Tere Sahare

प्रगति दत्त | Tere Sahare

तेरे सहारे

( Tere sahare )

सबके जीवन, तेरे सहारे ।
सबकी नैया , तू ही संभाले ।

हे ईश्वर, सब कुछ तेरे सहारे ।
संकट से , तू ही तो उबारे ।

सबकी बिगड़ी , को तू बना दे ।
भव सागर से, तू ही बस तारे ।

अपना सब, है तेरे सहारे ।
दूर कर अब, तनाव सारे ।

खुशियों से , भर दे मन सारे ।
मिटा दे, सबके क्लेश सारे ।

शांत हो , अब ह्रदय हमारे ।
लौटें खुशियां फिर अपने द्वारे ।

ईश्वर हम , अब तेरे सहारे ।

Pragati Dutt

श्रीमती प्रगति दत्त
अलीगढ़ उत्तर प्रदेश

यह भी पढ़ें :

Similar Posts

  • मन का डर | Man ka Dar

    मन का डर ( Man ka Dar )   चलते चलते न जाने कहाँ तक आ गये हैं, कामयाबी की पहली सीढ़ी शायद पा गये हैं, कुछ पाने का जूनून आँखों में है बसा हुआ मगर पहला क़दम रखूं कैसे डर ये सता रहा, ख़ुद पर इतना यक़ीन कभी किया ही नहीं, कुछ जीत लेने…

  • हर घर-घर में लगा तिरंगा

    हर घर-घर में लगा तिरंगा हर घर-घर में लगा तिरंगा, डोले अपनी शान में, हर दिल-दिल में बसा तिरंगा, बोले अपने मान में, देखो लाज तुम्हारी हूँ मैं, रखना सदा ये ध्यान में, हर घर-घर में लगा तिरंगा, डोले अपनी शान में, भारत माँ का वसन हूँ मैं, ढँकता उसकी लाज, देशभक्त के साहस का,…

  • नदी | Nadi par Kavita

    नदी ( Nadi )  आँधी आऍं चाहें आऍं तूफ़ान, मैं सदैव ही चलती ही रहती। और गन्दगी सारे ब्रह्माण्ड की, समेट कर के बहा ले जाती।। मैं किसी के रोके नहीं रुकती, और कभी भी मैं नहीं थकती। मैं नदी ख़ुद मन वेग से चलती, अविरल सदैव बहती जाती।। अपनें इस प्रवाह से धरती के,…

  • अलग अलग भगवान न होगा | Alag Alag Bhagwan

    अलग अलग भगवान न होगा ( Alag alag bhagwan na hoga )   अलग अलग देवालय हैं पर अलग अलग भगवान न होगा । भिन्न भावना होने से क्या पूजा का अपमान न होगा। एक ज्योति ही, जलती सब में मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों में। किन्तु उसे वे देख न पाते भटक रहे जो अंधियारों में।…

  • मेरा भारत | Mera Bharat

    मेरा भारत ! ( Mera Bharat )    बिछाकर आँख सबको जोड़ता है भारत, दुनिया को साथ लेकर चलता है भारत। कितने टूट चुके हैं देखो, दुनिया के तार, सारे जहां का साज रखता है भारत। पामाल हो चुके हैं न जाने कितने देश, सब में इंकलाब भरता है भारत। झुका देता है नील गगन…

  • मन की बातें | Heart touching kavita

    मन की बातें  ( Man ki baten : Heart touching kavita )   क्या कहूँ कैसे कहूँ तुम्हें मैं मन की बात कही ना जाए ना जाने बार बार मेरे कदम क्यों थम से जाते हैं जब भी गुजरना चाहता हूं तुम्हारे शहर से पल दो पल के लिए ना सही जनम जनम का साथ…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *