनिया के कई छोटे बड़े गरीब मुल्कों पर नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं। इनकी भाषा भी अन्य देशों से भिन्न है जो इनके अलावा और किसी को समझ नही आती.”
चित्रगुप्त ने आगे कहा-“महाराज!! इनके रहने और खाने पीने का भी कोई ठिकाना नही है। यह कहीं भी रह लेते हैं, कुछ भी खा लेते हैं। यह खाने के मामले में हबशी हैं। कीट पतंगा मच्छर कुछ इनसे छूटा नही है। इनके इसी अनियमित और प्रकृति विरुद्ध खानपान ने इस जीवाणु को जन्म दिया है। यह हर 2-4 वर्ष में कोई न कोई वायरस लांच कर देते हैं।”
नारदजी (बीच मे हस्तक्षेप करते हुए)-“प्रभु!! उड़ती खबर तो ये भी है कि इन्होंने जानबूझकर इस जीवाणु को अपनी प्रयोगशाला में विकसित किया है।”
“सच मे??”ब्रह्माजी ने हैरानी जताते हुए कहा।
नारद जी- भगवन!!ठोस जानकारी मिलनी शेष है।कुछ दूत भेजे हैं पता करने।”
ब्रह्मा जी (चिंतित मुद्रा में)-अब मानव इस जीवाणु से बचने के लिए क्या उपाय कर रहा है चित्रगुप्त?”
चित्रगुप्त- “भगवन!! बीमारी नई है सो ठोस दवा अभी ईजाद नही हुई। इसलिए कुछ अन्य उपायों यथा-मास्क (मुख कवच), सेनेटाइजर (हस्त शुद्धिकरण मदिरा-कम-तरल पदार्थ) और सोशल डिस्टेंसिंग (समाज एकीकरण विच्छेदन प्रणाली) का उपयोग कर रहे हैं।
कुछ समय पूर्व तक लॉकडाउन (घरबन्दी) भी लगा रहा जिससे मानव और प्रकृति दोनो को फायदा हुआ। इस अवधि में मानव तो संकट में रहा परंतु प्रकृति साफ हुई है और अन्य जीव जंतु भी खुलकर सांस ले सके हैं।
Continued………
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